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8 MIN LESSON · SANSKRIT

Class 7 Sanskrit: Reading and Pronunciation: Complete Concepts and Practice

संस्कृत — स्वर, मात्रा, व्यञ्जनवर्ग, संयुक्ताक्षर, अनुस्वार-विसर्ग, शुद्ध पठन, सरल पदच्छेद और अन्वय, मौलिक अपठित गद्यांश, प्रश्नोत्तर और पाठ-प्रमाण।

परिचय

संस्कृत पढ़ते समय ध्वनि और अर्थ साथ चलते हैं। वर्णोच्चारण का अर्थ प्रत्येक वर्ण को उसके उचित रूप में बोलना है। छोटी और बड़ी मात्रा, संयुक्ताक्षर और अन्तिम विसर्ग पहचानने से शब्द स्पष्ट सुनाई देता है और उसका अर्थ समझने में सहायता मिलती है।

विद्यालय की कक्षा में “बालकः पठति” और “बालकाः पठन्ति” अलग सुनने चाहिए। पहले में एक बालक और दूसरे में अनेक बालक हैं। यह अध्याय ऐसे छोटे भेदों से शुरू करके गद्यांश पढ़ने, श्लोक समझने और पाठ से सही उत्तर खोजने तक अभ्यास कराता है।

अधिगम उद्देश्य

  • पहचानें स्वर, व्यञ्जन और मात्राएँ।

  • पढ़ें ह्रस्व-दीर्घ और संयुक्ताक्षर का अन्तर।

  • समझें अनुस्वार, विसर्ग और विरामचिह्न।

  • अलग करें सरल सन्धियुक्त पद।

  • बनाएँ श्लोक का सामान्य अर्थक्रम।

  • दें पाठ में उपलब्ध प्रमाण के आधार पर उत्तर।

मुख्य अवधारणाएँ

1. स्वर और मात्राएँ

स्वर अपने उच्चारण के लिए दूसरे वर्ण पर निर्भर नहीं होते। अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ और औ को स्पष्ट पढ़ें। अ, इ, उ और ऋ ह्रस्व हैं; आ, ई और ऊ दीर्घ हैं। ए, ऐ, ओ और औ भी दीर्घ स्वर हैं। संस्कृत वर्णमाला में ॠ और ऌ जैसे कम प्रयुक्त स्वर भी मिलते हैं; उन्हें सामान्य दैनिक शब्दों में कम देखकर व्यञ्जन न मानें।

मूल स्वर

क के साथ

अभ्यास

अ / आ

क / का

कमलम्, बालकः

इ / ई

कि / की

दिनम्, नदी

उ / ऊ

कु / कू

कुसुमम्, कूपः

ऋ

कृ

कृषकः

ए / ऐ

के / कै

केन, कैः

ओ / औ

को / कौ

लोकः, कौ

दिनम् और दीनम् एक जैसे नहीं हैं। दिनम् दिन बताता है; दीनम् असहाय या दुःखी का अर्थ दे सकता है। मात्रा केवल लिखावट का छोटा चिह्न नहीं; वह ध्वनि और अर्थ दोनों बदल सकती है। पहले धीरे पढ़ें, फिर स्पष्टता बनाए रखकर सामान्य गति अपनाएँ।

2. व्यञ्जनवर्ग और वायु का भेद

व्यञ्जन के उच्चारण में किसी स्थान पर वायु का अवरोध या विशेष सम्पर्क होता है। पाँच वर्ग स्थान के अनुसार हैं। दूसरे और चौथे वर्ण में अपेक्षाकृत अधिक वायु निकलती है; इन्हें महाप्राण कहते हैं। पहले और तीसरे अल्पप्राण होते हैं।

वर्ग

वर्ण

उच्चारणस्थान

क

क ख ग घ ङ

कण्ठ

च

च छ ज झ ञ

तालु

ट

ट ठ ड ढ ण

मूर्धा

त

त थ द ध न

दन्त

प

प फ ब भ म

ओष्ठ

क–ख, ग–घ, त–थ और प–फ जैसे युग्म सुनकर अभ्यास करें। हाथ मुख के पास रखकर हल्की वायु का अन्तर महसूस किया जा सकता है; जोर लगाकर चिल्लाने की आवश्यकता नहीं। य, र, ल, व और श, ष, स, ह भी व्यञ्जन हैं, लेकिन पाँच स्पर्शवर्गों में नहीं रखे जाते।

3. हलन्त और संयुक्ताक्षर

क में अ की ध्वनि निहित रहती है। क् में हलन्त के कारण वह अ नहीं बोला जाता। दो व्यञ्जन बिना बीच का स्वर बोले मिलें तो संयुक्ताक्षर बनता है।

संयुक्ताक्षर

विभाजन

शब्द

त्र

त् + र

मित्रम्

क्ष

क् + ष

वृक्षः

ज्ञ

ज् + ञ

ज्ञानम्

द्य

द् + य

विद्या

स्त

स् + त

पुस्तकम्

“मित्रम्” को “मितरम्” और “विद्या” को “विदिया” न पढ़ें; उनमें ऐसा अतिरिक्त स्वर लिखा नहीं है। इसी प्रकार “तत्” के अन्त में नया अ न जोड़ें। शब्द को छोटे ध्वनि-भागों में समझकर फिर एक साथ पढ़ना उपयोगी अभ्यास है।

4. अनुस्वार, विसर्ग और विराम

अनुस्वार का चिह्न ं और विसर्ग का चिह्न ः है। “अहं” में अनुस्वार है और “बालकः” में विसर्ग। दोनों को एक जैसा न पढ़ें। विसर्ग के उच्चारण में हल्की श्वास-ध्वनि आती है और आगे की ध्वनि से उसका रूप प्रभावित हो सकता है।

अनुस्वार आगे के वर्गीय वर्ण से सम्बन्ध रख सकता है। अङ्क में ङ् और सम्बन्ध में म् जैसा उच्चारण सुनाई देता है। आरम्भिक स्तर पर स्पष्ट पाठ और शिक्षक के प्रदर्शन से भेद सीखें। हर अनुस्वार को अस्पष्ट म् बनाकर पढ़ना उचित नहीं।

दण्ड । वाक्य के अन्त का संकेत है। द्विदण्ड ॥ प्रायः श्लोक की समाप्ति बताता है। प्रश्न पढ़ते समय प्रश्नवाचक भाव रखें। विराम अर्थ के अनुकूल हो: “बालकः पुस्तकं पठति” में प्रत्येक अक्षर के बाद रुकने से वाक्य का प्रवाह टूटता है।

5. पदच्छेद का पहला अभ्यास

पदच्छेद में जुड़े हुए मूल पद अलग करते हैं। वह हिन्दी अर्थ लिखने से अलग काम है। पहले दो पद पहचानें, फिर देखें कि मिलने पर ध्वनि कैसे बदली थी।

संयुक्त रूप

पदच्छेद

सरल कारण

विद्यालयः

विद्या + आलयः

आ और आ का मेल

नास्ति

न + अस्ति

अ और अ का मेल

तदपि

तत् + अपि

त् का द् होना

सदैव

सदा + एव

आ और ए से ऐ

सोऽपि

सः + अपि

विसर्ग-सन्धि; ऽ अवग्रह

“विद्यालयः” का अर्थ विद्या का स्थान है। पदच्छेद विद्या + आलयः है; “विद्यालय + ः” लिखना केवल चिह्न अलग करना है। किसी कठिन संयुक्त रूप में अनुमान से नए शब्द न बनाएँ; अर्थ और परिचित नियम दोनों देखें।

6. सरल अन्वय और भाव

अन्वय श्लोक के पदों को समझने योग्य वाक्यक्रम में रखता है। पहले क्रिया खोजें, फिर कौन कार्य करता है और किस पर कार्य होता है। जहाँ क्रिया स्पष्ट न लिखी हो वहाँ सामान्य अर्थ से निहित अस्ति जैसी क्रिया समझी जा सकती है। मूल शब्द मन से बदलना अन्वय नहीं है।

प्रसिद्ध परम्परागत श्लोक:

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।

न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥

पदच्छेद: उद्यमेन, हि, सिध्यन्ति, कार्याणि, न, मनोरथैः; न, हि, सुप्तस्य, सिंहस्य, प्रविशन्ति, मुखे, मृगाः। इस उदाहरण में अधिकांश पद पहले से अलग लिखे हैं; फिर भी उनका सही मूल रूप पहचानना उपयोगी है।

अन्वय: कार्याणि उद्यमेन हि सिध्यन्ति, मनोरथैः न। मृगाः सुप्तस्य सिंहस्य मुखे न हि प्रविशन्ति। पहले वाक्य की क्रिया सिध्यन्ति और कर्ता कार्याणि है। दूसरे की क्रिया प्रविशन्ति और कर्ता मृगाः है।

सरलार्थ: कार्य प्रयास से पूरे होते हैं, केवल इच्छा से नहीं। सोते सिंह के मुख में हिरण अपने आप नहीं आते। दूसरा चरण पहले विचार का उदाहरण देता है। परीक्षा में अच्छा करने की इच्छा उपयोगी है, लेकिन नियमित अभ्यास भी आवश्यक है। श्लोक प्रयत्न की सीख देता है; हर असफलता के लिए किसी व्यक्ति को दोष देने का आधार नहीं है।

7. मौलिक अपठित गद्यांश

अस्माकं विद्यालयस्य समीपे लघु उद्यानम् अस्ति। उद्याने विविधाः वृक्षाः सन्ति। प्रातः पक्षिणः मधुरं कूजन्ति। सप्तमकक्षायाः छात्राः प्रतिशुक्रवासरं तत्र गच्छन्ति। ते भूमौ पतितानि पत्राणि एकत्र कुर्वन्ति। द्वौ छात्रौ रोपेभ्यः जलं दत्तः। अध्यापिका छात्रेभ्यः वृक्षाणां महत्त्वं कथयति। छात्राः उद्यानं स्वच्छं रक्षितुं प्रयतन्ते।

पहली बार पढ़ते समय विषय पहचानें: विद्यालय का उद्यान और उसकी देखभाल। दूसरी बार कौन, कब, कहाँ और क्या के विवरण ढूँढ़ें। “सप्तमकक्षायाः” के कारण यह मत मानें कि उद्यान में केवल सात वृक्ष हैं; शब्द का सम्बन्ध कक्षा से है।

एकपदेन: छात्राः कदा उद्यानं गच्छन्ति? — प्रतिशुक्रवासरम्।

पूर्णवाक्येन: अध्यापिका किं कथयति? — अध्यापिका छात्रेभ्यः वृक्षाणां महत्त्वं कथयति।

स्थान: उद्यानं कुत्र अस्ति? — उद्यानं विद्यालयस्य समीपे अस्ति।

शीर्षक: उद्यानस्य रक्षणम्। यह पूरे अंश का कार्य और विषय दोनों बताता है।

8. प्रश्नवाचक पद चुनना

किस बात का प्रश्न?

प्रश्नपद

उदाहरण

कौन, पुल्लिङ्ग एकवचन

कः

कः पठति?

कौन, स्त्रीलिङ्ग एकवचन

का

का कथयति?

क्या

किम्

बालकः किं लिखति?

कहाँ

कुत्र

छात्राः कुत्र गच्छन्ति?

कब

कदा

ते कदा आगच्छन्ति?

किससे या किस साधन से

केन

सः केन लिखति?

किसका

कस्य

एतत् कस्य पुस्तकम्?

“अध्यापिका वृक्षाणां महत्त्वं कथयति” में अध्यापिका रेखाङ्कित हो तो का वृक्षाणां महत्त्वं कथयति? बनेगा। महत्त्वम् रेखाङ्कित हो तो किं प्रश्न आ सकता है। प्रश्न का उत्तर पहले तय करके देखें कि चुना प्रश्नपद उसी लक्ष्य को पूछता है।

9. शब्दार्थ, वाक्यार्थ और प्रमाण

शब्दार्थ एक शब्द का अर्थ है, जैसे उद्यानम् — बगीचा। वाक्यार्थ पूरे वाक्य का अर्थ है: उद्यान में कई प्रकार के पेड़ हैं। निष्कर्ष उपलब्ध वाक्यों से निकलता है: छात्र देखभाल में सहयोग करते हैं।

पाठ में छात्र पत्र एकत्र करते और पानी देते हैं, इसलिए सहयोग का निष्कर्ष समर्थित है। यह कहना कि उन्होंने उद्यान बनाया था, पाठ से निश्चित नहीं होता। उत्तर में जानकारी न मिले तो अनुमान को तथ्य न बनाएँ। बहुविकल्पीय प्रश्न में भी ऐसा विकल्प चुनें जो अंश से निकलता हो, केवल सुनने में अच्छा न लगे।

प्रश्न हल करने की विधि

  1. अंश का विषय समझने के लिए पूरा पाठ पढ़ें।

  2. कठिन शब्दों में मात्रा और संयुक्ताक्षर पहचानें।

  3. जुड़े पद अलग करके मुख्य क्रिया और कर्ता देखें।

  4. प्रश्नपद के अनुसार समय, स्थान या व्यक्ति खोजें।

  5. उत्तर की सीमा और पाठ का प्रमाण जाँचें।

सम्बन्ध

  • शब्दरूप से एकवचन, द्विवचन और बहुवचन का अर्थ स्पष्ट होता है।

  • धातुरूप से कर्ता और क्रिया का मेल समझ आता है।

  • सन्धि अध्याय पदच्छेद का नियम विस्तार से समझाता है।

सामान्य त्रुटियाँ

  • दीनम् को दिनम् पढ़ना मात्रा और अर्थ बदल देता है।

  • मित्रम् में अनावश्यक अ जोड़कर मितरम् न पढ़ें।

  • अनुस्वार और विसर्ग अलग चिह्न हैं; उनका अन्तर देखें।

  • पाठ में न कही गई घटना को उत्तर में निश्चित तथ्य न जोड़ें।

पुनरावृत्ति सूची

  • मैं वर्ण और मात्रा स्पष्ट पढ़ सकता/सकती हूँ।

  • मैं संयुक्ताक्षर अलग करके समझ सकता/सकती हूँ।

  • मैं सरल पदच्छेद और अन्वय कर सकता/सकती हूँ।

  • मैं प्रश्न के अनुसार एक पद या पूर्ण वाक्य दे सकता/सकती हूँ।

  • मैं निष्कर्ष को पाठ के प्रमाण से जाँच सकता/सकती हूँ।

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