परिचय
वाक्य में कार्य या अवस्था बताने वाला पद क्रिया है। संस्कृत में पढ़ना, लिखना, जाना और होना अलग धातुओं से व्यक्त होते हैं। “पठति” वर्तमान की बात कहता है, “अपठत्” बीते कार्य की और “पठिष्यति” आगे होने वाले कार्य की। इसलिए केवल क्रिया का मूल अर्थ जानना पर्याप्त नहीं; उसका रूप भी पढ़ना चाहिए।
कक्षा में शिक्षक एक विद्यार्थी से “पठ” और कई विद्यार्थियों से “पठत” कह सकते हैं। दोनों आदेश हैं, पर संख्या अलग है। यह अध्याय ऐसे दैनिक उदाहरणों से पुरुष, वचन, लकार और पद का सम्बन्ध समझाता है, फिर पूरे रूप और हल किए संशोधन देता है।
अधिगम उद्देश्य
पहचानें प्रमुख धातु और उनका अर्थ।
निश्चित करें कर्ता से क्रिया का पुरुष और वचन।
बनाएँ पठ् के पाँच लकारों के पूरे रूप।
प्रयोग करें गच्छति, अस्ति और करोति के विशेष रूप।
पहचानें परस्मैपद और आत्मनेपद का सामान्य भेद।
सुधारें वाक्य में काल और रूप की त्रुटि।
मुख्य अवधारणाएँ
1. धातु और पूरा क्रियारूप
धातु क्रिया का आधार है। पठ् पढ़ना, लिख् लिखना, गम् जाना, भू होना और क्रीड् खेलना बताती हैं। धातु के साथ नियमों के अनुसार परिवर्तन और अन्त जुड़कर पूरा रूप बनता है। हर बार धातु के बाद ति लिख देना पर्याप्त नहीं: गम् से गच्छति बनता है।
धातु | वर्तमान एकवचन का रूप | अर्थ |
|---|---|---|
पठ् | पठति | पढ़ता या पढ़ती है |
लिख् | लिखति | लिखता या लिखती है |
गम् | गच्छति | जाता या जाती है |
क्रीड् | क्रीडति | खेलता या खेलती है |
भू | भवति | होता या होती है |
अस् | अस्ति | है |
कृ | करोति | करता या करती है |
“सः पठति” और “सा पठति” में क्रिया समान है। सामान्य तिङन्त क्रिया कर्ता के पुरुष-वचन से बदलती है, स्त्री या पुरुष होने के आधार पर नहीं।
2. पुरुष पहचानने का तरीका
प्रथम पुरुष उसके लिए है जिसके बारे में कहा जा रहा है। मध्यम पुरुष उससे सम्बोधित तुम के लिए और उत्तम पुरुष बोलने वाले मैं या हम के लिए है। संस्कृत के नाम हिन्दी के सामान्य पहला-दूसरा क्रम से मिलाकर न बदलें।
पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथम | सः / सा | तौ / ते | ते / ताः |
मध्यम | त्वम् | युवाम् | यूयम् |
उत्तम | अहम् | आवाम् | वयम् |
“बालकः” नामपद प्रथम पुरुष है। “अहम्” उत्तम पुरुष है। “युवाम्” दो श्रोताओं के लिए मध्यम पुरुष द्विवचन है। पहले इस पहचान का अभ्यास करें; फिर सारणी से सही कोष्ठक चुनना सरल हो जाता है।
3. वर्तमान के लिए लट्
लट् लकार सामान्यतः वर्तमान कार्य व्यक्त करता है। पठ् के ये नौ रूप अन्य परिचित धातुओं के पैटर्न समझने में भी उपयोगी हैं।
पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथम | पठति | पठतः | पठन्ति |
मध्यम | पठसि | पठथः | पठथ |
उत्तम | पठामि | पठावः | पठामः |
हल किया उदाहरण: “युवां पुस्तकं …।” युवाम् मध्यम पुरुष द्विवचन है, इसलिए पठथः आएगा। “बालकौ पुस्तकं …” में वही संख्या है पर प्रथम पुरुष, इसलिए पठतः। अन्त के थः और तः का छोटा अन्तर पूरा पुरुष बदल देता है।
4. भूतकाल के लिए लङ्
लङ् लकार बीते कार्य के लिए पढ़ाया जाता है। आरम्भ का अ और अन्त का रूप दोनों स्पष्ट लिखें।
पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथम | अपठत् | अपठताम् | अपठन् |
मध्यम | अपठः | अपठतम् | अपठत |
उत्तम | अपठम् | अपठाव | अपठाम |
प्रयोग: ह्यः अहं कथाम् अपठम्। ह्यः का अर्थ बीता कल है। “सः अपठत्” में अन्त में त् है; “यूयम् अपठत” में त के बाद अन्तर्निहित अ है। दोनों को एक जैसा लिखने या पढ़ने से रूप का अन्तर मिटता है।
रूपान्तरण: वयं पाठं पठामः → ह्यः वयं पाठम् अपठाम। कर्ता हम है, इसलिए उत्तम बहुवचन बना रहता है; केवल काल बदलता है।
5. भविष्य के लिए लृट्
लृट् लकार सामान्य भविष्य बताता है। श्वः का अर्थ आने वाला कल है।
पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथम | पठिष्यति | पठिष्यतः | पठिष्यन्ति |
मध्यम | पठिष्यसि | पठिष्यथः | पठिष्यथ |
उत्तम | पठिष्यामि | पठिष्यावः | पठिष्यामः |
प्रयोग: श्वः अहं पुस्तकं पठिष्यामि। श्वः ते पठिष्यन्ति। भविष्य के संकेत के बाद भी पुरुष-वचन जाँचना जरूरी है। “वयं पठिष्यति” में भविष्य तो है पर वचन और पुरुष गलत हैं; सही वयं पठिष्यामः है।
6. आदेश के लिए लोट्
लोट् से आदेश, विनम्र प्रार्थना या अनुमति व्यक्त हो सकती है।
पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथम | पठतु | पठताम् | पठन्तु |
मध्यम | पठ | पठतम् | पठत |
उत्तम | पठानि | पठाव | पठाम |
प्रयोग: हे मित्र! पठ। हे मित्रौ! पठतम्। हे मित्राणि! पठत। सम्बोधन से किसको कहा जा रहा है, यह स्पष्ट होता है। “सः पठतु” में किसी तीसरे के पढ़ने का निर्देश है। “वयं पठाम” का आशय चलो हम पढ़ें हो सकता है; यह लट् के पठामः से अलग रूप है।
7. उपदेश या सम्भावना के लिए विधिलिङ्
विधिलिङ् का प्रयोग उचित कार्य, सलाह, इच्छा या सम्भावना में मिलता है।
पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथम | पठेत् | पठेताम् | पठेयुः |
मध्यम | पठेः | पठेतम् | पठेत |
उत्तम | पठेयम् | पठेव | पठेम |
प्रयोग: छात्रः प्रतिदिनं पठेत् — छात्र को प्रतिदिन पढ़ना चाहिए। “वयं सत्यं वदेम” उचित आचरण का भाव देता है। इसे साधारण वर्तमान “हम कहते हैं” न समझें। वदेम वद् का विधिलिङ् है; अर्थ में चाहिए या संकल्प का संकेत देखें।
8. गम् और अस् के वर्तमान रूप
पुरुष-वचन | गम् | अस् |
|---|---|---|
प्रथम एक | गच्छति | अस्ति |
प्रथम द्वि | गच्छतः | स्तः |
प्रथम बहु | गच्छन्ति | सन्ति |
मध्यम एक | गच्छसि | असि |
मध्यम द्वि | गच्छथः | स्थः |
मध्यम बहु | गच्छथ | स्थ |
उत्तम एक | गच्छामि | अस्मि |
उत्तम द्वि | गच्छावः | स्वः |
उत्तम बहु | गच्छामः | स्मः |
उदाहरण: अहं छात्रः अस्मि। आवां मित्रे स्वः। पुस्तकानि अत्र सन्ति। अस् के रूपों में हर बार अस्ति का अ और ति बनाए रखने का प्रयास न करें; यह विशेष सारणी है। गम् के लृट् में परिचित रूप गमिष्यति है, गच्छिष्यति नहीं।
9. कृ और आत्मनेपद का परिचय
कृ के लट् रूप हैं: करोति, कुरुतः, कुर्वन्ति; करोषि, कुरुथः, कुरुथ; करोमि, कुर्वः, कुर्मः। क्रम प्रत्येक पुरुष में एक, दो और अनेक का है। वयं कार्यं कुर्मः शुद्ध है; केवल करोति देखकर करोमः न बनाएँ।
परस्मैपद और आत्मनेपद क्रिया-प्रत्ययों की श्रेणियाँ हैं। पठति परस्मैपद और सेवते आत्मनेपद का उदाहरण है। केवल काम अपने लिए हो रहा है या दूसरे के लिए, इसी से हर बार पद नहीं चुना जा सकता। धातु के नियम देखें।
सेव् के लट् रूप:
पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथम | सेवते | सेवेते | सेवन्ते |
मध्यम | सेवसे | सेवेथे | सेवध्वे |
उत्तम | सेवे | सेवावहे | सेवामहे |
प्रयोग: वयं समाजं सेवामहे। यहाँ वयम् के लिए आत्मनेपद का अपना अन्त है। सेवामः परस्मैपद की नकल होगी, इस धातु का दिया रूप नहीं।
10. काल, भाव और वाक्य की जाँच
आशय | उचित वाक्य |
|---|---|
अभी पढ़ता है | सः अधुना पठति। |
कल बीते दिन पढ़ा | सः ह्यः अपठत्। |
आने वाले कल पढ़ेगा | सः श्वः पठिष्यति। |
पढ़ने का निर्देश | सः पठतु। |
पढ़ना चाहिए | सः पठेत्। |
समयसूचक शब्द सहायक हैं, लेकिन आदेश के भाव को न भूलें। “श्वः आगच्छ” में भविष्य का दिन है पर आने के लिए आदेश है। केवल श्वः देखकर हर वाक्य को लृट् करना उचित नहीं।
संशोधन अभ्यास: “तौ गच्छन्ति” में तौ दो हैं, इसलिए तौ गच्छतः। “अहं पठसि” में बोलने वाला मैं है, इसलिए अहं पठामि। “बालिका पठति” सही है; स्त्रीलिङ्ग देखकर क्रिया को बिना कारण बदलना नहीं है।
प्रश्न हल करने की विधि
पहले कर्ता और उसका अर्थ पहचानें।
पुरुष और वचन का कोष्ठक निश्चित करें।
काल या आदेश-उपदेश का भाव चुनें।
उचित धातु-सारणी से रूप लें।
वाक्य पढ़कर देखें कि मूल अर्थ और समय बचे हैं।
सम्बन्ध
सर्वनाम अध्याय अहम्, युवाम् और ते का पुरुष-वचन बताता है।
अनुवाद में क्रिया से समय और भाव सुरक्षित रहता है।
संवाद में वक्ता बदलने पर क्रिया का पुरुष बदल सकता है।
सामान्य त्रुटियाँ
तौ के साथ बहुवचन न लगाएँ; द्विवचन चाहिए।
अहम् संस्कृत में उत्तम पुरुष है, प्रथम पुरुष नहीं।
सः और सा के साथ सामान्य पठति समान है; लिङ्ग के कारण नया रूप न बनाएँ।
लोट् पठाम और लट् पठामः के अन्त का अन्तर बनाए रखें।
पुनरावृत्ति सूची
मैं धातु और उसका अर्थ पहचान सकता/सकती हूँ।
मैं पुरुष-वचन से सही रूप चुन सकता/सकती हूँ।
मैं पठ् के पाँच लकारों की सारणियाँ बना सकता/सकती हूँ।
मैं गम्, अस् और कृ के विशेष रूप प्रयोग कर सकता/सकती हूँ।
मैं वाक्य में काल और कर्ता का मेल जाँच सकता/सकती हूँ।