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8 MIN LESSON · SANSKRIT

Class 7 Sanskrit: Compounds and Word Formation: Complete Concepts and Practice

संस्कृत — समास और विग्रह, अव्ययीभाव, तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु, द्वन्द्व, बहुव्रीहि का सरल परिचय, उपसर्ग, तुमुन्, क्त्वा, ल्यप्, क्त-क्तवतु और भाववाचक प्रत्यय।

परिचय

संस्कृत के कई बड़े शब्द छोटे अर्थपूर्ण भागों से बनते हैं। राजपुत्रः में राजा और पुत्र का सम्बन्ध है; आगच्छति में आ जुड़कर गच्छति के अर्थ में आने का भाव देता है; पठित्वा पढ़कर का अर्थ देता है। शब्द के भाग पहचानने से उसे बिना समझे याद करने की आवश्यकता घटती है।

इस अध्याय में समास, उपसर्ग और प्रत्यय की अलग भूमिकाएँ सीखेंगे। उदाहरण छोटे हैं, लेकिन हर बार अर्थ का कारण भी दिया गया है। प्रश्न में पद को खोलना, नया पद बनाना या वाक्य में सही रूप चुनना हो सकता है; इसलिए मूल पद और पूरा वाक्य दोनों देखें।

अधिगम उद्देश्य

  • पहचानें शब्द-निर्माण की अलग प्रक्रियाएँ।

  • करें सरल समस्तपदों का अर्थपूर्ण विग्रह।

  • समझाएँ प्रमुख समासों के पहचान-संकेत।

  • प्रयोग करें उपसर्गयुक्त परिचित क्रियाओं का।

  • अलग करें उद्देश्य, पूर्वकार्य और पूर्णकार्य के प्रत्यय।

  • चुनें वाक्य में अर्थ और लिङ्ग-वचन के अनुसार उचित पद।

मुख्य अवधारणाएँ

1. सन्धि और समास में अन्तर

सन्धि ध्वनियों का परिवर्तन है। समास अर्थसम्बद्ध पदों की संक्षिप्त रचना है। किसी समास में सन्धि भी हो सकती है, पर दोनों का प्रश्न अलग है। देवालयः में देव + आलयः का ध्वनि-मेल है, जबकि देव का स्थान जैसे अर्थगत सम्बन्ध के लिए विग्रह देखा जाता है।

समास-विग्रह संक्षिप्त शब्द का अर्थ खोलता है। राजपुत्रः = राज्ञः पुत्रः। केवल राज + पुत्र लिखना शब्दों का आधार दिखाता है, पर राजा के पुत्र का सम्बन्ध स्पष्ट करने वाला पूरा विग्रह नहीं है। परीक्षा में क्या माँगा गया है, पहले पहचानें।

2. समास में प्रधान अर्थ

समास का प्रकार जानने के लिए पूछें: शब्द मुख्यतः किसे बता रहा है? राजपुत्रः एक पुत्र है; रामलक्ष्मणौ दो व्यक्तियों का समुच्चय है; पीताम्बरः किसी पीले वस्त्रधारी व्यक्ति को बता सकता है। इन तीनों में अर्थ की प्रधानता अलग है।

भेद

पहचान का सरल संकेत

अव्ययीभाव

पूरा पद प्रायः अव्यय की तरह काम करता है

तत्पुरुष

उत्तरपद मुख्य, पहले पद से विभक्ति-सम्बन्ध

कर्मधारय

उसी वस्तु का विशेषण और नाम

द्विगु

संख्या और समाहार का अर्थ

द्वन्द्व

दोनों या अनेक पदों का समुच्चय

बहुव्रीहि

भीतर के पद किसी बाहरी व्यक्ति या वस्तु की पहचान दें

यह सारणी आरम्भिक मार्गदर्शक है। केवल किसी एक अक्षर या संख्या से बिना अर्थ देखे वर्ग तय न करें।

3. अव्ययीभाव के सरल रूप

अव्ययीभाव में अव्यय का भाव मुख्य होता है और समस्त पद अव्ययवत् प्रयुक्त होता है। प्रतिदिनम् का अर्थ हर दिन और यथाशक्ति का अर्थ शक्ति के अनुसार है।

शब्द

विग्रह

वाक्य

प्रतिदिनम्

दिनं दिनं प्रति

सः प्रतिदिनं पठति।

यथाशक्ति

शक्तिम् अनतिक्रम्य

वयं यथाशक्ति सहाय्यं कुर्मः।

यथाविधि

विधिम् अनतिक्रम्य

छात्रः यथाविधि कार्यं करोति।

“प्रतिदिनम्” में नित्य समय का अर्थ है, किसी व्यक्ति का नाम नहीं। यथाशक्ति को कर्ता बहुवचन होने पर यथाशक्तयः नहीं बनाएँ; वह कार्य की रीति बताने वाला अव्यय है।

4. तत्पुरुष और विभक्ति का सम्बन्ध

तत्पुरुष में उत्तरपद सामान्यतः मुख्य होता है। पहले पद का सम्बन्ध खोलने के लिए उचित विभक्ति लिखते हैं।

समस्तपद

विग्रह

सम्बन्ध

राजपुत्रः

राज्ञः पुत्रः

राजा का पुत्र

वनवासः

वने वासः

वन में निवास

चोरभयम्

चोरात् भयम्

चोर से भय

ग्रामगतः

ग्रामं गतः

ग्राम को गया हुआ

राजपुत्रः षष्ठी और वनवासः सप्तमी तत्पुरुष का उदाहरण है। नाम याद करने के साथ विग्रह की विभक्ति देखना उपयोगी है। राज्ञः को राजेन लिख देने से राजा का पुत्र वाला सम्बन्ध बदल जाएगा।

5. कर्मधारय: उसी वस्तु की विशेषता

कर्मधारय में विशेषण और विशेष्य एक ही वस्तु या व्यक्ति के बारे में होते हैं। नीलकमलम् = नीलं च तत् कमलम्। यहाँ नीला एक वस्तु और कमल दूसरी वस्तु की सूची नहीं; वही कमल नीला है।

महापुरुषः = महान् च असौ पुरुषः। कृष्णसर्पः = कृष्णः च असौ सर्पः। विग्रह में लिङ्ग का मेल रखें: कमलम् नपुंसकलिङ्ग है, इसलिए नीलम्; सर्पः पुल्लिङ्ग है, इसलिए कृष्णः।

यदि प्रश्न में केवल नील + कमल जैसे आधार दिए हों तो संयुक्त रूप बन सकता है; लेकिन पूरा विग्रह माँगे तो सम्बन्ध व्यक्त करें। यह भेद संक्षिप्त और विस्तृत उत्तर को सही बनाता है।

6. संख्या, समुच्चय और बाहरी विशेष्य

द्विगु का परिचित समाहार-उदाहरण त्रिभुवनम् = त्रयाणां भुवनानां समाहारः है। पञ्चवटी = पञ्चानां वटानां समाहारः। यहाँ समूह मुख्य है।

द्वन्द्व में अलग पद एक साथ आते हैं: रामलक्ष्मणौ = रामः च लक्ष्मणः च। दो व्यक्तियों के कारण द्विवचन है। इसका अर्थ राम का लक्ष्मण नहीं, बल्कि राम और लक्ष्मण है।

बहुव्रीहि का उदाहरण दशाननः = दश आननानि यस्य सः है। शब्द ऐसे व्यक्ति को बताता है जिसके दस मुख हैं। संख्या पहले होने पर भी यदि बाहरी व्यक्ति प्रधान है तो उसे केवल द्विगु नहीं कहेंगे।

पीताम्बरः = पीतम् अम्बरं यस्य सः पीला वस्त्रधारी व्यक्ति है। लेकिन पीताम्बरम् का आशय केवल पीला वस्त्र हो तो विशेषण-विशेष्य सम्बन्ध अलग होगा। अभी यह समझना पर्याप्त है कि अर्थ और प्रसंग से समास का निर्णय होता है।

7. उपसर्ग से क्रिया का अर्थ

उपसर्ग धातु से पहले जुड़कर अर्थ को विशेष बनाता है। आ, प्र, अनु, प्रति, उप, वि और सम् परिचित उदाहरण हैं। उपसर्ग का रूप आगे के वर्ण से सन्धि में बदल सकता है।

निर्माण

पूरा रूप

आशय

आ + गम्

आगच्छति

आता है

अनु + गम्

अनुगच्छति

पीछे जाता या अनुसरण करता है

प्रति + गम्

प्रतिगच्छति

लौटता है

उप + विश्

उपविशति

बैठता है

प्र + नम्

प्रणमति

प्रणाम करता है

एक उपसर्ग का अर्थ हर क्रिया में बिलकुल एक जैसा नहीं होता। उपविशति का स्वाभाविक अर्थ बैठता है है; केवल पास और प्रवेश के अलग शब्द जोड़ने से अच्छा अनुवाद नहीं बनेगा। परिचित पूरे प्रयोग को समझें।

8. तुमुन्: उद्देश्य

तुमुन् से बने पद करने के लिए का अर्थ दे सकते हैं। पठ् से पठितुम्, लिख् से लिखितुम्, गम् से गन्तुम् और कृ से कर्तुम् बनते हैं। धातु में हमेशा एक ही हिस्सा जोड़ने से रूप नहीं बनता; गमितुम् के स्थान पर परिचित सही रूप गन्तुम् है।

वाक्य: बालकः पठितुं पुस्तकालयं गच्छति। पढ़ना अभी उद्देश्य है। बालिका जलम् आनेतुं गच्छति में जल लाने का प्रयोजन है। इन अव्यय रूपों का लिङ्ग नहीं बदलता; बालिका के साथ पठितुमा न लिखें।

9. क्त्वा और ल्यप्: पहले कार्य करके

क्त्वा से पठित्वा, लिखित्वा, गत्वा, कृत्वा जैसे रूप बनते हैं। वे एक ही कर्ता का पहले सम्पन्न कार्य बताते हैं। सः पठित्वा लिखति में पहले पढ़ता है, फिर लिखता है।

उपसर्गयुक्त धातु में परिचित ल्यप् रूप मिलते हैं: आ + गम् = आगत्य, अव + लोक् = अवलोक्य। सः आगत्य उपविशति का अर्थ आकर बैठता है है।

अर्थ का भेद: पठितुम् गच्छति = पढ़ने के लिए जाता है। पठित्वा गच्छति = पढ़कर जाता है। दोनों में एक जैसे शब्द दिखते हैं, पर कार्य का समय अलग है। कथा का क्रम समझने में यह अन्तर आवश्यक है।

10. क्त, क्तवतु और रूप-सामञ्जस्य

क्त से लिखितम्, पठितम्, गतः जैसे पूर्णकार्य से जुड़े रूप आते हैं। क्तवतु से पठितवान्, पठितवती और कृतवान् जैसे कर्ता-सूचक रूप आते हैं।

वाक्य

कारण

बालकः पाठं पठितवान्।

कर्ता पुल्लिङ्ग

बालिका पाठं पठितवती।

कर्ता स्त्रीलिङ्ग

मया पुस्तकं पठितम्।

पुस्तक नपुंसकलिङ्ग

मया कथा पठिता।

कथा स्त्रीलिङ्ग

कृदन्त विशेषण के रूप बदल सकते हैं, जबकि गत्वा और पठितुम् जैसे अव्यय नहीं बदलते। यह अन्तर पहचानने से “बालिका पठितवान्” जैसी त्रुटि सुधरती है।

11. नाम से नए नाम और भाव

तद्धित प्रत्यय नामपद से नए पद बनाते हैं। त्व और ता जैसे परिचित परिणाम भाव बताते हैं: मित्रत्वम्, सरलता और लघुता। शब्द के गुण को एक भाव के रूप में कहा जाता है।

स्त्रीलिङ्ग रूप भी नियम से बनते हैं: छात्रः→छात्रा, बालकः→बालिका। सभी शब्दों में एक ही अन्त जोड़ना नियम नहीं है। लता पहले से स्त्रीलिङ्ग है; उसे लतिका बनाना हर प्रसंग में केवल व्याकरणिक स्त्रीलिङ्ग परिवर्तन नहीं, शब्द का अर्थ भी प्रभावित कर सकता है।

12. अर्थपूर्ण शब्द-निर्माण की जाँच

यदि नया पद बनाया है तो उसे वाक्य में रखें। “सः प्रतिदिनं पठति” में प्रतिदिनम् समय बताता है। “सः पठित्वा लिखति” में पूर्वकार्य। “राजपुत्रः पठति” में पूरा समस्त पद कर्ता है। तीनों को एक ही प्रकार का अव्यय न समझें।

सही उत्तर के लिए केवल अन्तिम रूप पर्याप्त नहीं जब प्रश्न कारण माँगता है। उपसर्ग हो तो मूल धातु, समास हो तो सम्बन्ध और प्रत्यय हो तो अर्थ स्पष्ट करें। इससे अगले नए प्रश्न में भी वही विधि काम करेगी।

प्रश्न हल करने की विधि

  1. मूल आधार और अर्थ पहचानें।

  2. समास, उपसर्ग या प्रत्यय का प्रश्न अलग करें।

  3. समास में सम्बन्ध सहित विग्रह लिखें।

  4. प्रत्यय में उद्देश्य और पूर्वकार्य का भेद देखें।

  5. पूरे वाक्य में लिङ्ग-वचन और अर्थ जाँचें।

सम्बन्ध

  • विभक्ति का ज्ञान राज्ञः पुत्रः जैसे विग्रह को सही बनाता है।

  • सन्धि शब्द-निर्माण में ध्वनि के परिवर्तन समझाती है।

  • अनुवाद में तुमुन् और क्त्वा का भेद घटनाक्रम सुरक्षित रखता है।

सामान्य त्रुटियाँ

  • केवल संख्या देखकर हर पद को द्विगु न कहें; बाहरी व्यक्ति भी प्रधान हो सकता है।

  • समास-विग्रह में सम्बन्ध की विभक्ति न छोड़ें।

  • पठितुम् का अर्थ पढ़कर नहीं, पढ़ने के लिए है।

  • बालिका के साथ क्तवतु का रूप पठितवती चाहिए, पठितवान् नहीं।

पुनरावृत्ति सूची

  • मैं प्रमुख समासों के छोटे उदाहरण पहचान सकता/सकती हूँ।

  • मैं अर्थपूर्ण विग्रह लिख सकता/सकती हूँ।

  • मैं उपसर्ग से बदले क्रिया-अर्थ समझ सकता/सकती हूँ।

  • मैं उद्देश्य और पूर्वकार्य के पद अलग कर सकता/सकती हूँ।

  • मैं कृदन्त और अव्यय का रूप जाँच सकता/सकती हूँ।

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