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8 MIN LESSON · SANSKRIT

Class 9 Sanskrit: Reading and Pronunciation: Complete Concepts and Practice

संस्कृत — स्वर-व्यञ्जन, उच्चारण-स्थान, प्राण और घोष, संयुक्त वर्ण, अनुस्वार-विसर्ग, पदच्छेद, अन्वय, सरलार्थ, सन्दर्भ तथा मौलिक गद्यांश पर प्रश्नोत्तर।

परिचय

संस्कृत पढ़ते समय शुद्ध उच्चारण और अर्थबोध साथ विकसित होने चाहिए। केवल तेज गति से श्लोक बोलना पर्याप्त नहीं; स्वर की अवधि, संयुक्त व्यञ्जन, विभक्ति और पदों के सम्बन्ध समझना भी आवश्यक है। वर्ण की छोटी भूल शब्द का रूप या अर्थ बदल सकती है, इसलिए सुनना, धीरे पढ़ना और अर्थ से मिलाना उपयोगी अभ्यास हैं।

कक्षा में गद्यांश और श्लोक से एकपदीय उत्तर, पूर्ण वाक्य, पदच्छेद, अन्वय तथा सरलार्थ पूछे जा सकते हैं। यहाँ हिंदी में विधि समझाई गई है और संस्कृत उदाहरणों पर उसे लागू किया गया है। निर्धारित पुस्तक का पाठ-नाम या लेखक उपलब्ध न हो तो अपनी ओर से सन्दर्भ नहीं गढ़ना चाहिए।

अधिगम उद्देश्य

  • स्वर, व्यञ्जन, हलन्त और संयुक्त वर्ण का सही पठन करना।

  • प्रमुख उच्चारण-स्थानों और अल्पप्राण-महाप्राण भेद को पहचानना।

  • अनुस्वार और विसर्ग को प्रसंग के अनुसार पढ़ना।

  • श्लोक का पदच्छेद, अन्वय और सरलार्थ बनाना।

  • मौलिक गद्यांश से संस्कृत में प्रमाणयुक्त उत्तर देना।

  • प्रश्नवाचक पद और विशेषण-विशेष्य सम्बन्ध पहचानना।

मुख्य अवधारणाएँ

1. स्वर की अवधि और व्यञ्जन का आधार समझिए

स्वर स्वतंत्र रूप से उच्चरित होते हैं। अ, इ, उ, ऋ जैसे ह्रस्व स्वर और आ, ई, ऊ जैसे दीर्घ स्वर की अवधि अलग होती है। ए, ऐ, ओ और औ को पारम्परिक वर्ण-वर्गीकरण में दीर्घ माना जाता है। व्यञ्जन स्वर की सहायता से स्पष्ट रूप पाता है; क और क् में अन्तर देखिए। क् में हलन्त अन्तर्निहित अ को हटाता है।

“दिनम्” और “दीनम्” में इ तथा ई का अन्तर अर्थ बदलता है। पहले का सम्बन्ध दिन से, दूसरे का दीन या असहाय अर्थ से है। अभ्यास में दीर्घ स्वर को केवल अधिक जोर से न बोलें; अवधि और स्पष्टता महत्त्वपूर्ण हैं। पाठ के अन्तिम व्यञ्जन और विभक्ति-चिह्न को निगल जाने से उत्तर में व्याकरणिक पहचान कठिन हो सकती है।

2. उच्चारण-स्थान के अनुसार वर्ण-वर्ग पहचानिए

मुख में ध्वनि बनने का स्थान उच्चारण-स्थान कहलाता है। व्यञ्जन-वर्गों को उनके क्रम से याद करना सहायक है। क-वर्ग कण्ठ, च-वर्ग तालु, ट-वर्ग मूर्धा, त-वर्ग दन्त और प-वर्ग ओष्ठ से सम्बन्धित है। नासिक्य वर्ण में नासिका की भी भूमिका होती है।

स्थान

प्रमुख वर्ण

अभ्यास

कण्ठ

अ, आ तथा क-वर्ग

क, ख, ग, घ, ङ

तालु

इ, ई तथा च-वर्ग, य, श

च और श का स्पष्ट भेद

मूर्धा

ऋ, ट-वर्ग, र, ष

ट और त अलग बोलना

दन्त

त-वर्ग, ल, स

दन्त्य त, थ, द, ध, न

ओष्ठ

उ, ऊ तथा प-वर्ग

प, फ, ब, भ, म

दन्तोष्ठ

व

दाँत और ओष्ठ की सहायता

ए-ऐ को कण्ठतालव्य और ओ-औ को कण्ठोष्ठ्य कहा जाता है। श, ष और स को एक जैसा बोलने से बचिए। स्थान की पहचान सुनकर और शिक्षक के मार्गदर्शन में अभ्यास करने से स्थिर होती है; केवल अक्षरों की तालिका रटना पर्याप्त नहीं।

3. प्राण, घोष और संयुक्त वर्ण पर ध्यान दीजिए

अल्पप्राण और महाप्राण में श्वास-प्रवाह का अन्तर है। प्रत्येक वर्ग का पहला, तीसरा और पाँचवाँ वर्ण सामान्यतः अल्पप्राण तथा दूसरा और चौथा महाप्राण है। क-ख तथा ग-घ का जोड़ा बोलकर तुलना करें। घोष में स्वरयन्त्र का कम्पन जुड़ता है; क-ख अघोष, ग-घ-ङ घोष हैं।

संयुक्त वर्ण में व्यञ्जन पास आते हैं—क्त, त्र, ज्ञ, श्र। “भक्तः” में क्त को अलग करने के लिए अतिरिक्त स्वर जोड़कर “भकतः” न बोलें। “पुस्तकम्” के अन्त का म् सुरक्षित रखें। संयुक्त वर्णों के उच्चारण में प्रादेशिक परम्पराएँ मिलती हैं; विद्यालय के मानक पाठ और शिक्षक के निर्देश के अनुसार स्पष्ट पठन करें। गति बढ़ाने से पहले धीरे सही रूप बनाना चाहिए।

4. अनुस्वार और विसर्ग का सावधान पठन कीजिए

अनुस्वार नासिक्य ध्वनि का संकेत करता है। वर्गीय व्यञ्जन से पहले उसका उच्चारण उस वर्ग के नासिक्य के निकट होता है, जैसे अङ्कः, सञ्चयः और कम्पनम् जैसे रूपों में। हर बिन्दु पर एक जैसी कठोर म् ध्वनि जोड़ना सही अभ्यास नहीं। स्वर की अनुनासिकता और व्यञ्जनात्मक नासिक्य में भी अन्तर होता है।

विसर्ग ः के रूप में लिखा जाता है और उसका उच्चारण पास के वर्णों तथा पाठ-परम्परा से प्रभावित हो सकता है। “बालकः” के अन्त को पूरी तरह छोड़ना गलत है, पर हर जगह उसके बाद पूरा नया अक्षर “हा” जोड़ना भी नहीं। अवग्रह ऽ सन्धि में लुप्त अ का संकेत है, जैसे “तेऽपि” में; उसे स्वतंत्र पूरा अक्षर बनाकर न पढ़ें। विराम-स्थान और जुड़े पठन के रूप अलग हो सकते हैं।

5. पदच्छेद में मूल पद वापस लाइए

पदच्छेद जुड़े रूप को उसके अर्थपूर्ण मूल पदों में अलग करता है। केवल मनमाने स्थान पर रिक्त जगह देना पर्याप्त नहीं। “तेऽपि” का पदच्छेद “ते + अपि” है। “फलमस्ति” में “फलम् + अस्ति” मिलता है। सन्धि पहचानकर मूल स्वर, व्यञ्जन या विसर्ग वापस रखें।

प्रक्रिया है—क्रिया या परिचित शब्द खोजें, सन्धि-स्थान पहचानें, सम्भव मूल रूप बनाकर वाक्य का अर्थ जाँचें। “विद्यालयः” को “विद्या + आलयः” अलग किया जा सकता है। मूल पद की विभक्ति भी सुरक्षित रहे। “बालकः” को “बालक” लिख देना अर्थपूर्ण कोश-आधार दे सकता है, लेकिन वाक्य के पदच्छेद में आवश्यक विसर्ग खो जाएगा।

6. सार्वजनिक परम्परा के नीति-श्लोक का पूरा अभ्यास

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।

न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥

यह प्रसिद्ध नीति-श्लोक हितोपदेश की परम्परा में मिलता है। दिए अंश का उपयोग व्याकरण और अर्थबोध के लिए है; किसी विशेष विद्यालयी पाठ से इसका सम्बन्ध अपने-आप न मानें।

पदच्छेद: उद्यमेन, हि, सिध्यन्ति, कार्याणि, न, मनोरथैः, न, हि, सुप्तस्य, सिंहस्य, प्रविशन्ति, मुखे, मृगाः।

अन्वय: कार्याणि उद्यमेन हि सिध्यन्ति, मनोरथैः न। मृगाः सुप्तस्य सिंहस्य मुखे न हि प्रविशन्ति।

सरलार्थ: काम परिश्रम से पूरे होते हैं, केवल इच्छाओं से नहीं। सोए हुए सिंह के मुख में हिरण स्वयं प्रवेश नहीं करते। दूसरी पंक्ति पहली बात को दृश्य उदाहरण से स्पष्ट करती है। इसका अर्थ विश्राम को हमेशा गलत कहना नहीं, प्रयास की आवश्यकता बताना है।

7. अन्वय में विभक्ति और क्रिया जोड़िए

अन्वय पदों को अर्थ स्पष्ट करने वाले गद्यक्रम में रखता है। पहले क्रिया, फिर उसके अनुसार कर्ता, कर्म और दूसरे सम्बन्ध खोजिए। श्लोक में “सिध्यन्ति” बहुवचन क्रिया है और “कार्याणि” नपुंसकलिंग बहुवचन कर्ता। “उद्यमेन” तृतीया है और साधन या कारण का सम्बन्ध बताता है।

दूसरे वाक्य में “प्रविशन्ति” क्रिया और “मृगाः” कर्ता है। “सुप्तस्य सिंहस्य” में विशेषण और विशेष्य दोनों षष्ठी एकवचन हैं। “मुखे” सप्तमी स्थान बताता है। मूल पदों को क्रम देते समय अपने शब्दों से नई घटना न जोड़ें। छूटा हुआ स्वाभाविक पद अर्थ के लिए जोड़ना पड़े तो उसे कोष्ठक में दिखाना बेहतर है। अन्वय अनुवाद नहीं; संस्कृत पदों का अर्थपूर्ण विन्यास है।

8. मौलिक गद्यांश और हल किए उत्तर

ग्रामे एकः लघुः पुस्तकालयः अस्ति। तत्र बालकाः बालिकाः च प्रतिदिनं पठन्ति। एका शिक्षिका कठिनानां शब्दानाम् अर्थान् बोधयति। विद्यार्थिनः पुस्तकानि स्वच्छानि रक्षन्ति। रविः मित्राय एकं चित्रपुस्तकं दर्शयति। सर्वे मिलित्वा पुस्तकालयस्य व्यवस्थां कुर्वन्ति।

एकपदेन: बालकाः बालिकाः च कुत्र पठन्ति? उत्तर—पुस्तकालये।

पूर्णवाक्येन: शिक्षिका किं बोधयति? उत्तर—शिक्षिका कठिनानां शब्दानाम् अर्थान् बोधयति।

भाषिक कार्य: “स्वच्छानि” किसका विशेषण है? उत्तर—पुस्तकानि। दोनों नपुंसकलिंग बहुवचन हैं। “मित्राय” चतुर्थी एकवचन है और जिसे पुस्तक दिखाई जाती है, उसका संकेत करता है। पाठ में “सर्वे” सामूहिक व्यवस्था की जिम्मेदारी बताता है।

अनुवाद करते समय “प्रतिदिनम्” का प्रत्येक दिन और “मिलित्वा” का मिलकर अर्थ सुरक्षित रखें। केवल पुस्तकालय में बैठना और व्यवस्था मिलकर करना अलग सूचनाएँ हैं।

9. प्रश्न-निर्माण और उत्तर की संगति जाँचिए

रेखांकित पद के स्थान पर उपयुक्त प्रश्नवाचक पद रखें। “रविः पठति” में कर्ता पूछना हो तो “कः पठति?” बनेगा। “बालिका पठति” से “का पठति?” और “सः फलम् खादति” में कर्म के लिए “सः किं खादति?” होगा।

पूछी जानकारी

प्रश्नवाचक

उदाहरण

स्थान

कुत्र

ते कुत्र पठन्ति?

समय

कदा

सः कदा आगच्छति?

साधन

केन

सः केन लिखति?

उद्देश्य

किमर्थम्

सः किमर्थं गच्छति?

स्वामित्व

कस्य

एतत् कस्य पुस्तकम्?

प्रकार

कथम्

सः कथं पठति?

“एकपदेन” में पूरा वाक्य और “पूर्णवाक्येन” में केवल असम्बद्ध शब्द न दें। उत्तर बनाते समय प्रश्न के अनुसार विभक्ति बदलनी पड़ सकती है। “कुत्र” के उत्तर में मूल अंश की सूचना को “पुस्तकालये” के स्थानसूचक रूप में रखना एक उदाहरण है।

10. सन्दर्भ और पठन-अभ्यास का संगठन कीजिए

सन्दर्भ में पाठ, ग्रन्थ या प्रसंग की वही जानकारी दें जो दी गई हो या विश्वसनीय रूप से ज्ञात हो। मौलिक गद्यांश को किसी प्राचीन ग्रन्थ का अंश न बताएँ। निर्धारित पुस्तक के पाठ पर प्रश्न हो तो उसका वास्तविक नाम और प्रसंग लिखें। अनुमानित लेखक जोड़ने से सही अर्थ वाला उत्तर भी तथ्यगत रूप से गलत बन सकता है।

अभ्यास में पहले स्पष्ट पठन, फिर पदच्छेद, फिर अन्वय और अन्त में अर्थ करें। साथी से सुनवाकर स्वर-दीर्घता, अन्तिम म् तथा विसर्ग जाँचें। हर बार केवल गति न मापें। शुद्ध रूप और अर्थ का मेल लक्ष्य है। पढ़े वाक्य से कर्ता-क्रिया खोजने का छोटा अभ्यास पठन और व्याकरण दोनों को मजबूत करता है।

प्रश्न हल करने की विधि

  1. अंश धीरे पढ़कर स्वर, हलन्त, संयुक्त वर्ण और विराम पहचानिए।

  2. जुड़े पदों का सन्धि-सम्मत पदच्छेद कीजिए।

  3. क्रिया से कर्ता तथा विभक्ति-सूचक सम्बन्ध खोजिए।

  4. संस्कृत में अन्वय और हिंदी में सरलार्थ अलग लिखिए।

  5. प्रश्न के अनुसार एकपदीय या पूर्णवाक्य उत्तर दीजिए।

  6. रूप, अर्थ और दिए सन्दर्भ से अपना उत्तर मिलाइए।

सम्बन्ध

  • शब्दरूप से कर्ता, कर्म और दूसरे सम्बन्ध पहचानने में सहायता मिलती है।

  • धातुरूप से क्रिया का पुरुष, वचन और समय स्पष्ट होता है।

  • सन्धि और समास पढ़े हुए पद का मूल रूप तथा अर्थ खोजने देते हैं।

सामान्य त्रुटियाँ

  • दीर्घ स्वर को केवल अधिक जोर समझना; उसकी अवधि भी अलग है।

  • पदच्छेद में विसर्ग या अन्तिम म् मिटाना; मूल पद का रूप सुरक्षित रखें।

  • अन्वय की जगह हिंदी अनुवाद लिखना; दोनों की भाषा और भूमिका अलग हैं।

  • मौलिक अंश का ग्रन्थ-नाम गढ़ना; केवल उपलब्ध प्रमाण दें।

पुनरावृत्ति सूची

  • मैं स्वर, व्यञ्जन और प्रमुख उच्चारण-स्थान पहचान सकता/सकती हूँ।

  • मैं संयुक्त वर्ण, अनुस्वार और विसर्ग सावधानी से पढ़ सकता/सकती हूँ।

  • मैं श्लोक का पदच्छेद, अन्वय और सरलार्थ बना सकता/सकती हूँ।

  • मैं गद्यांश से शुद्ध संस्कृत उत्तर और प्रश्न बना सकता/सकती हूँ।

  • मैं उत्तर का रूप, अर्थ और सन्दर्भ जाँच सकता/सकती हूँ।

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