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9 MIN LESSON · SANSKRIT

Class 8 Sanskrit: Compounds and Word Formation: Complete Concepts and Practice

संस्कृत — उपसर्ग, क्त्वा, ल्यप्, तुमुन्, क्त, शतृ, अव्यय-विशेषण का अन्तर, समास-विग्रह, अव्ययीभाव, तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु, द्वन्द्व और बहुव्रीहि।

परिचय

संस्कृत में शब्द-निर्माण से परिचित आधारों के सहारे नए अर्थ बनते हैं। उपसर्ग धातु के पहले जुड़ सकते हैं, प्रत्यय आधार के बाद आते हैं और समास कई पदों का सम्बन्ध संक्षिप्त करता है। इन प्रक्रियाओं को समझने से लंबे शब्द पढ़ना और उनका अर्थ निकालना आसान होता है।

राजपुत्रः को केवल अक्षरों में तोड़ने के बजाय राजा का पुत्र समझना आवश्यक है। इसी तरह गत्वा में जाकर का अर्थ है, जबकि गमिष्यति में भविष्य की पूर्ण क्रिया है। इस अध्याय में शब्द के रूप और वाक्य में उसके काम को साथ सीखेंगे, ताकि पहचान केवल रटने तक सीमित न रहे।

अधिगम उद्देश्य

  • उपसर्ग, प्रत्यय, समास और सन्धि का अन्तर समझाना।

  • परिचित उपसर्गों से धातु के अर्थ में बदलाव पहचानना।

  • क्त्वा, ल्यप् और तुमुन् रूप बनाकर वाक्य में प्रयोग करना।

  • क्त तथा शतृ के परिचित रूपों का अर्थ समझना।

  • अव्ययीभाव, तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु, द्वन्द्व और बहुव्रीहि पहचानना।

  • अर्थ सुरक्षित रखते हुए सरल विग्रह और समस्तपद बनाना।

मुख्य अवधारणाएँ

1. अलग प्रक्रियाओं की पहचान

सन्धि वर्णों का ध्वनि-मेल है। समास पदों के अर्थ-सम्बन्ध का संक्षिप्त रूप है। उपसर्ग क्रिया-मूल के पहले जुड़ता है और प्रत्यय आधार के बाद जुड़कर नया रूप देता है। एक ही शब्द में एक से अधिक प्रक्रिया मिल सकती हैं।

प्रक्रिया

उदाहरण

मुख्य प्रश्न

सन्धि

विद्या + आलयः = विद्यालयः

कौन-से वर्ण मिले?

समास

राज्ञः पुत्रः = राजपुत्रः

पदों का सम्बन्ध क्या है?

उपसर्ग

आ + गम् = आगच्छति का आधार

क्रिया के अर्थ में क्या बदलाव है?

प्रत्यय

पठ् + तुमुन् = पठितुम्

नए रूप का अर्थ और काम क्या है?

विद्यालयः का विद्या का आलय अर्थगत विग्रह हो सकता है, जबकि स्वर-मेल अलग विश्लेषण है। परीक्षा में पूछा जाए सन्धि-विच्छेद या समास-विग्रह, तो उसी प्रकार का उत्तर दें।

2. उपसर्ग का अर्थ पर प्रभाव

प्रचलित उपसर्गों में प्र, परा, अप, सम्, अनु, अव, निर्, निस्, दुर्, दुस्, वि, आ, नि, अधि, अपि, अति, सु, उत्, अभि, प्रति, परि और उप जैसे रूप आते हैं। यहाँ पूरी सूची रटने से अधिक परिचित प्रयोगों की समझ आवश्यक है। ध्वनि-परिवर्तन से उपसर्ग का दिखता रूप बदल सकता है।

गच्छति जाता है, आगच्छति आता है और अनुगच्छति पीछे या साथ चलता है। विशति प्रवेश करता है, प्रविशति भीतर प्रवेश करता है। हरति ले जाता है और आहरति लाता है। उपसर्ग जोड़ने से हमेशा एक ही स्थायी हिन्दी अर्थ नहीं मिलता; पूरे प्रचलित क्रिया-रूप को सीखें।

उदाहरण: “छात्रः कक्षां प्रविशति” में भीतर जाने का भाव है। “बालकः गुरुम् अनुगच्छति” में गुरु के पीछे चलना है। केवल प्र को आगे और अनु को पीछे लिखकर वाक्य का शेष सम्बन्ध छोड़ देना पर्याप्त नहीं।

3. क्त्वा: एक ही कर्ता की पहले पूरी क्रिया

क्त्वा से पहले कार्य पूरा करके अगला कार्य करने का अर्थ मिलता है। सामान्य नियम का सूत्र समानकर्तृकयोः पूर्वकाले है। कर्ता समान हो और क्रियाओं में पूर्व-पश्चात सम्बन्ध हो।

धातु

क्त्वा-रूप

अर्थ

पठ्

पठित्वा

पढ़कर

लिख्

लिखित्वा

लिखकर

गम्

गत्वा

जाकर

कृ

कृत्वा

करके

खाद्

खादित्वा

खाकर

“बालकः गृहं गत्वा पठति” में जाने और पढ़ने वाला एक ही बालक है। “माता भोजनं पचति, बालकः खादति” में कर्ता अलग हैं, इसलिए बिना अर्थ बदले इसे माता पकाकर बालक खाता है जैसी संस्कृत क्त्वा-रचना में यंत्रवत न बदलें। क्त्वा-रूप अव्यय है; वह कर्ता के लिङ्ग-वचन के अनुसार नहीं बदलता।

4. ल्यप्: उपसर्गयुक्त परिचित रूप

उपसर्गयुक्त धातुओं के ऐसे पूर्वकालिक प्रयोग में सामान्यतः ल्यप् आता है। उसका दिखाई देने वाला रूप अक्सर य से पहचाना जाता है, लेकिन हर यान्त शब्द को ल्यप् न मानें। धातु और उपसर्ग पहचानना जरूरी है।

आ + गम् = आगत्य, प्र + नम् = प्रणम्य, उप + विश् = उपविश्य और आ + दा = आदाय परिचित उदाहरण हैं। “छात्रः गुरुम् प्रणम्य उपविशति” में प्रणाम करना पहले और बैठना बाद में है। “बालिका पुस्तकम् आदाय गच्छति” में पुस्तक लेकर जाने का अर्थ है।

गत्वा और आगत्य का अन्तर देखें। पहले में उपसर्ग नहीं, दूसरे में आ जुड़ा है। गलत आगत्वा के स्थान पर परिचित रूप आगत्य रखें। इस पाठ में मुख्य लक्ष्य प्रचलित रूपों का सही अर्थ और प्रयोग है; सभी उन्नत प्रत्यय-अपवादों की सूची नहीं।

5. तुमुन्: करने के लिए

तुमुन् से क्रिया के उद्देश्य का अर्थ मिलता है। पठितुम् पढ़ने के लिए और गन्तुम् जाने के लिए है। यह भी अव्यय है; कर्ता बदलने से उसका लिङ्ग-वचन नहीं बदलता।

धातु

तुमुन्-रूप

मौलिक प्रयोग

पठ्

पठितुम्

अहं पठितुं पुस्तकालयं गच्छामि।

लिख्

लिखितुम्

सा लिखितुं लेखनीम् आनयति।

गम्

गन्तुम्

सः गृहं गन्तुम् इच्छति।

कृ

कर्तुम्

वयं कार्यं कर्तुम् इच्छामः।

दृश्

द्रष्टुम्

ते चित्रं द्रष्टुम् आगच्छन्ति।

पठित्वा और पठितुम् का अर्थ अलग है। “पठित्वा गच्छति” पढ़कर जाता है; “पठितुं गच्छति” पढ़ने के लिए जाता है। पहले कार्य पूरा हो चुका है, दूसरे में वह उद्देश्य है। केवल मिलती ध्वनि देखकर दोनों को न बदलें।

6. क्त और शतृ के परिचित रूप

क्त से अनेक परिचित पूर्णता-सूचक विशेषण बनते हैं: लिखितम् लिखा हुआ, पठितम् पढ़ा हुआ, कृतम् किया हुआ। ये अव्यय नहीं; संज्ञा के अनुसार लिङ्ग-वचन-विभक्ति में बदल सकते हैं। “लिखितं पत्रम्” और “लिखिता कथा” में रूप अलग हैं।

शतृ के परिचित रूप चल रही क्रिया का कर्ता-विशेषण बना सकते हैं: पठन् बालकः, पठन्ती बालिका। अर्थ है पढ़ता हुआ बालक, पढ़ती हुई बालिका। “पठन्” को हर बहुवचन वर्तमान क्रिया पठन्ति का संक्षिप्त रूप न मानें। उसकी पद-भूमिका और अन्विति अलग है।

इनका प्रयोग समझते समय पूरा वाक्य बनाएँ: “पठन्ती बालिका कक्षायाम् अस्ति।” यहाँ अस्ति मुख्य क्रिया है और पठन्ती बालिका की विशेषता बता रहा है। प्रत्यय का नाम और वाक्य का काम दोनों समझें।

7. समास और विग्रह

समस्तपद समास से बना संक्षिप्त पद है। विग्रह उसके पदों का सम्बन्ध स्पष्ट करता है। राजपुत्रः = राज्ञः पुत्रः में षष्ठी का सम्बन्ध है। विग्रह केवल अक्षर अलग करना नहीं; आवश्यक विभक्ति या और जैसे अर्थ-सम्बन्ध वापस लाना है।

समास पहचानने में पूछें कि कौन-सा अर्थ प्रधान है: पहला पद, दूसरा पद, दोनों या कोई अन्य व्यक्ति/वस्तु। यह सामान्य मार्गदर्शक है; अन्तिम निर्णय प्रचलित समास-भेद और सही विग्रह से करें। केवल शब्द के आकार या पदों की संख्या के आधार पर नाम न दें।

8. अव्ययीभाव समास

अव्ययीभाव में अव्यय-प्रधान अर्थ और सामान्यतः अव्ययवत प्रयोग मिलता है। प्रतिदिनम् = दिने दिने, यानी प्रत्येक दिन; यथाशक्ति = शक्तिम् अनतिक्रम्य, यानी शक्ति के अनुसार। यहाँ पूरा समस्तपद वाक्य में अपरिवर्तित प्रयोग करता है।

“वयं प्रतिदिनं पठामः” नियमित समय बताता है। “सः यथाशक्ति कार्यं करोति” सामर्थ्य के अनुसार काम करने का अर्थ देता है। प्रतिदिनम् को केवल प्रति + दिनम् लिखना रूप-विभाजन है; समास-विग्रह में प्रत्येक दिन का सम्बन्ध भी स्पष्ट होना चाहिए।

9. तत्पुरुष और कर्मधारय

तत्पुरुष में सामान्यतः उत्तरपद प्रधान होता है और पदों के बीच विभक्ति-सम्बन्ध रहता है। ग्रामगतः = ग्रामं गतः द्वितीया-सम्बन्ध का, राजपुत्रः = राज्ञः पुत्रः षष्ठी-सम्बन्ध का परिचित उदाहरण है। समस्तपद का अर्थ मुख्यतः पुत्र पर केन्द्रित है।

कर्मधारय में विशेषण-विशेष्य या उपमान-उपमेय एक ही वस्तु बताते हैं। नीलकमलम् = नीलं कमलम्; महापुरुषः = महान् पुरुषः। इसे तत्पुरुष-परिवार के विशेष भेद के रूप में भी पढ़ाया जाता है। सामान्य वर्ग और विशिष्ट भेद में विरोध नहीं।

नीलकमलम् में कमल नीला है। यदि ऐसा शब्द किसी तीसरे व्यक्ति की पहचान बताने लगे, तो प्रसंगानुसार अन्य विश्लेषण सम्भव हो सकता है। परीक्षा के सरल प्रश्न में दिए विग्रह और सिखाए प्रयोग को आधार बनाएँ।

10. द्विगु और द्वन्द्व

द्विगु में संख्यावाचक पूर्वपद और समूह का अर्थ महत्त्वपूर्ण है। त्रिलोकी = त्रयाणां लोकानां समाहारः परिचित उदाहरण है। केवल संख्या से शुरू हर शब्द को बिना समूह-अर्थ देखे द्विगु कहना ठीक नहीं।

द्वन्द्व में दोनों पद प्रधान होते हैं और विग्रह में च आता है। माता च पिता च = मातापितरौ, यानी माता और पिता दोनों। रामः च श्यामः च = रामश्यामौ में दो व्यक्ति हैं। पूरा पद वचन के अनुसार समझें; दो पद होने का अर्थ हमेशा वस्तुओं की कुल संख्या दो ही हो, ऐसा हर समास में नहीं।

“मातापितरौ आगच्छतः” में द्विवचन है। इसे केवल पिता का सम्बन्ध मानकर तत्पुरुष कहना गलत होगा। विग्रह में च की बराबरी और दोनों अर्थों की प्रधानता पहचानें।

11. बहुव्रीहि और अन्यपदार्थ

बहुव्रीहि में समस्तपद किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु की विशेषता बताता है। पीताम्बरः = पीतम् अम्बरं यस्य सः, यानी जिसका वस्त्र पीला है वह व्यक्ति। यहाँ मुख्य अर्थ केवल पीले वस्त्र का नाम नहीं, उसे धारण करने वाले का है।

कर्मधारय और बहुव्रीहि का अन्तर देखें: पीतम् अम्बरम् वस्त्र का वर्णन है; पीतम् अम्बरं यस्य सः किसी धारणकर्ता का। प्रसंग तथा विग्रह निर्णायक हैं। चतुर्भुजः को चत्वारः भुजाः यस्य सः के रूप में दिया जाए तो अन्यपदार्थ-प्रधानता समझें, केवल चार देखकर द्विगु न कहें।

12. समेकित प्रश्न और शुद्धि

“बालकः गृहं गत्वा लिखति” में गत्वा पूर्वक्रिया का अव्यय है; “बालकः लिखितं पत्रं पठति” में लिखितम् पत्रम् का विशेषण है। एक रूप का न बदलना और दूसरे का संज्ञा से मेल रखना प्रत्यय की भूमिका का स्पष्ट अन्तर है।

विग्रह बनाते समय पहले अर्थ लिखें, फिर संस्कृत के उचित रूप चुनें। राज्ञः में षष्ठी एकवचन और पुत्रः में प्रथमा है। केवल राज + पुत्र जोड़ने से पूरा समास-विग्रह नहीं मिलता। विकल्पों में पास-पास भेद हों तो नाम के बजाय विग्रह की जाँच करें; इससे बहुव्रीहि और कर्मधारय जैसी कठिन तुलना सरल होती है।

प्रश्न हल करने की विधि

  1. शब्द में सम्भावित आधार, उपसर्ग और प्रत्यय पहचानें।

  2. क्रिया-रूप हो तो पहले, उद्देश्य या पूर्णता का अर्थ अलग करें।

  3. समास हो तो पदों का पूरा अर्थ-सम्बन्ध लिखें।

  4. पद-प्रधानता और विग्रह से विशिष्ट भेद चुनें।

  5. वाक्य में अव्यय या विशेषण की भूमिका जाँचें।

  6. अर्थ, अन्विति और शुद्ध रूप की पुष्टि करें।

सम्बन्ध

  • सन्धि शब्दों के मिलने पर ध्वनि बदलती है, जबकि समास अर्थ-सम्बन्ध संक्षिप्त करता है।

  • शब्दरूप विशेषण और विग्रह की सही विभक्ति में सहायता करते हैं।

  • अनुवाद में करके और करने के लिए जैसे अर्थों का अन्तर प्रत्ययों से स्पष्ट होता है।

सामान्य त्रुटियाँ

  • क्त्वा और तुमुन् मिलाना; पहले पूरी क्रिया और उद्देश्य अलग करें।

  • अव्यय को संज्ञा के लिङ्ग से बदलना; गत्वा जैसे रूप अपरिवर्तित हैं।

  • हर संख्या-पूर्वपद को द्विगु कहना; समूह-अर्थ देखें।

  • बहुव्रीहि को केवल वस्तु का नाम समझना; अन्य व्यक्ति या वस्तु की प्रधानता जाँचें।

पुनरावृत्ति सूची

  • मैं उपसर्ग, प्रत्यय, सन्धि और समास अलग कर सकता/सकती हूँ।

  • मैं क्त्वा, ल्यप् और तुमुन् के परिचित रूप प्रयोग कर सकता/सकती हूँ।

  • मैं क्त तथा शतृ रूपों का सामान्य अर्थ बता सकता/सकती हूँ।

  • मैं प्रमुख समासों का विग्रह कर सकता/सकती हूँ।

  • मैं पद-प्रधानता से उपयुक्त भेद पहचान सकता/सकती हूँ।

  • मैं वाक्य में रूप और अर्थ की शुद्धता जाँच सकता/सकती हूँ।

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