Skip to content
9 MIN LESSON · SANSKRIT

Class 8 Sanskrit: Sandhi and Sound Change: Complete Concepts and Practice

संस्कृत — सन्धि-विच्छेद, दीर्घ, गुण, वृद्धि, यण्, अयादि, पूर्वरूप, परिचित व्यञ्जन और नासिक्य परिवर्तन, विसर्ग, अवग्रह, सूत्र और अर्थ-आधारित शुद्धि।

परिचय

सन्धि पास आने वाले वर्णों के मेल से होने वाला ध्वनि-परिवर्तन है। उससे बने रूप को मूल पदों में अलग करना सन्धि-विच्छेद कहलाता है। संस्कृत पढ़ते समय एक लम्बा दिखाई देने वाला पद कई मूल शब्दों का मेल हो सकता है। इसलिए सन्धि अर्थ, उच्चारण और अनुवाद तीनों से जुड़ी है।

विद्या + आलयः से विद्यालयः बनता है। दोनों पदों के मिलने पर आ + आ का एक दीर्घ आ हो जाता है। लेकिन हर शब्द को अनुमान से काटना सही नहीं। नियम के साथ मूल पदों की शुद्धता और वाक्य का अर्थ भी देखना चाहिए। इस पाठ में प्रमुख स्वर-सन्धियाँ और परिचित व्यञ्जन-विसर्ग परिवर्तन क्रम से समझेंगे।

अधिगम उद्देश्य

  • सन्धि और सन्धि-विच्छेद का अन्तर समझाना।

  • स्वर-सन्धि के दीर्घ, गुण, वृद्धि, यण् और अयादि रूप पहचानना।

  • परिचित व्यञ्जन-सन्धि और अनुस्वार-परिवर्तन समझाना।

  • विसर्ग, ओ और अवग्रह के सम्बन्ध वाले सामान्य उदाहरण पढ़ना।

  • मूल वर्णों और अर्थ की सहायता से सही विच्छेद चुनना।

  • गलत नियम लगाने तथा अंशों को मनमाने ढंग से तोड़ने की त्रुटि सुधारना।

मुख्य अवधारणाएँ

1. परिवर्तन की सीमा और प्रकार

सन्धि में मुख्य ध्यान मिलने वाले अन्तिम और आरम्भिक वर्ण पर होता है। विद्या + आलयः में पूरी विद्या या पूरा आलयः नहीं बदलता; सीमा पर आए स्वर मिलते हैं। शब्द के शेष भाग को अनावश्यक न बदलें।

तीन प्रमुख प्रकार हैं: स्वर-सन्धि, व्यञ्जन-सन्धि और विसर्ग-सन्धि। स्वर के बाद स्वर आने पर स्वर-सन्धि की सम्भावना जाँचें। व्यञ्जन के मेल में वर्ग और घोष जैसे गुण महत्त्वपूर्ण होते हैं। विसर्ग के बाद परिवर्तन में उससे पहले का स्वर और अगला वर्ण दोनों देखने पड़ते हैं। केवल बदले रूप को देखकर नाम याद करना पर्याप्त नहीं।

2. दीर्घ स्वर-सन्धि

समान स्वर मिलकर दीर्घ होते हैं। परम्परागत सूत्र अकः सवर्णे दीर्घः है। यहाँ आरम्भिक अभ्यास में अ/आ, इ/ई और उ/ऊ के मेल देखें। ह्रस्व और दीर्घ उसी स्वर-परिवार में मिल सकते हैं।

मेल

परिणाम

उदाहरण

अ/आ + अ/आ

आ

हिम + आलयः = हिमालयः

इ/ई + इ/ई

ई

गिरि + ईशः = गिरीशः

उ/ऊ + उ/ऊ

ऊ

भानु + उदयः = भानूदयः

विद्या + आलयः = विद्यालयः में आ + आ है। रवि + इन्द्रः = रवीन्द्रः में इ + इ है। नियम में केवल दोनों स्वर देखना नहीं, उनके मूल पद भी शुद्ध लिखना जरूरी है। विद्यालयः को विद्या + लयः कहने पर पूरा मूल शब्द आलयः खो जाता है।

3. गुण सन्धि

आद्गुणः के आधार पर अ या आ के बाद इ/ई आने पर ए, उ/ऊ आने पर ओ और ऋ आने पर अर् होता है। यह समान स्वरों का मेल नहीं, इसलिए दीर्घ सन्धि से अलग है।

मेल

परिणाम

मौलिक अभ्यास

अ/आ + इ/ई

ए

नर + इन्द्रः = नरेन्द्रः

अ/आ + उ/ऊ

ओ

महा + उत्सवः = महोत्सवः

अ/आ + ऋ

अर्

महा + ऋषिः = महर्षिः

सूर्य + उदयः = सूर्योदयः में सूर्य का अन्तर्निहित अ और उदयः का उ मिलकर ओ बनता है। सूर्य को ऊ पर समाप्त मान लेना गलत होगा। महर्षिः में ऋ केवल गायब नहीं होता; अ + ऋ का अर् रूप आता है। वर्ण-स्तर का परिवर्तन स्पष्ट लिखें।

4. वृद्धि सन्धि

वृद्धिरेचि के अनुसार अ/आ के बाद ए/ऐ हो तो ऐ, और ओ/औ हो तो औ होता है। गुण में अ + इ = ए, जबकि वृद्धि में अ + ए = ऐ है। अगले स्वर का भेद निर्णय करता है।

सदा + एव = सदैव में आ + ए से ऐ है। तथा + एव = तथैव भी इसी ढाँचे में है। महा + औषधम् = महौषधम् में आ + औ से औ है। वन + ओषधिः = वनौषधिः में अ + ओ का परिणाम औ है।

गलत उदाहरण “सदा + इव = सदैव” को सुधारें: आ + इ गुण से ए देगा, ऐ नहीं। सही विच्छेद सदा + एव है। इस तरह नियम लगाने से परिचित दिखता हुआ गलत विकल्प भी हटाया जा सकता है।

5. यण् सन्धि

इको यणचि के अनुसार इ/ई, उ/ऊ या ऋ के बाद भिन्न स्वर आने पर क्रमशः य्, व् या र् हो सकता है। समान स्वर हो तो पहले दीर्घ नियम जाँचें। यण् में स्वर का स्थान अर्धस्वर-जैसी व्यञ्जन ध्वनि लेती है।

मेल

परिवर्तन

उदाहरण

इ/ई + भिन्न स्वर

य्

इति + आदि = इत्यादि

उ/ऊ + भिन्न स्वर

व्

सु + आगतम् = स्वागतम्

ऋ + भिन्न स्वर

र्

पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा

यदि + अपि = यद्यपि में इ + अ पर य् आता है। अनु + एषणम् = अन्वेषणम् में उ के स्थान पर व् पहचानें। इसे केवल अक्षर जोड़ना न समझें; बदला वर्ण और शेष पद साथ लिखें।

6. अयादि और पूर्वरूप का परिचय

एचोऽयवायावः में ए, ऐ, ओ, औ के बाद स्वर आने पर क्रमशः अय्, आय्, अव्, आव् का परिवर्तन बताया जाता है। यह मुख्यतः शब्द-निर्माण में परिचित उदाहरणों से समझा जाता है: ने + अनम् = नयनम्, गै + अकः = गायकः, पो + अनः = पवनः, पौ + अकः = पावकः। इन आधारों को हर बार स्वतंत्र बोलचाल के शब्द न मानें; ये व्याकरणिक अभ्यास के रूप हैं।

पदान्त ए/ओ के बाद अ आने पर पूर्वरूप का परिचित प्रयोग मिलता है: ते + अपि = तेऽपि। ए बना रहता है और लुप्त अ का चिह्न अवग्रह ऽ दिखता है। यह अयादि के प्रत्येक सामान्य चित्र को यंत्रवत लगाने से अलग स्थिति है। कक्षा में दिए पदान्त-नियम और प्रसंग का ध्यान रखें।

7. व्यञ्जन-सन्धि में घोष का परिवर्तन

वर्गीय व्यञ्जन का पदान्त रूप अगले वर्ण से प्रभावित हो सकता है। परिचित जश्त्व में क्, त् जैसे अघोष पदान्त वर्ण घोष रूप में बदलते हैं। झलां जशोऽन्ते परम्परागत सूत्र है।

वाक् + ईशः = वागीशः में क् से ग्; जगत् + ईशः = जगदीशः में त् से द् परिवर्तन है। चर्त्व में अघोष वर्ण के पहले विपरीत दिशा का परिवर्तन मिलता है: सद् + कारः = सत्कारः, उद् + साहः = उत्साहः। इन उदाहरणों में केवल जोड़ नहीं, मिलने की सीमा पर व्यञ्जन बदलता है।

सभी व्यञ्जनों को एक जैसा बदलने का नियम न बनाएँ। वर्ग, स्थान और अगली ध्वनि देखकर परिचित रूप जाँचें। उन्नत अपवादों का अनुमान लगाने के बजाय निर्धारित उदाहरणों की सही प्रक्रिया बताना अधिक उपयोगी है।

8. समान स्थान और नासिक्य परिवर्तन

तत् + च = तच्च में त् के च्-जैसे रूप का मेल है। उत् + ज्वलः = उज्ज्वलः में ज् के निकट परिवर्तन मिलता है। इस परिवार में स्तोः श्चुना श्चुः सूत्र का परिचय दिया जाता है। तत् + लीनः = तल्लीनः में त् से ल् परिवर्तन है, जिसे तोर्लि से जोड़ा जाता है।

वर्गीय नासिक्य के मेल का परिचित उदाहरण जगत् + नाथः = जगन्नाथः है। पदान्त म् के बाद व्यञ्जन होने पर मोऽनुस्वारः के अनुसार “गृहम् + गच्छति = गृहं गच्छति” जैसा लेखन मिलता है।

अनुस्वार का उच्चारण आगे के वर्गीय व्यञ्जन के अनुकूल हो सकता है: अं + कितः के अभ्यास से अङ्कितः समझें। संयोग को पढ़ते समय ङ, ञ, ण, न, म के वर्ग याद रखें। हर जगह न् लिख देना सही नहीं।

9. विसर्ग के परिचित परिवर्तन

विसर्ग-सन्धि में विसर्ग से पहले का स्वर और अगला वर्ण देखें। अः के बाद अ आने का सामान्य पदान्त मेल रामः + अस्ति = रामोऽस्ति है। ओ बनता है और अगले अ के लोप का अवग्रह आता है।

अः के बाद घोष व्यञ्जन में परिचित रूप रामः + गच्छति = रामो गच्छति है। यहाँ अगले पद का आरम्भ अ नहीं, इसलिए रामोऽगच्छति लिखना अर्थ भी बदल देगा।

हरिः + अयम् = हरिरयम् में र्-रूप मिलता है। निः + आशा = निराशा भी र्-परिवर्तन का परिचित उदाहरण है। रामः + च = रामश्च में च के पहले श्-जैसा परिवर्तन पहचानें। सूत्रों की उन्नत शर्तें अनेक हैं; इस स्तर पर इन्हें सब परिस्थितियों पर लागू होने वाले एक नियम की तरह न फैलाएँ।

10. विच्छेद की प्रमाणयुक्त पद्धति

उदाहरण के लिए महोत्सवः को देखें। दिखाई देने वाला ओ संकेत देता है, पर अकेला ओ निर्णय नहीं है। महा और उत्सवः अर्थवान आधार हैं; आ + उ = ओ गुण से परिणाम मिलता है। इसलिए सही उत्तर महा + उत्सवः, गुण सन्धि है।

पित्राज्ञा में पितृ और आज्ञा का अर्थ तथा ऋ + आ से र् का यण्-परिवर्तन साथ मिलते हैं। पित + राज्ञा जैसा मनमाना विच्छेद मूल सम्बन्ध खो देता है। विकल्प चुनते समय नियम, पद और अर्थ—तीनों का मेल जाँचें।

11. वाक्य-पठन और शुद्धि

“रामोऽपि पठति” का पदच्छेद “रामः अपि पठति” है। अपि का अर्थ भी है, जिसे अनुवाद में बनाए रखें। “तेऽपि आगच्छन्ति” में ते अपि पहचानने से वे भी आते हैं का आशय स्पष्ट होता है। अवग्रह को उच्चारण में नया अ जोड़कर पढ़ना उचित नहीं।

सन्धि और समास अलग हैं। सन्धि वर्ण-परिवर्तन है, समास पदों के अर्थ-सम्बन्ध का संक्षेप। विद्यालयः में ध्वनि-मेल है; उसका विद्या का आलय अर्थगत विग्रह भी हो सकता है। दोनों प्रश्नों का उत्तर एक ही ढंग से न दें।

गलत रूप सुधारते समय केवल सही शब्द लिखकर न रुकें। यदि हिम + आलयः को हिमेलयः दिया हो, तो अ + आ = आ बताकर हिमालयः लिखें। कारण समझाने से अगला उदाहरण भी हल हो सकेगा।

प्रश्न हल करने की विधि

  1. मिलने वाले अन्तिम और आरम्भिक वर्ण पहचानें।

  2. स्वर, व्यञ्जन या विसर्ग की स्थिति अलग करें।

  3. उपयुक्त नियम की शर्तें जाँचें।

  4. केवल सीमा पर आवश्यक परिवर्तन करके शेष पद सुरक्षित रखें।

  5. विच्छेद में दोनों मूल पदों की शुद्धता और अर्थ जाँचें।

  6. नाम, प्रक्रिया और अंतिम रूप का परस्पर मेल सत्यापित करें।

सम्बन्ध

  • पठन और उच्चारण में सन्धि से जुड़े मूल पद पहचानना आवश्यक है।

  • शब्दरूप तथा धातुरूप की पहचान विच्छेद के बाद सही अन्वय में सहायता करती है।

  • समास और साहित्य-पठन में ध्वनि-मेल तथा अर्थ-सम्बन्ध दोनों अलग देखने पड़ते हैं।

सामान्य त्रुटियाँ

  • गुण और वृद्धि मिलाना; अ + इ और अ + ए का अन्तर देखें।

  • दीर्घ तथा यण् में भ्रम; समान और भिन्न स्वर पहले पहचानें।

  • हर ओ के बाद अवग्रह लगाना; अगले पद के लुप्त अ की स्थिति चाहिए।

  • मूल पद तोड़कर गलत आधार बनाना; अर्थ और नियम दोनों की पुष्टि करें।

पुनरावृत्ति सूची

  • मैं सन्धि और विच्छेद की प्रक्रिया बता सकता/सकती हूँ।

  • मैं प्रमुख स्वर-सन्धियाँ नियम और उदाहरण से पहचान सकता/सकती हूँ।

  • मैं परिचित व्यञ्जन तथा नासिक्य परिवर्तन समझा सकता/सकती हूँ।

  • मैं सामान्य विसर्ग और अवग्रह-प्रयोग पढ़ सकता/सकती हूँ।

  • मैं सही मूल पद चुनकर अर्थ बना सकता/सकती हूँ।

  • मैं गलत सन्धि को कारण सहित सुधार सकता/सकती हूँ।

Practise this topic →

Discussion

Sign in to join the discussion.

Sign in

No comments yet. Be the first to share your thoughts.