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9 MIN LESSON · SANSKRIT

Class 8 Sanskrit: Reading and Pronunciation: Complete Concepts and Practice

संस्कृत — स्वर-मात्रा, व्यञ्जन-वर्ग, उच्चारण-स्थान, प्राण, हलन्त, संयुक्ताक्षर, अनुस्वार, विसर्ग, अवग्रह, पदच्छेद, अन्वय, मौलिक गद्य-पठन और गीता-श्लोक का सरलार्थ।

परिचय

संस्कृत का अच्छा पठन केवल अक्षर पहचानना नहीं है। शुद्ध उच्चारण, शब्दों का सही विभाजन और वाक्य का अर्थ समझना एक-दूसरे से जुड़े कौशल हैं। छोटी मात्रा, विसर्ग या हलन्त छूटने पर शब्द का रूप और वाक्य में उसकी भूमिका बदल सकती है। इसलिए धीरे पढ़ना, सुनकर जाँचना और अर्थ से पुष्टि करना आवश्यक है।

उदाहरण के लिए बालकः और बालकम् देखने में मिलते हैं, लेकिन पहले का सामान्य प्रयोग कर्ता और दूसरे का कर्म के रूप में हो सकता है। छात्रः पठति का अर्थ समझते समय केवल शब्दार्थ नहीं, रूप भी देखना होगा। इस अध्याय में उच्चारण से आरम्भ करके पदच्छेद, अन्वय और प्रश्नोत्तर तक पहुँचेंगे।

अधिगम उद्देश्य

  • स्वर, व्यञ्जन, मात्रा और संयुक्ताक्षर पहचानना।

  • ह्रस्व-दीर्घ, अल्पप्राण-महाप्राण और उच्चारण-स्थान का अन्तर समझाना।

  • अनुस्वार, अनुनासिकता, विसर्ग, हलन्त और अवग्रह का सावधान पठन करना।

  • सरल सन्धियुक्त पदों का पदच्छेद और वाक्य का अन्वय करना।

  • मौलिक संस्कृत गद्यांश से सूचना तथा व्याकरणिक संकेत चुनना।

  • प्रसिद्ध सार्वजनिक श्लोक का पदच्छेद, अन्वय और सरलार्थ प्रस्तुत करना।

मुख्य अवधारणाएँ

1. स्वर और उनकी मात्राएँ

स्वर ऐसी ध्वनि है जिसका उच्चारण अपेक्षाकृत स्वतंत्र होता है। व्यञ्जन में स्वर जुड़ने पर अक्षर बनता है। देवनागरी में क का सामान्य पठन क् + अ है। का, कि, की, कु और कू में मात्रा बदलने से स्वर बदलता है। इ की मात्रा पहले दिखाई देती है, पर उच्चारण व्यञ्जन के बाद होता है: कि = क् + इ।

स्वर

व्यञ्जन के साथ उदाहरण

पठन में ध्यान

अ, आ

क, का

ह्रस्व और दीर्घ अलग

इ, ई

कि, की

मात्रा की स्थिति से क्रम न बदलें

उ, ऊ

कु, कू

अवधि और स्वर स्पष्ट रखें

ऋ

कृ

संयुक्ताक्षर क्र से अलग पहचानें

ए, ऐ

के, कै

दोनों को एक ध्वनि न बनाएँ

ओ, औ

को, कौ

स्वर का अन्तर सुनें

ह्रस्व अ, इ, उ, ऋ का उच्चारण दीर्घ आ, ई, ऊ की अपेक्षा छोटा है। ए, ऐ, ओ, औ को संस्कृत में दीर्घ स्वर माना जाता है। “दिनम्” और “दीनः” में छोटी-बड़ी मात्रा अर्थ से भी जुड़ती है। अभ्यास में पहले स्वर अलग, फिर शब्द और फिर पूरा वाक्य पढ़ें।

2. व्यञ्जन-वर्ग और उच्चारण-स्थान

वर्गीय व्यञ्जन उच्चारण-स्थान के अनुसार व्यवस्थित हैं। इससे ध्वनियों का अन्तर और संधि में होने वाले परिवर्तन समझने में सहायता मिलती है।

वर्ग

वर्ण

प्रमुख स्थान

क-वर्ग

क ख ग घ ङ

कण्ठ

च-वर्ग

च छ ज झ ञ

तालु

ट-वर्ग

ट ठ ड ढ ण

मूर्धा

त-वर्ग

त थ द ध न

दन्त

प-वर्ग

प फ ब भ म

ओष्ठ

ट और त को एक जैसा न बोलें। मूर्धन्य ट में जिह्वा ऊपर पीछे की ओर और दन्त्य त में दाँतों के निकट आती है। य, र, ल, व अन्तःस्थ तथा श, ष, स, ह ऊष्म वर्ण हैं। श, ष और स का भेद सुनकर अभ्यास करें; सभी को एक साधारण स में बदलने से पठन अशुद्ध हो सकता है।

3. प्राण, घोष और नासिक्य ध्वनियाँ

अल्पप्राण और महाप्राण में श्वास के जोर का अन्तर है। क और ख, ग और घ, त और थ की जोड़ी बोलकर देखें। ख, घ, थ में अतिरिक्त श्वास स्पष्ट है। उच्चारण करते समय गले पर जोर डालने के बजाय प्रशिक्षित नमूना सुनकर तुलना करना अधिक उपयोगी है।

वर्ग के पहले दो वर्ण सामान्यतः अघोष और तीसरे-चौथे घोष होते हैं। पाँचवाँ वर्ण नासिक्य है। ङ, ञ, ण, न और म अपने-अपने वर्ग के नासिक्य व्यञ्जन हैं। यह व्यवस्था पठन में समान दिखने वाले संयुक्तों को पहचानने में मदद करती है। फ को अंग्रेजी के हर प्रचलित उच्चारण से मिलाकर न पढ़ें; संस्कृत पठन में प की महाप्राण ध्वनि का अभ्यास करें।

4. हलन्त और संयुक्ताक्षर

हलन्त व्यञ्जन में निहित अ को हटाता है: क् में स्वतंत्र अ नहीं है। दो व्यञ्जनों के मेल से संयुक्ताक्षर बन सकता है। क्त में क् + त, त्र में त् + र और ज्ञ में ज् + ञ का मेल है। क्षेत्र तथा अभ्यास-परम्परा के अनुसार कुछ संयुक्तों की सुनाई देने वाली ध्वनि भिन्न हो सकती है; अपने शिक्षक के मानक का पालन करें।

उदाहरण: भक्तः में क्त और मित्रम् में त्र पहचानें। पढ़ते समय हर संयुक्त के बीच अनावश्यक अ न जोड़ें। मित्रम् को मितरम् बना देना रूप बदलता है। अन्त का म् भी न छोड़ें। पहले विभाजन लिखना उपयोगी है: म् + इ + त् + र् + अ + म्। फिर उसे सहज रूप से जोड़कर पढ़ें।

5. अनुस्वार, विसर्ग और अवग्रह

अनुस्वार का चिह्न ं है। वर्गीय व्यञ्जन से पहले उसका उच्चारण अगली ध्वनि के वर्गानुसार नासिक्य हो सकता है। अङ्कः का सम्बन्ध क-वर्ग और सन्तः का त-वर्ग से समझें। वर्तनी और उच्चारण का सम्बन्ध ध्यान से सीखें; हर अनुस्वार को केवल म् की ध्वनि न दें।

विसर्ग का चिह्न ः है। बालकः जैसे शब्दों में उसे सामान्य हिन्दी ह के स्वतंत्र अक्षर की तरह बहुत खींचना या बिल्कुल छोड़ देना दोनों अनुचित हैं। अगली ध्वनि तथा पठन-परम्परा से उसका रूप प्रभावित हो सकता है। सीखते समय शिक्षक का उच्चारण सुनकर दोहराएँ।

अवग्रह ऽ लुप्त अ का संकेत है। सोऽहम् का पदच्छेद सः + अहम् है। उसे शब्द का नया स्वतंत्र स्वर या विराम-चिह्न न मानें। अनुनासिकता में स्वर नासिका के सहयोग से बोला जाता है; उसे हर स्थिति में अनुस्वार का समानार्थी नहीं समझना चाहिए।

6. पदच्छेद और संधि का सम्बन्ध

पदच्छेद मिले हुए पाठ को मूल पदों में अलग करना है। संधि पास आए वर्णों के मेल से होने वाला परिवर्तन है। विद्यालयः = विद्या + आलयः में आ + आ से आ बना है। रामोऽपि = रामः + अपि में पदों के मेल को पहचानना आवश्यक है।

हर लम्बे शब्द को मनमाने स्थान पर न तोड़ें। पहले देखें कि अलग किए गए पद अर्थवान और व्याकरणिक रूप से सम्भव हैं या नहीं। “सदैव” का सही विभाजन सदा + एव है। सदा + इव लिखने से न ध्वनि-नियम ठीक बैठेगा, न मूल आशय। संधि का पूरा अध्ययन अलग अध्याय में है; यहाँ पठन में मूल पद पहचानना लक्ष्य है।

7. अन्वय और वाक्य-बोध

अन्वय पदों को अर्थानुसार सामान्य क्रम में व्यवस्थित करना है। संस्कृत में विभक्ति और क्रिया-रूप सम्बन्ध बताते हैं, इसलिए पदक्रम बदलने पर भी मूल अर्थ सुरक्षित रह सकता है। “पुस्तकं बालकः पठति” का अन्वय “बालकः पुस्तकम् पठति” है।

पहले क्रिया खोजें, फिर कौन के लिए कर्ता और क्या के लिए कर्म देखें। स्थान, साधन और अन्य पद बाद में जोड़ें। रूप देखकर निर्णय करें; पहला शब्द हमेशा कर्ता नहीं होता। द्विवचन को बहुवचन समझने से भी अर्थ बदल सकता है: बालकौ दो बालक हैं, बालकाः अनेक बालक।

8. मौलिक संस्कृत गद्यांश

अस्माकं विद्यालये लघु पुस्तकालयः अस्ति। तत्र छात्राः मध्याह्ने पुस्तकानि पठन्ति। एका छात्रा चित्रपुस्तकं पश्यति। द्वौ छात्रौ कथां पठतः। पुस्तकालयाध्यक्षः सर्वेभ्यः छात्रेभ्यः पुस्तकानि दर्शयति। सः वदति—“पुस्तकेषु मा लिखत। स्वासु पुस्तिकासु लिखत।” छात्राः पुस्तकानि स्वच्छानि स्थापयन्ति। अवकाशस्य अन्ते सर्वे पुस्तकानि यथास्थानं स्थापयित्वा कक्षां गच्छन्ति।

यह गद्यांश विद्यालय के पुस्तकालय का दृश्य देता है। तत्र का सम्बन्ध पुस्तकालय से और सः का सम्बन्ध पुस्तकालयाध्यक्ष से है। द्वौ छात्रौ के साथ पठतः दो विद्यार्थियों का बोध कराता है। मा लिखत में निषेध है; उसे लिखो का आदेश समझना उलटा अर्थ होगा।

9. गद्यांश के हल किए प्रश्न

प्रश्न

उत्तर

पहचान का आधार

छात्राः कुत्र पठन्ति?

छात्राः पुस्तकालये पठन्ति।

विद्यालये के भीतर विशिष्ट स्थान पुस्तकालय

कौ कथां पठतः?

द्वौ छात्रौ कथां पठतः।

कौ और पठतः दोनों द्विवचन

छात्राः कदा पठन्ति?

छात्राः मध्याह्ने पठन्ति।

समय का स्पष्ट उल्लेख

पुस्तकालयाध्यक्षः किं वदति?

सः वदति—पुस्तकेषु मा लिखत।

निषेधात्मक निर्देश

अवकाशस्य अन्ते छात्राः कुत्र गच्छन्ति?

ते कक्षां गच्छन्ति।

अन्तिम क्रिया का गन्तव्य

उत्तर लिखते समय प्रश्न का रूप भी देखें। कुत्र स्थान पूछता है, कदा समय और कौ दो पुरुषवाचक व्यक्तियों के बारे में है। केवल एकवचन का परिचित कः हर प्रश्न में न लिखें। पूरा उत्तर माँगा हो तो सही क्रिया सहित वाक्य बनाएँ।

10. प्रसिद्ध श्लोक का अभ्यास

भगवद्गीता का सार्वजनिक-परम्परा में प्रचलित यह श्लोक पढ़ें:

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

पदच्छेद: कर्मणि, एव, अधिकारः, ते, मा, फलेषु, कदाचन, मा, कर्मफलहेतुः, भूः, मा, ते, सङ्गः, अस्तु, अकर्मणि।

अन्वय: ते कर्मणि एव अधिकारः, फलेषु कदाचन मा। कर्मफलहेतुः मा भूः। अकर्मणि ते सङ्गः मा अस्तु।

सरलार्थ: तुम्हारा अधिकार कर्म करने में है, फल पर आग्रह करने में नहीं। फल की आसक्ति ही कर्म का एकमात्र कारण न बने और कर्म न करने में भी लगाव न हो। श्लोक को परिणाम की जिम्मेदारी से भागने की छूट न समझें; अन्तिम भाग निष्क्रियता से भी सावधान करता है।

पठन में कर्मणि + एव से कर्मण्येव, अधिकारः + ते से अधिकारस्ते और सङ्गः + अस्तु से सङ्गोऽस्तु जैसे मेल पहचानें। पूरे दर्शन की विस्तृत चर्चा इस कक्षा के पठन-अभ्यास का लक्ष्य नहीं; शब्द, अन्वय और मूल आशय समझना प्राथमिक है।

11. विराम, पाठ और सुधार

दण्ड । सामान्य वाक्य या श्लोक-अंश का विराम और द्विदण्ड ॥ प्रायः श्लोक की समाप्ति दिखाता है। लेकिन हर छपी पंक्ति पर अर्थ पूरा नहीं होता। पहले वाक्य का सम्बन्ध समझें, फिर उचित विराम के साथ पढ़ें। गति इतनी न बढ़ाएँ कि मात्रा या पदान्त गायब हो जाए।

अभ्यास की उपयोगी पद्धति है: पहले छोटे अंश का शुद्ध नमूना सुनें, फिर स्वयं पढ़ें, कठिन पद अलग दोहराएँ और अन्त में अर्थ बताएं। सुधार में केवल आवाज नहीं, पहचान भी जोड़ें। यदि पठतः को पठन्ति पढ़ दिया, तो दो और अनेक का अन्तर फिर समझें। यही अर्थ-आधारित पठन दीर्घकालिक शुद्धता देता है।

प्रश्न हल करने की विधि

  1. पाठ में स्वर-मात्रा, संयुक्ताक्षर और पदान्त पहचानें।

  2. कठिन संधियुक्त पदों का सम्भव पदच्छेद करें।

  3. क्रिया, कर्ता, कर्म और अन्य सम्बन्धों से अन्वय बनाएँ।

  4. प्रश्नवाचक शब्द के अनुसार स्थान, समय या व्यक्ति खोजें।

  5. उत्तर में वचन तथा क्रिया का मेल बनाए रखें।

  6. अर्थ पढ़कर जाँचें कि निषेध, संख्या या सन्दर्भ उलटा तो नहीं हुआ।

सम्बन्ध

  • संज्ञा-विभक्ति का ज्ञान पठन में कर्ता, कर्म और स्थान पहचानने में सहायता करता है।

  • धातुरूप से व्यक्ति और संख्या का सही अर्थ निकलता है।

  • संधि तथा अनुवाद के अध्याय पदच्छेद और अन्वय की इसी विधि को आगे बढ़ाते हैं।

सामान्य त्रुटियाँ

  • इ की मात्रा पहले देखकर पहले बोल देना; व्यञ्जन के बाद स्वर का उच्चारण करें।

  • हलन्त और पदान्त छोड़ना; मूल अक्षर तथा रूप सुरक्षित रखें।

  • प्रथम पद को हमेशा कर्ता मानना; विभक्ति और क्रिया का सम्बन्ध देखें।

  • मा का अर्थ छोड़ देना; निषेध पहचानकर पूरा निर्देश समझें।

पुनरावृत्ति सूची

  • मैं स्वर, मात्रा और व्यञ्जन-वर्ग पहचान सकता/सकती हूँ।

  • मैं ह्रस्व-दीर्घ और महाप्राण का अन्तर समझा सकता/सकती हूँ।

  • मैं विसर्ग, हलन्त और संयुक्ताक्षर सावधानी से पढ़ सकता/सकती हूँ।

  • मैं सरल पदच्छेद और अन्वय कर सकता/सकती हूँ।

  • मैं गद्यांश से सही सूचना चुनकर उत्तर दे सकता/सकती हूँ।

  • मैं श्लोक का सरलार्थ और मुख्य निर्देश बता सकता/सकती हूँ।

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