परिचय
समास में सम्बन्धित पद संक्षिप्त होकर एक समस्त पद बनाते हैं। “राज्ञः पुत्रः” से “राजपुत्रः” बनता है और राजा का पुत्र अर्थ सुरक्षित रहता है। शब्द-निर्माण का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष उपसर्ग और प्रत्यय हैं, जो मूल अर्थ से सम्बन्ध रखते हुए नए पद बनाते हैं। इन प्रक्रियाओं को समझने से संस्कृत का लम्बा शब्द अपरिचित अक्षरों का समूह नहीं रहता।
किसी शब्द को केवल काट देना सही विश्लेषण नहीं है। अर्थपूर्ण विग्रह, पदों की प्रधानता और मूल रूपों का सम्बन्ध आवश्यक है। इस अध्याय में प्रमुख समासों के साथ क्त्वा, ल्यप् और तुमुन् जैसे उपयोगी प्रत्यय समझाए गए हैं। कौन-से समास और प्रत्यय परीक्षा में निर्धारित हैं, यह अपनी पाठ्य-सूची से मिलाएँ।
अधिगम उद्देश्य
समस्त पद, विग्रह, पूर्वपद और उत्तरपद पहचानना।
प्रमुख समासों का अर्थ और प्रधानता के आधार पर वर्गीकरण करना।
उपसर्ग के कारण धातु के अर्थ में परिवर्तन समझाना।
क्त्वा, ल्यप्, तुमुन्, क्त और क्तवतु के सामान्य रूप पहचानना।
प्रत्यययुक्त पद और वाक्य की मुख्य क्रिया अलग करना।
विग्रह और पद-निर्माण की अर्थ तथा रूप से जाँच करना।
मुख्य अवधारणाएँ
1. समास के चार आधार पहचानिए
पूर्वपद पहले और उत्तरपद बाद में आता है। समस्त पद उनका संक्षिप्त रूप है। विग्रह छिपे अर्थ-सम्बन्ध को स्पष्ट करता है। “ग्राममार्गः” का विग्रह “ग्रामस्य मार्गः” है। ग्राम और मार्ग का सम्बन्ध षष्ठी से प्रकट हुआ, जबकि संयुक्त रूप में वह विभक्ति दिखाई नहीं देती।
अन्तिम विभक्ति वाक्य के अनुसार आती है—“ग्राममार्गः दीर्घः अस्ति” और “सः ग्राममार्गं पश्यति” में एक ही संयुक्त आधार अलग रूप लेता है। समास शब्द का अर्थ-संगठन है; उसके बाद वाक्य की विभक्ति अलग निर्णय है। सन्धि जुड़ते वर्णों को बदल सकती है, लेकिन हर समास में दिखाई देने वाला ध्वनि-परिवर्तन आवश्यक नहीं।
2. तत्पुरुष में सम्बन्ध और उत्तरपद देखें
तत्पुरुष समास में सामान्यतः उत्तरपद प्रधान होता है। “राजपुत्रः” पुत्र का प्रकार बताता है, राजा का नहीं। विग्रह में कारक या सम्बन्धसूचक विभक्ति से पदों का सम्बन्ध सामने आता है।
समस्त पद | विग्रह | सम्बन्ध |
|---|---|---|
ग्रामगतः | ग्रामं गतः | द्वितीया |
हस्तलिखितम् | हस्तेन लिखितम् | तृतीया |
ग्रामनिर्गतः | ग्रामात् निर्गतः | पञ्चमी |
राजपुत्रः | राज्ञः पुत्रः | षष्ठी |
वनवासः | वने वासः | सप्तमी |
तालिका के रूप उदाहरण हैं; हर संज्ञा के साथ हर विभक्ति जोड़कर मनमाना समास नहीं बनता। प्रचलित और पाठ्यपुस्तक में मान्य शब्द अपनाएँ। नञ् तत्पुरुष में निषेध का अर्थ है—असत्यं = न सत्यम्। स्वर से पहले अन् जैसे रूप मिल सकते हैं, पर केवल अ या अन से शुरू हर शब्द को नञ् समास न मानें।
3. कर्मधारय में एक ही वस्तु का वर्णन देखें
कर्मधारय में दोनों पद प्रायः एक ही वस्तु के लिए विशेषण-विशेष्य या समानाधिकरण सम्बन्ध में होते हैं। “नीलोत्पलम्” का विग्रह “नीलम् उत्पलम्”—नीला कमल। “महापुरुषः” में “महान् पुरुषः” है। कई व्याकरण-परम्पराएँ इसे तत्पुरुष का भेद मानती हैं।
तुलना में “नीलम् उत्पलम्” का मुख्य अर्थ कमल ही है; उसकी विशेषता नीला होना है। यदि कोई समस्त पद किसी बाहर के व्यक्ति को सूचित करे, तो बहुव्रीहि की सम्भावना बनती है। इसलिए केवल रंग या विशेषण देखकर कर्मधारय तय नहीं करें। प्रयोग और विग्रह साथ देखें। “सुन्दरं पुस्तकम्” जैसे साधारण विशेषण-विशेष्य समूह को प्रश्न के बिना स्वचालित संयुक्त शब्द में बदलना भी जरूरी नहीं।
4. द्वन्द्व और द्विगु अलग रखिए
द्वन्द्व में दोनों पद प्रधान होते हैं। “रामलक्ष्मणौ” का विग्रह “रामः च लक्ष्मणः च” है। दो पुरुष होने से द्विवचन आता है। “मातापितरौ” में माता च पिता च का प्रचलित संयुक्त रूप है; अलग शब्दों की रूप-पद्धति के कारण इसे केवल अक्षर जोड़कर नहीं बनाया जा सकता।
द्विगु में संख्यावाची पूर्वपद और समूह का अर्थ प्रमुख है। “त्रिभुवनम्” तीन भुवनों के समाहार का संकेत देता है। केवल संख्या से शुरू हर शब्द द्विगु नहीं। “त्रिनेत्रः” यदि तीन नेत्रों वाले किसी बाहरी व्यक्ति का नाम या विशेषण है, तो प्रधानता बाहर जा सकती है। संख्या, समूह और वाक्य के संकेत तीनों देखें।
5. बहुव्रीहि में बाहरी अर्थ पहचानिए
बहुव्रीहि का अर्थ उसके दोनों घटकों से बाहर किसी व्यक्ति या वस्तु की ओर जाता है। “पीताम्बरः” का विग्रह “पीतम् अम्बरं यस्य सः”—जिसका वस्त्र पीला है। यहाँ मुख्य संकेत वस्त्र का नहीं, उसे धारण करने वाले का है। वही अक्षर किसी अन्य प्रसंग में पीले वस्त्र का सीधा नाम हों तो विश्लेषण बदल सकता है।
“दशाननः” का विग्रह “दश आननानि यस्य सः” है। केवल दस देखकर द्विगु लिखना गलत होगा। प्रश्न में वाक्य दिया हो तो पूछें—किसे विशेषित किया जा रहा है? बहुव्रीहि में समस्त पद का लिंग और विभक्ति उस बाहरी विशेष्य के अनुसार बदल सकती है। इसीलिए केवल अन्तिम घटक का लिंग देखकर हर रूप तय नहीं किया जा सकता।
6. अव्ययीभाव में अव्ययार्थ देखें
अव्ययीभाव में सामान्यतः पूर्वपद का अव्ययार्थ प्रधान होता है और पूरा पद अव्यय की तरह प्रयुक्त होता है। “प्रतिदिनम्” का अर्थ प्रत्येक दिन और “यथाशक्ति” का अर्थ शक्ति के अनुसार है। इनका कार्य समय या रीति बताना हो सकता है।
अव्यय का रूप कर्ता के लिंग-वचन से नहीं बदलता। “बालकः प्रतिदिनं पठति” और “बालिकाः प्रतिदिनं पठन्ति” में क्रिया बदलती है, प्रतिदिनम् का समयार्थ नहीं। वाक्य में अन्तिम म् का अनुस्वार रूप सन्धि के कारण दिख सकता है। इससे मूल पद की अव्ययता समाप्त नहीं होती। अव्ययीभाव और दूसरे समासों का अन्तर प्रधान अर्थ तथा प्रयोग से स्पष्ट कीजिए।
7. उपसर्ग धातु का अर्थ कैसे बदलते हैं
उपसर्ग धातु से पहले जुड़ता है। गम् का मूल जाना है; आ + गम् से आना और निर् + गम् से बाहर निकलना अर्थ मिलता है। “आगच्छति”, “निर्गच्छति” तथा “प्रतिगच्छति” में मूल धातु जुड़ी है, पर दिशा और प्रसंग बदलते हैं। सभी उपसर्गों का एक स्थिर हिंदी अर्थ हर क्रिया में लागू नहीं होता।
उदाहरण “प्र + विश् = प्रविशति” भीतर प्रवेश करने का अर्थ देता है। “उप + विश् = उपविशति” बैठने के प्रचलित अर्थ में आता है। इसलिए हर शब्द का अर्थ केवल उपसर्ग के एक कोशार्थ और धातु के एक कोशार्थ को जोड़कर नहीं निकलेगा। प्रचलित अर्थ और पूरे वाक्य का सन्दर्भ देखें। पदच्छेद में मूल धातु और रूप-सिद्धि को अलग पहचानना उपयोगी है।
8. क्त्वा और ल्यप् से पूर्वकालिक क्रिया बनाइए
क्त्वा एक ही कर्ता की पहले पूरी हुई क्रिया बताता है। “बालकः पठित्वा लिखति”—बालक पढ़कर लिखता है। पढ़ना पहले और लिखना बाद में है। पठित्वा अव्यय है, जबकि लिखति वाक्य की मुख्य तिङन्त क्रिया।
धातु | रूप | अर्थ |
|---|---|---|
पठ् | पठित्वा | पढ़कर |
लिख् | लिखित्वा | लिखकर |
गम् | गत्वा | जाकर |
दृश् | दृष्ट्वा | देखकर |
कृ | कृत्वा | करके |
उपसर्गयुक्त धातुओं में सामान्यतः ल्यप् के य रूप का प्रयोग मिलता है—आगत्य, उपविश्य, प्रणम्य। “सः आगत्य उपविशति” में आकर बैठना है। हर धातु में य सीधे जोड़ना पर्याप्त नहीं; आधार बदल सकता है। “रामः पठित्वा सीता लिखति” में सामान्य पूर्वकालिक एक-कर्ता सम्बन्ध टूटता है, इसलिए उसे ऐसा ही जोड़ना गलत होगा।
9. तुमुन् से उद्देश्य और क्त से पूर्णता समझिए
तुमुन् उद्देश्य या करने की इच्छा आदि में उपयोगी है। पठितुम् पढ़ने के लिए, गन्तुम् जाने के लिए और कर्तुम् करने के लिए है। “सः पठितुं पुस्तकालयं गच्छति” का अर्थ वह पढ़ने के लिए पुस्तकालय जाता है। इसे “पढ़कर जाता है” समझना क्त्वा और तुमुन् का भ्रम है।
क्त से कृदन्त रूपों में पूर्ण या किया गया कार्य दिखाई दे सकता है—लिखितम्, कृतम्, गतम्। “लिखितं पत्रम्” में लिखितम् पत्रम् का विशेषण है। क्तवतु से कर्ता के किए कार्य का बोध मिलता है—बालकः पठितवान्, बालिका पठितवती, बालकाः पठितवन्तः। ये लिंग-वचन के अनुसार बदलते हैं, इसलिए इन्हें पठित्वा जैसे अव्यय के समान न समझें।
10. संयुक्त अभ्यास में अर्थ और व्याकरण जोड़िए
हल किया उदाहरण: “बालकः पुस्तकं पठति। सः उत्तरं लिखति।” पढ़ना पहले और लिखना बाद में रखना हो तो “बालकः पुस्तकं पठित्वा उत्तरं लिखति” बनेगा। कर्ता एक है और पूर्वकालिकता स्पष्ट है। यदि उद्देश्य कहना हो—उत्तर लिखने के लिए पढ़ता है—तो अर्थ और रचना अलग होगी।
समास-प्रश्न में पहले विग्रह लिखें, फिर प्रधान पद, फिर प्रकार। प्रत्यय-प्रश्न में पहले मूल धातु और अपेक्षित अर्थ देखें—करके, करने के लिए या किया हुआ। तैयार रूप को वाक्य में रखकर अनुवाद करें। यदि अर्थ बदल गया तो केवल परिचित शब्द देखकर उत्तर चुनना पर्याप्त नहीं। यही जाँच अनुप्रयोग-आधारित प्रश्नों में सबसे उपयोगी है।
प्रश्न हल करने की विधि
तय करें कि प्रश्न अर्थ-संक्षेप, उपसर्ग या प्रत्यय पर है।
समास में सार्थक विग्रह और प्रधानता पहचानें।
प्रत्यय में धातु, पूर्वक्रिया या उद्देश्य का सम्बन्ध देखें।
सही आधार-परिवर्तन तथा अन्तिम रूप लिखें।
कृदन्त के लिंग-वचन और अव्यय की स्थिरता अलग जाँचें।
पूरे वाक्य का अर्थ मूल निर्देश से मिलाएँ।
सम्बन्ध
सन्धि से जुड़े पदों के ध्वनि-परिवर्तन समझ आते हैं।
शब्दरूप समस्त पद और कृदन्त विशेषण के विभक्ति-रूप बनाते हैं।
अनुवाद में पहले करके और करने के लिए का अन्तर अर्थ सुरक्षित रखता है।
सामान्य त्रुटियाँ
हर संख्यावाची पूर्वपद को द्विगु कहना; समूह और बाहरी अर्थ देखें।
पीताम्बरः को हर प्रसंग में वस्त्र ही मानना; वह धारणकर्ता का संकेत भी है।
पठित्वा और पठितुम् को एक समझना; पहले पढ़कर और दूसरे में पढ़ने के लिए है।
क्तवतु के रूप को अव्यय मानना; वह लिंग-वचन के अनुसार बदलता है।
पुनरावृत्ति सूची
मैं विग्रह, प्रधानता और प्रमुख समास पहचान सकता/सकती हूँ।
मैं उपसर्ग से बदले अर्थ का प्रसंगानुकूल उपयोग कर सकता/सकती हूँ।
मैं क्त्वा, ल्यप् और तुमुन् के रूप अलग समझा सकता/सकती हूँ।
मैं क्त तथा क्तवतु में रूप और कार्य का अन्तर बता सकता/सकती हूँ।
मैं अर्थ सुरक्षित रखकर वाक्य-संयोजन कर सकता/सकती हूँ।