परिचय
संस्कृत में शब्दरूप संज्ञा या सर्वनाम की वाक्यगत भूमिका बताते हैं। “बालकः पुस्तकं पठति” और “पुस्तकं बालकः पठति” में मूल अर्थ समान रहता है, क्योंकि रूप स्पष्ट करते हैं कि पढ़ने वाला कौन है और पढ़ी जाने वाली वस्तु क्या है। केवल शब्दक्रम देखकर अर्थ निकालना इसलिए पर्याप्त नहीं।
रूपों को याद करने के साथ उनके उपयोग का अभ्यास जरूरी है। “रामेण”, “रामाय” और “रामात्” एक व्यक्ति से जुड़े रूप हैं, लेकिन साधन, प्राप्तकर्ता और अलग होने के स्रोत जैसे सम्बन्ध बदलते हैं। इस अध्याय में प्रमुख संज्ञा-सर्वनामों की पूरी सारणियाँ, कारक और सामान्य उपपद-प्रयोग दिए गए हैं। निर्धारित पाठ्यक्रम में अपेक्षित शब्द-सूची शिक्षक से मिलाएँ।
अधिगम उद्देश्य
लिंग, वचन, विभक्ति और कारक में अन्तर समझाना।
प्रमुख अकारान्त, आकारान्त, इकारान्त और उकारान्त शब्दों के रूप लिखना।
अस्मद् और युष्मद् के रूप सही प्रसंग में चुनना।
कारक तथा उपपद के अनुसार विभक्ति लगाना।
विशेषण और विशेष्य में लिंग-वचन-विभक्ति का मेल करना।
वाक्य-पूर्ति और प्रश्न-निर्माण में रूप की जाँच करना।
मुख्य अवधारणाएँ
1. रूप के तीन निर्णय समझिए
संज्ञा का लिंग पुल्लिंग, स्त्रीलिंग या नपुंसकलिंग होता है। वचन में एकवचन, द्विवचन और बहुवचन हैं। दो वस्तुओं के लिए द्विवचन विशेष रूप से उपयोगी है—बालकौ दो बालक और बालकाः तीन या अधिक बालक। विभक्ति वाक्य में सम्बन्ध का रूप है। सात विभक्तियों के साथ सम्बोधन के रूप भी पढ़े जाते हैं।
पहले मूल शब्द और उसका वर्ग पहचानें, फिर वचन और सम्बन्ध चुनें। “फल” नपुंसकलिंग है, इसलिए प्रथमा बहुवचन फलानि होगा, फलाः नहीं। सभी अकारान्त शब्द राम की प्रथमा-द्वितीया की तरह नहीं चलते। रूप का अन्त और व्याकरणिक वर्ग दोनों देखना आवश्यक है।
2. राम और लता की पूरी सारणियाँ
राम अकारान्त पुल्लिंग और लता आकारान्त स्त्रीलिंग है। सम्बोधन में हे केवल पुकार का संकेत है, मूल रूप का हिस्सा नहीं।
विभक्ति | राम एक | राम द्वि | राम बहु |
|---|---|---|---|
प्रथमा | रामः | रामौ | रामाः |
द्वितीया | रामम् | रामौ | रामान् |
तृतीया | रामेण | रामाभ्याम् | रामैः |
चतुर्थी | रामाय | रामाभ्याम् | रामेभ्यः |
पञ्चमी | रामात् | रामाभ्याम् | रामेभ्यः |
षष्ठी | रामस्य | रामयोः | रामाणाम् |
सप्तमी | रामे | रामयोः | रामेषु |
सम्बोधन | हे राम | हे रामौ | हे रामाः |
विभक्ति | लता एक | लता द्वि | लता बहु |
|---|---|---|---|
प्रथमा | लता | लते | लताः |
द्वितीया | लताम् | लते | लताः |
तृतीया | लतया | लताभ्याम् | लताभिः |
चतुर्थी | लतायै | लताभ्याम् | लताभ्यः |
पञ्चमी | लतायाः | लताभ्याम् | लताभ्यः |
षष्ठी | लतायाः | लतयोः | लतानाम् |
सप्तमी | लतायाम् | लतयोः | लतासु |
सम्बोधन | हे लते | हे लते | हे लताः |
रामेण में णत्व है, जबकि बालकेन में न रहता है। इसलिए समान रूप-पद्धति का अर्थ हर अक्षर की यन्त्रवत् नकल नहीं। उदाहरण: “रामेण सह बालकः गच्छति” में सह के कारण तृतीया है। “लतायां पुष्पाणि सन्ति” में लता पर फूल होने का स्थानसूचक सम्बन्ध है।
3. फल की नपुंसकलिंग सारणी
नपुंसकलिंग में प्रथमा और द्वितीया के रूप समान होते हैं। सम्बोधन में एकवचन का अन्त अलग ध्यान देने योग्य है। दूसरे रूप अकारान्त पद्धति से बनते हैं।
विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथमा | फलम् | फले | फलानि |
द्वितीया | फलम् | फले | फलानि |
तृतीया | फलेन | फलाभ्याम् | फलैः |
चतुर्थी | फलाय | फलाभ्याम् | फलेभ्यः |
पञ्चमी | फलात् | फलाभ्याम् | फलेभ्यः |
षष्ठी | फलस्य | फलयोः | फलानाम् |
सप्तमी | फले | फलयोः | फलेषु |
सम्बोधन | हे फल | हे फले | हे फलानि |
“द्वे फले स्तः” में दो फलों के लिए द्विवचन है। “बालिका फलानि खादति” में कर्ता एक है पर कर्म अनेक; क्रिया कर्ता से एकवचन में रहती है। केवल फलानि का बहुवचन देखकर खादन्ति करना गलत होगा। इसी तरह पुस्तकम्, पुस्तके, पुस्तकानि में प्रथमा-द्वितीया का समान नियम मिलता है।
4. हरि और गुरु के रूप समझिए
हरि इकारान्त पुल्लिंग और गुरु उकारान्त पुल्लिंग है। पितृ जैसे ऋकारान्त शब्द इस सारणी से नहीं चलते; अपने निर्धारित शब्दों को अलग वर्ग में सीखें।
विभक्ति | हरि एक | हरि द्वि | हरि बहु |
|---|---|---|---|
प्रथमा | हरिः | हरी | हरयः |
द्वितीया | हरिम् | हरी | हरीन् |
तृतीया | हरिणा | हरिभ्याम् | हरिभिः |
चतुर्थी | हरये | हरिभ्याम् | हरिभ्यः |
पञ्चमी | हरेः | हरिभ्याम् | हरिभ्यः |
षष्ठी | हरेः | हर्योः | हरीणाम् |
सप्तमी | हरौ | हर्योः | हरिषु |
सम्बोधन | हे हरे | हे हरी | हे हरयः |
विभक्ति | गुरु एक | गुरु द्वि | गुरु बहु |
|---|---|---|---|
प्रथमा | गुरुः | गुरू | गुरवः |
द्वितीया | गुरुम् | गुरू | गुरून् |
तृतीया | गुरुणा | गुरुभ्याम् | गुरुभिः |
चतुर्थी | गुरवे | गुरुभ्याम् | गुरुभ्यः |
पञ्चमी | गुरोः | गुरुभ्याम् | गुरुभ्यः |
षष्ठी | गुरोः | गुर्वोः | गुरूणाम् |
सप्तमी | गुरौ | गुर्वोः | गुरुषु |
सम्बोधन | हे गुरो | हे गुरू | हे गुरवः |
पञ्चमी द्विवचन गुरुभ्याम् है, जबकि षष्ठी और सप्तमी द्विवचन गुर्वोः हैं। यह अन्तर सम्बन्ध पहचानने के अभ्यास में महत्त्वपूर्ण है। “गुरवे नमः” चतुर्थी और “गुरुणा सह” तृतीया के प्रयोग हैं। विभक्ति चुनना केवल हिन्दी के को या से को देखकर नहीं, संस्कृत की रचना देखकर होता है।
5. सर्वनाम अस्मद् और युष्मद्
अस्मद् बोलने वाले और युष्मद् सुनने वाले का बोध कराता है। नीचे पूर्ण सामान्य रूप दिए हैं; मे, ते, नौ, वाम् जैसे संक्षिप्त वैकल्पिक रूप अलग व्याकरणिक शर्तों से आते हैं।
विभक्ति | अस्मद् एक | अस्मद् द्वि | अस्मद् बहु |
|---|---|---|---|
प्रथमा | अहम् | आवाम् | वयम् |
द्वितीया | माम् | आवाम् | अस्मान् |
तृतीया | मया | आवाभ्याम् | अस्माभिः |
चतुर्थी | मह्यम् | आवाभ्याम् | अस्मभ्यम् |
पञ्चमी | मत् | आवाभ्याम् | अस्मत् |
षष्ठी | मम | आवयोः | अस्माकम् |
सप्तमी | मयि | आवयोः | अस्मासु |
विभक्ति | युष्मद् एक | युष्मद् द्वि | युष्मद् बहु |
|---|---|---|---|
प्रथमा | त्वम् | युवाम् | यूयम् |
द्वितीया | त्वाम् | युवाम् | युष्मान् |
तृतीया | त्वया | युवाभ्याम् | युष्माभिः |
चतुर्थी | तुभ्यम् | युवाभ्याम् | युष्मभ्यम् |
पञ्चमी | त्वत् | युवाभ्याम् | युष्मत् |
षष्ठी | तव | युवयोः | युष्माकम् |
सप्तमी | त्वयि | युवयोः | युष्मासु |
इन सर्वनामों के रूप लिंग के आधार पर अलग नहीं होते। उदाहरण “वयं पठामः”, “यूयं पठथ” और “तुभ्यं पुस्तकं ददामि” में पुरुष तथा विभक्ति दोनों का अलग योगदान है। मूल शब्द और वाक्य में सन्धियुक्त रूप अलग दिख सकते हैं, जैसे तुभ्यम् से तुभ्यं पुस्तकं।
6. कारक का अर्थ और विभक्ति चुनिए
कर्ता क्रिया का प्रमुख करने वाला, कर्म उसका लक्ष्य, करण साधन, सम्प्रदान प्राप्तकर्ता, अपादान अलग होने का स्रोत और अधिकरण आधार या स्थान बताता है। सम्बन्ध के लिए षष्ठी है, लेकिन पारम्परिक कारक-गणना में सम्बन्ध को क्रिया से सीधा जुड़ा कारक नहीं माना जाता।
सम्बन्ध | सामान्य विभक्ति | उदाहरण |
|---|---|---|
कर्ता | प्रथमा | बालकः पठति |
कर्म | द्वितीया | सः पुस्तकं पठति |
करण | तृतीया | सः लेखन्या लिखति |
सम्प्रदान | चतुर्थी | सः मित्राय फलं ददाति |
अपादान | पञ्चमी | वृक्षात् पत्रं पतति |
सम्बन्ध | षष्ठी | बालकस्य पुस्तकम् |
अधिकरण | सप्तमी | गृहे बालकः अस्ति |
ये सामान्य सक्रिय वाक्यों के मार्गदर्शक हैं, हर प्रयोग का एकमात्र नियम नहीं। वाच्य या विशेष धातु बदलने पर विभक्ति का व्यवहार बदल सकता है। अर्थ और निर्धारित व्याकरणिक नियम दोनों देखें।
7. उपपद और विशेषण का सम्बन्ध जाँचिए
कुछ शब्द निश्चित विभक्ति माँगते हैं। सह के साथ तृतीया—मित्रेण सह। नमः के साथ चतुर्थी—गुरवे नमः। विना के साथ द्वितीया, तृतीया और पञ्चमी तीनों प्रयोग मिलते हैं; प्रश्न में शिक्षक द्वारा पढ़ाया रूप या उपयुक्त विकल्प देखें। “परितः” के साथ द्वितीया का सामान्य प्रयोग है—विद्यालयं परितः वृक्षाः सन्ति।
विशेषण को विशेष्य के लिंग, वचन और विभक्ति के अनुसार रखें। “सुन्दराणि फलानि” नपुंसकलिंग बहुवचन है। “सुन्दरः बालकः” पुल्लिंग एकवचन है। समान अन्त दिखाई देना हमेशा पर्याप्त नहीं, क्योंकि अलग रूप-पद्धतियों में अन्त अलग हो सकते हैं। पहले व्याकरणिक पहचान करें, फिर सम्बन्ध तय करें।
8. वाक्य-पूर्ति और प्रश्न-निर्माण का अभ्यास
हल किया उदाहरण: “बालकः ___ सह गच्छति” में राम दिया हो तो सह के कारण तृतीया एकवचन चाहिए—रामेण। “द्वे ___ स्तः” में फल का रूप—फले। “एतत् ___ पुस्तकम्” में अहम् का सम्बन्ध—मम। निर्णय में उपपद, संख्या और अर्थ तीनों अलग आधार हैं।
प्रश्न-निर्माण में “रामस्य पुस्तकम्” से “कस्य पुस्तकम्?” और “रामेण सह” से “केन सह?” बनता है। प्रश्नवाचक रूप को उसी सम्बन्ध के अनुकूल रखें। यदि द्विवचन का एक रूप तृतीया, चतुर्थी और पञ्चमी में समान हो, तो केवल अन्त देखकर विभक्ति निश्चित न करें; वाक्य का अर्थ और उपपद आवश्यक है। रूप-समानता संस्कृत की विशेषता है, गलती नहीं।
9. स्मरण की वैज्ञानिक और व्याकरणिक रणनीति
सारणी पंक्ति और स्तम्भ दोनों दिशा में बोलें। एक दिन केवल एकवचन, फिर द्विवचन के समान रूप, फिर बहुवचन पढ़ें। प्रत्येक विभक्ति के साथ छोटा वाक्य बनाना रूप को अर्थ से जोड़ता है। गलत रूप लिखने के बाद केवल सही रूप न देखें; यह भी बताएँ कि आपने वचन, वर्ग या सम्बन्ध में कौन-सा निर्णय गलत लिया था।
परीक्षा में पहले आवश्यक रूप लिखें, पूरी सारणी तभी जब माँगी गई हो। विसर्ग, दीर्घ स्वर और अन्तिम म् की जाँच करें। “गुरवे” को रामाय की नकल से “गुरुाय” लिखना गलत है। अलग वर्ग का नियम पहचानना याद करने की मात्रा घटाता है और नए शब्द पर पद्धति लागू करने देता है।
प्रश्न हल करने की विधि
मूल शब्द, लिंग और अन्त के आधार पर रूप-पद्धति चुनिए।
एक, दो या अनेक की संख्या निर्धारित कीजिए।
क्रिया, सम्बन्ध और उपपद से विभक्ति चुनिए।
सारणी का रूप लिखकर सन्धि की जरूरत देखिए।
विशेषण तथा क्रिया का मेल जाँचिए।
पूरे वाक्य का अर्थ दोबारा पढ़िए।
सम्बन्ध
पठन में विभक्ति से पदच्छेद के बाद अन्वय बनता है।
धातुरूप के पुरुष-वचन कर्ता के रूप से जुड़ते हैं।
अनुवाद में हिंदी के सम्बन्ध को सही संस्कृत विभक्ति देना आवश्यक है।
सामान्य त्रुटियाँ
दो वस्तुओं के लिए बहुवचन लगाना; द्विवचन का रूप चुनें।
नपुंसकलिंग फल के लिए फलाः लिखना; सही बहुवचन फलानि है।
गुरु को राम की तरह बदलना; उकारान्त पद्धति अपनाएँ।
एक ही अन्त से विभक्ति निश्चित करना; समान रूपों का प्रसंग देखें।
पुनरावृत्ति सूची
मैं लिंग, वचन, विभक्ति और कारक का अन्तर समझा सकता/सकती हूँ।
मैं प्रमुख संज्ञा-सर्वनामों की सारणियाँ शुद्ध लिख सकता/सकती हूँ।
मैं उपपद तथा अर्थ के अनुसार रूप चुन सकता/सकती हूँ।
मैं विशेषण-विशेष्य और कर्ता-क्रिया का मेल जाँच सकता/सकती हूँ।
मैं वाक्य-पूर्ति और प्रश्न-निर्माण कर सकता/सकती हूँ।