परिचय
संस्कृत में शब्दरूप किसी संज्ञा या सर्वनाम का वह रूप है जो उसके लिङ्ग, वचन और विभक्ति के अनुसार बनता है। रूप से पता चलता है कि कौन कार्य कर रहा है, किस पर कार्य हो रहा है, साधन क्या है और घटना कहाँ घट रही है। इसलिए केवल हिन्दी अनुवाद देखकर प्रत्यय लगाना पर्याप्त नहीं।
“बालकः फलम् खादति” और “फलम् बालकः खादति” में पदक्रम बदलता है, मूल सम्बन्ध नहीं। बालकः कर्ता और फलम् कर्म है। दूसरी ओर बालकम् में अन्त बदलने से भूमिका बदल सकती है। इस अध्याय में पूरी रूप-सारणियों को अर्थ और वाक्य-प्रयोग के साथ सीखेंगे।
अधिगम उद्देश्य
प्रातिपदिक, लिङ्ग, वचन और विभक्ति समझाना।
अकारान्त, आकारान्त, इकारान्त और ईकारान्त के प्रमुख शब्दरूप लिखना।
अस्मद्, युष्मद् और तद् के उपयुक्त सर्वनाम-रूप चुनना।
कारक और सम्बन्ध के अनुसार विभक्ति लगाना।
सह, नमः, प्रति और उपरि जैसे पदों का सही प्रयोग करना।
रूप-समानता के बावजूद प्रसंग से सही भूमिका निर्धारित करना।
मुख्य अवधारणाएँ
1. प्रातिपदिक, लिङ्ग और वचन
प्रातिपदिक संज्ञा या विशेषण का आधार रूप है, जैसे बालक, लता, फल। संस्कृत में तीन लिङ्ग हैं—पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग। वचन भी तीन हैं: एकवचन एक के लिए, द्विवचन दो के लिए और बहुवचन तीन या अधिक के लिए। दो व्यक्तियों को बहुवचन में बदल देना सामान्य हिन्दी की आदत हो सकती है, संस्कृत में यह भेद आवश्यक है।
शब्द का अन्तिम स्वर तथा लिङ्ग दोनों रूप-निर्माण में महत्त्वपूर्ण हैं। बालक अकारान्त पुंलिङ्ग और फल अकारान्त नपुंसकलिङ्ग है। एक जैसा अन्त होने पर भी प्रथमा-द्वितीया के रूप अलग हैं। प्रत्येक नए शब्द के साथ उसका लिङ्ग और रूप-परिवार सीखें।
2. विभक्ति और कारक का सम्बन्ध
विभक्ति रूपगत पहचान और कारक क्रिया से सम्बन्धित भूमिका है। सामान्य कर्तृवाच्य के लिए नीचे की तालिका उपयोगी है। षष्ठी का सम्बन्ध प्रायः दूसरे संज्ञा-पद से होता है, इसलिए उसे छह कारकों की सूची में अलग कारक नहीं गिनते।
विभक्ति | सामान्य सम्बन्ध | मौलिक उदाहरण |
|---|---|---|
प्रथमा | कर्ता | छात्रः पठति। |
द्वितीया | कर्म | छात्रः पाठं पठति। |
तृतीया | करण | छात्रः लेखन्या लिखति। |
चतुर्थी | सम्प्रदान | माता बालकाय फलं ददाति। |
पञ्चमी | अपादान | वृक्षात् पत्रं पतति। |
षष्ठी | सम्बन्ध | छात्रस्य पुस्तकम् अस्ति। |
सप्तमी | अधिकरण | छात्रः कक्षायां पठति। |
सम्बोधन | पुकार | हे छात्र, पठ। |
एक चिह्न का एक ही हिन्दी अर्थ हर बार लागू न करें। तृतीया साधन के साथ सह का साथी भी बता सकती है। कर्मवाच्य में कर्ता तृतीया में आता है; इसलिए प्रथमा ही हमेशा कर्ता है ऐसा बिना वाच्य देखे न कहें।
3. बालक के सम्पूर्ण रूप
बालक, अकारान्त पुंलिङ्ग के रूप सीखते समय विशेष रूप से बालकौ, बालकाभ्याम् और बालकयोः की पुनरावृत्ति देखें। समान रूप कई विभक्तियों में होता है; वाक्य से उसका काम तय होगा।
विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथमा | बालकः | बालकौ | बालकाः |
द्वितीया | बालकम् | बालकौ | बालकान् |
तृतीया | बालकेन | बालकाभ्याम् | बालकैः |
चतुर्थी | बालकाय | बालकाभ्याम् | बालकेभ्यः |
पञ्चमी | बालकात् | बालकाभ्याम् | बालकेभ्यः |
षष्ठी | बालकस्य | बालकयोः | बालकानाम् |
सप्तमी | बालके | बालकयोः | बालकेषु |
सम्बोधन | हे बालक | हे बालकौ | हे बालकाः |
उदाहरण: “बालकाभ्यां फले ददाति” में दो बालकों को देने का अर्थ होने पर बालकाभ्याम् चतुर्थी है। “बालकाभ्यां सह गच्छति” में वही रूप सह के योग में तृतीया है। केवल अन्त देखकर दोनों को एक ही विभक्ति न कहें।
4. फल के सम्पूर्ण रूप
नपुंसकलिङ्ग में प्रथमा और द्वितीया के रूप समान रहते हैं। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि कर्ता और कर्म की भूमिका भी एक है। “फलम् पतति” में फलम् कर्ता है; “बालकः फलम् खादति” में कर्म।
विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथमा | फलम् | फले | फलानि |
द्वितीया | फलम् | फले | फलानि |
तृतीया | फलेन | फलाभ्याम् | फलैः |
चतुर्थी | फलाय | फलाभ्याम् | फलेभ्यः |
पञ्चमी | फलात् | फलाभ्याम् | फलेभ्यः |
षष्ठी | फलस्य | फलयोः | फलानाम् |
सप्तमी | फले | फलयोः | फलेषु |
सम्बोधन | हे फल | हे फले | हे फलानि |
पत्र, पुस्तक और मित्र जैसे अकारान्त नपुंसकलिङ्ग शब्द इसी मूल ढाँचे से समझे जा सकते हैं, लेकिन ध्वनि-नियमों से कहीं विशेष परिवर्तन हो सकते हैं। विशेषण का भी मेल रखें: “मधुराणि फलानि” में विशेषण नपुंसकलिङ्ग बहुवचन है।
5. लता के सम्पूर्ण रूप
लता, आकारान्त स्त्रीलिङ्ग के एकवचन में लतया, लतायै, लतायाः और लतायाम् को अलग पहचानें। केवल परिचित दिखने वाले रूप से रिक्त स्थान न भरें; पहले सम्बन्ध पूछें।
विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथमा | लता | लते | लताः |
द्वितीया | लताम् | लते | लताः |
तृतीया | लतया | लताभ्याम् | लताभिः |
चतुर्थी | लतायै | लताभ्याम् | लताभ्यः |
पञ्चमी | लतायाः | लताभ्याम् | लताभ्यः |
षष्ठी | लतायाः | लतयोः | लतानाम् |
सप्तमी | लतायाम् | लतयोः | लतासु |
सम्बोधन | हे लते | हे लते | हे लताः |
बालिका, माला और कथा इसी परिवार के परिचित उदाहरण हैं। “बालिकायै पुस्तकम् ददाति” में पाने वाले के लिए चतुर्थी, “कथायां बालकः अस्ति” में कथा के भीतर होने के लिए सप्तमी है। सम्बोधन एकवचन हे लते है, हे लता नहीं।
6. मुनि और नदी के सम्पूर्ण रूप
इकारान्त और ईकारान्त को केवल मात्रा का छोटा परिवर्तन न समझें। लिङ्ग और रूप-परिवार के साथ उनके प्रत्यय भी बदलते हैं। यहाँ मुनि पुंलिङ्ग और नदी स्त्रीलिङ्ग हैं।
विभक्ति | मुनि एकवचन | मुनि द्विवचन | मुनि बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथमा | मुनिः | मुनी | मुनयः |
द्वितीया | मुनिम् | मुनी | मुनीन् |
तृतीया | मुनिना | मुनिभ्याम् | मुनिभिः |
चतुर्थी | मुनये | मुनिभ्याम् | मुनिभ्यः |
पञ्चमी | मुनेः | मुनिभ्याम् | मुनिभ्यः |
षष्ठी | मुनेः | मुन्योः | मुनीनाम् |
सप्तमी | मुनौ | मुन्योः | मुनिषु |
सम्बोधन | हे मुने | हे मुनी | हे मुनयः |
विभक्ति | नदी एकवचन | नदी द्विवचन | नदी बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथमा | नदी | नद्यौ | नद्यः |
द्वितीया | नदीम् | नद्यौ | नदीः |
तृतीया | नद्या | नदीभ्याम् | नदीभिः |
चतुर्थी | नद्यै | नदीभ्याम् | नदीभ्यः |
पञ्चमी | नद्याः | नदीभ्याम् | नदीभ्यः |
षष्ठी | नद्याः | नद्योः | नदीनाम् |
सप्तमी | नद्याम् | नद्योः | नदीषु |
सम्बोधन | हे नदि | हे नद्यौ | हे नद्यः |
“मुनये नमः” में चतुर्थी है। “नद्यां नौका अस्ति” में नद्याम् सप्तमी है और आगे व्यञ्जन आने पर अनुस्वार-लेखन नद्यां मिलता है। मूल रूप और वाक्य में संधि से लिखे रूप का सम्बन्ध समझें।
7. अस्मद् और युष्मद् के प्रमुख पूर्ण रूप
अस्मद् बोलने वाले और युष्मद् सम्बोधित व्यक्ति का बोध कराते हैं। ये लिङ्ग के अनुसार अलग प्रथमा-रूप नहीं बनाते। नीचे प्रमुख दीर्घ रूप दिए हैं; मे, ते, नौ जैसे वैकल्पिक संक्षिप्त रूप अलग अभ्यास में सीखे जा सकते हैं।
विभक्ति | अस्मद् एक | अस्मद् द्वि | अस्मद् बहु |
|---|---|---|---|
प्रथमा | अहम् | आवाम् | वयम् |
द्वितीया | माम् | आवाम् | अस्मान् |
तृतीया | मया | आवाभ्याम् | अस्माभिः |
चतुर्थी | मह्यम् | आवाभ्याम् | अस्मभ्यम् |
पञ्चमी | मत् | आवाभ्याम् | अस्मत् |
षष्ठी | मम | आवयोः | अस्माकम् |
सप्तमी | मयि | आवयोः | अस्मासु |
विभक्ति | युष्मद् एक | युष्मद् द्वि | युष्मद् बहु |
|---|---|---|---|
प्रथमा | त्वम् | युवाम् | यूयम् |
द्वितीया | त्वाम् | युवाम् | युष्मान् |
तृतीया | त्वया | युवाभ्याम् | युष्माभिः |
चतुर्थी | तुभ्यम् | युवाभ्याम् | युष्मभ्यम् |
पञ्चमी | त्वत् | युवाभ्याम् | युष्मत् |
षष्ठी | तव | युवयोः | युष्माकम् |
सप्तमी | त्वयि | युवयोः | युष्मासु |
“अहं पठामि” में प्रथमा कर्ता है, “मम पुस्तकम्” में षष्ठी सम्बन्ध है और “मया लिखितम्” में मया तृतीया है। अहम् और मम को हर वाक्य में बदलकर रखना अर्थ बिगाड़ता है।
8. तद् सर्वनाम और विशेषण का मेल
पठन में तद् के प्रथमा-द्वितीया रूप बार-बार आते हैं। इन्हें लिङ्ग और वचन सहित पहचानें; शेष विभक्तियों में भी सम्बन्ध के अनुसार रूप लगता है।
लिङ्ग-विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
पुंलिङ्ग प्रथमा | सः | तौ | ते |
पुंलिङ्ग द्वितीया | तम् | तौ | तान् |
स्त्रीलिङ्ग प्रथमा | सा | ते | ताः |
स्त्रीलिङ्ग द्वितीया | ताम् | ते | ताः |
नपुंसक प्रथमा-द्वितीया | तत् | ते | तानि |
यह सारणी केवल बताई गई विभक्तियों की तुलना है, सम्पूर्ण तद्-रूपावली नहीं। उदाहरण: “ते बालकाः पठन्ति”, “ते बालिके पठतः” और “ते फले स्तः” में ते का एक ही रूप अलग लिङ्ग-वचन में आता है। संज्ञा तथा क्रिया साथ देखकर अर्थ तय करें। विशेषण सामान्यतः विशेष्य के लिङ्ग, वचन और विभक्ति से मेल खाता है: “सुन्दरं पुष्पम्”, “सुन्दरी बालिका”।
9. उपपद-विभक्ति और सरल प्रयोग
कुछ अव्ययों के साथ विशेष विभक्ति आती है। सह, साकम् के साथी में तृतीया; नमः में जिसे नमस्कार किया जाए उसके लिए चतुर्थी; प्रति के साथ द्वितीया; उपरि और अधः के परिचित प्रयोग में षष्ठी लगती है।
पद | सही वाक्य | हिन्दी आशय |
|---|---|---|
सह | बालकः मित्रेण सह गच्छति। | बालक मित्र के साथ जाता है |
नमः | गुरवे नमः। | गुरु को नमस्कार |
प्रति | छात्रः विद्यालयं प्रति गच्छति। | छात्र विद्यालय की ओर जाता है |
उपरि | वृक्षस्य उपरि खगः अस्ति। | वृक्ष के ऊपर पक्षी है |
गलत “मित्रः सह” को “मित्रेण सह” करें। पर हर हिन्दी के साथ को बिना विचार तृतीया न दें; वाक्य का वास्तविक संस्कृत पद देखें। कुछ अव्ययों के एक से अधिक स्वीकृत प्रयोग भी होते हैं; जहाँ प्रश्न विशेष नियम देता है, वही आधार लें।
10. वाक्य-रचना और स्वतंत्र जाँच
“दो बालक पुस्तक पढ़ते हैं” का संस्कृत रूप “बालकौ पुस्तकम् पठतः” है। बालकौ प्रथमा द्विवचन, पुस्तकम् द्वितीया एकवचन और पठतः प्रथम पुरुष द्विवचन है। पुस्तक की संख्या दो बालकों के कारण अपने आप बहुवचन नहीं होगी।
“बालिका मित्र को फल देती है” के लिए “बालिका मित्राय फलं ददाति” लिखें। देने वाला प्रथमा, दिया पदार्थ द्वितीया और पाने वाला चतुर्थी में है। यदि दो मित्र हों तो मित्राभ्याम् चुनें। इस तरह रूपावली को वास्तविक अर्थ में लागू करना केवल याद करके सुनाने से अधिक उपयोगी है।
रूप की पहचान में समानता से सावधान रहें। फले प्रथमा-द्वितीया द्विवचन और सप्तमी एकवचन भी हो सकता है। “फले स्तः” में दो फल, “फले बीजानि सन्ति” में एक फल के भीतर बीज का आशय हो सकता है। क्रिया, अन्य पद और प्रसंग अन्तिम निर्णय में सहायता करते हैं।
प्रश्न हल करने की विधि
आधार शब्द, लिङ्ग और रूप-परिवार पहचानें।
हिन्दी अर्थ के बजाय संस्कृत वाक्य में वास्तविक सम्बन्ध देखें।
आवश्यक विभक्ति और वचन निश्चित करें।
सारणी से सही रूप चुनकर विशेषण तथा क्रिया का मेल जाँचें।
उपपद हो तो उसका विशेष नियम लागू करें।
समान दिखने वाले रूपों का अर्थ पूरे वाक्य से सत्यापित करें।
सम्बन्ध
धातुरूप में कर्ता के पुरुष और वचन का मेल शब्दरूप से जुड़ता है।
अनुवाद में हिन्दी के शब्दक्रम के बजाय विभक्ति अर्थ का आधार बनती है।
साहित्य-पठन और अन्वय में संधि के पीछे छिपे मूल रूप पहचानने पड़ते हैं।
सामान्य त्रुटियाँ
द्विवचन को बहुवचन में बदलना; दो के लिए विशिष्ट रूप रखें।
फलम् को हमेशा कर्म मानना; नपुंसक प्रथमा भी वही रूप है।
सह के साथ प्रथमा लगाना; साथी में तृतीया चाहिए।
रूप याद रखकर अर्थ छोड़ देना; सम्बन्ध, क्रिया और प्रसंग साथ जाँचें।
पुनरावृत्ति सूची
मैं लिङ्ग, वचन और विभक्ति पहचान सकता/सकती हूँ।
मैं प्रमुख संज्ञाओं की सम्पूर्ण सारणियाँ लिख सकता/सकती हूँ।
मैं अस्मद् और युष्मद् के प्रमुख रूप उपयोग कर सकता/सकती हूँ।
मैं कारक और उपपद के अनुसार विभक्ति चुन सकता/सकती हूँ।
मैं विशेषण तथा क्रिया का उपयुक्त मेल रख सकता/सकती हूँ।
मैं एक जैसे रूपों की अलग भूमिकाएँ समझा सकता/सकती हूँ।