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7 MIN LESSON · SANSKRIT

Class 12 Sanskrit: Sandhi and Sound Change: Complete Concepts and Practice

संस्कृत — सन्धि की परिभाषा और प्रकार: स्वर सन्धि (दीर्घ, गुण, वृद्धि, यण्, अयादि), व्यञ्जन सन्धि (श्चुत्व, ष्टुत्व, जश्त्व, चर्त्व, अनुनासिक, अनुस्वार, परसवर्ण, लत्व) और विसर्ग सन्धि (सत्व, उत्व, रुत्व, विसर्ग-लोप), सूत्रों, उदाहरणों और सन्धि-विच्छेद की विधि सहित।

परिचय

जब दो वर्ण पास-पास आते हैं, तो उनके मेल से उच्चारण में परिवर्तन होता है। इस मेल को सन्धि कहते हैं: "सन्धिः" = दो वर्णों का मेल। जैसे विद्या + आलयः = विद्यालयः। सन्धि से बने शब्द को उसके मूल पदों में तोड़ना सन्धि-विच्छेद कहलाता है।

सन्धि तीन प्रकार की होती है: स्वर सन्धि, व्यञ्जन सन्धि और विसर्ग सन्धि। परीक्षा में सन्धि करना, सन्धि-विच्छेद करना और सन्धि का नाम बताना पूछा जाता है।

अधिगम उद्देश्य

  • सन्धि और सन्धि-विच्छेद की परिभाषा देना।

  • स्वर सन्धि के पाँच भेदों के नियम और उदाहरण बताना।

  • व्यञ्जन सन्धि के प्रमुख नियम लागू करना।

  • विसर्ग सन्धि के प्रमुख नियम लागू करना।

  • किसी शब्द में सन्धि पहचानकर विच्छेद करना।

मुख्य अवधारणाएँ

1. स्वर सन्धि (अच् सन्धि)

जब स्वर के बाद स्वर आता है, तो स्वर सन्धि होती है।

(क) दीर्घ सन्धि (अकः सवर्णे दीर्घः): समान स्वर (ह्रस्व या दीर्घ) मिलकर दीर्घ हो जाते हैं।

नियम

उदाहरण

अ/आ + अ/आ = आ

विद्या + आलयः = विद्यालयः; हिम + आलयः = हिमालयः

इ/ई + इ/ई = ई

कवि + ईशः = कवीशः; गिरि + ईशः = गिरीशः

उ/ऊ + उ/ऊ = ऊ

भानु + उदयः = भानूदयः; गुरु + उपदेशः = गुरूपदेशः

ऋ + ऋ = ॠ

पितृ + ऋणम् = पितॄणम्

(ख) गुण सन्धि (आद् गुणः): अ/आ के बाद इ/ई, उ/ऊ, ऋ आए तो क्रमशः ए, ओ, अर् हो जाते हैं।

नियम

उदाहरण

अ/आ + इ/ई = ए

देव + इन्द्रः = देवेन्द्रः; महा + ईशः = महेशः

अ/आ + उ/ऊ = ओ

सूर्य + उदयः = सूर्योदयः; महा + उत्सवः = महोत्सवः

अ/आ + ऋ = अर्

महा + ऋषिः = महर्षिः; देव + ऋषिः = देवर्षिः

(ग) वृद्धि सन्धि (वृद्धिरेचि): अ/आ के बाद ए/ऐ आए तो ऐ, और ओ/औ आए तो औ हो जाता है।

नियम

उदाहरण

अ/आ + ए/ऐ = ऐ

सदा + एव = सदैव; मत + ऐक्यम् = मतैक्यम्

अ/आ + ओ/औ = औ

वन + ओषधिः = वनौषधिः; महा + औषधम् = महौषधम्

(घ) यण् सन्धि (इको यणचि): इ/ई, उ/ऊ, ऋ के बाद कोई भिन्न स्वर आए तो क्रमशः य्, व्, र् हो जाते हैं।

नियम

उदाहरण

इ/ई + भिन्न स्वर = य्

इति + आदि = इत्यादि; यदि + अपि = यद्यपि

उ/ऊ + भिन्न स्वर = व्

सु + आगतम् = स्वागतम्; अनु + अयः = अन्वयः

ऋ + भिन्न स्वर = र्

पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा; मातृ + आदेशः = मात्रादेशः

(ङ) अयादि सन्धि (एचोऽयवायावः): ए, ऐ, ओ, औ के बाद कोई स्वर आए तो क्रमशः अय्, आय्, अव्, आव् हो जाते हैं।

नियम

उदाहरण

ए + स्वर = अय्

ने + अनम् = नयनम्; शे + अनम् = शयनम्

ऐ + स्वर = आय्

नै + अकः = नायकः; गै + अकः = गायकः

ओ + स्वर = अव्

पो + अनः = पवनः; भो + अनम् = भवनम्

औ + स्वर = आव्

पौ + अकः = पावकः; भौ + उकः = भावुकः

पूर्वरूप सन्धि (एङः पदान्तादति): पद के अन्त में ए/ओ के बाद "अ" आए तो "अ" का लोप होकर ऽ (अवग्रह) लगता है: हरे + अव = हरेऽव; विष्णो + अव = विष्णोऽव।

2. व्यञ्जन सन्धि (हल् सन्धि)

जब व्यञ्जन के बाद व्यञ्जन या स्वर आता है, तो व्यञ्जन सन्धि होती है।

नियम

विवरण

उदाहरण

श्चुत्व (स्तोः श्चुना श्चुः)

स् या त-वर्ग के साथ श् या च-वर्ग का योग हो तो स् → श्, त-वर्ग → च-वर्ग

सत् + चित् = सच्चित्; रामस् + शेते = रामश्शेते; उत् + ज्वलः = उज्ज्वलः

ष्टुत्व (ष्टुना ष्टुः)

स् या त-वर्ग के साथ ष् या ट-वर्ग का योग हो तो स् → ष्, त-वर्ग → ट-वर्ग

तत् + टीका = तट्टीका; रामस् + षष्ठः = रामष्षष्ठः

जश्त्व (झलां जशोऽन्ते)

पद के अन्त के वर्गीय व्यञ्जन के बाद स्वर या घोष वर्ण आए तो वह अपने वर्ग का तीसरा वर्ण बन जाता है

वाक् + ईशः = वागीशः; जगत् + ईशः = जगदीशः; अच् + अन्तः = अजन्तः

चर्त्व (खरि च)

वर्ग के तीसरे/चौथे वर्ण के बाद अघोष (खर्) वर्ण आए तो वह पहला वर्ण बन जाता है

उद् + साहः = उत्साहः; सद् + कारः = सत्कारः

अनुनासिक (यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा)

पद के अन्त के वर्गीय व्यञ्जन के बाद नासिक्य वर्ण (ङ, ञ, ण, न, म) आए तो वह अपने वर्ग का पञ्चम वर्ण बन जाता है

जगत् + नाथः = जगन्नाथः; वाक् + मयम् = वाङ्मयम्

अनुस्वार (मोऽनुस्वारः)

पद के अन्त के म् के बाद व्यञ्जन आए तो म् → अनुस्वार (ं)

हरिम् + वन्दे = हरिं वन्दे; गृहम् + गच्छति = गृहं गच्छति

परसवर्ण (अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः)

अनुस्वार के बाद वर्गीय वर्ण हो तो अनुस्वार उसी वर्ग का पञ्चम वर्ण बन जाता है

सं + चयः = सञ्चयः; अं + कितः = अङ्कितः

लत्व (तोर्लि)

त-वर्ग के बाद ल् आए तो वह ल् बन जाता है

तत् + लीनः = तल्लीनः; उत् + लासः = उल्लासः

3. विसर्ग सन्धि

जब विसर्ग (ः) के बाद स्वर या व्यञ्जन आता है, तो विसर्ग सन्धि होती है।

नियम

विवरण

उदाहरण

सत्व (विसर्जनीयस्य सः)

विसर्ग के बाद खर् (अघोष) वर्ण, विशेषकर त्, च्, श् आदि आएँ तो विसर्ग → स् (फिर श्चुत्व से श्)

नमः + ते = नमस्ते; निः + चलः = निश्चलः; हरिः + शेते = हरिश्शेते

उत्व (हशि च / अतो रोरप्लुतादप्लुते)

अ के बाद विसर्ग हो और आगे "अ" या घोष व्यञ्जन हो तो विसर्ग → उ, और अ + उ = ओ

मनः + रथः = मनोरथः; यशः + दा = यशोदा; रामः + अवदत् = रामोऽवदत्

रुत्व (ससजुषो रुः)

अ/आ को छोड़कर अन्य स्वर के बाद विसर्ग हो, और आगे स्वर या घोष वर्ण हो, तो विसर्ग → र्

निः + आशा = निराशा; दुः + उपयोगः = दुरुपयोगः; निः + धनः = निर्धनः

विसर्ग-लोप

अ के बाद विसर्ग हो और आगे "अ" के अतिरिक्त कोई स्वर हो, तो विसर्ग का लोप हो जाता है

रामः + इति = राम इति; अतः + एव = अत एव

सः, एषः का विसर्ग-लोप (एतत्तदोः सुलोपो...)

"सः" और "एषः" के बाद कोई व्यञ्जन आए तो विसर्ग का लोप

सः + गच्छति = स गच्छति; एषः + विष्णुः = एष विष्णुः

4. सन्धि-विच्छेद की विधि

  1. शब्द में परिवर्तित वर्ण खोजें (जैसे ए, ओ, य्, व्, ओऽ, च्च, ङ्)।

  2. सोचें कि यह परिवर्तन किस नियम से हो सकता है।

  3. मूल वर्ण वापस रखें और दोनों पद अर्थपूर्ण हों, यह जाँचें।

उदाहरण:

  • महेशः: "ए" गुण सन्धि का संकेत है → महा + ईशः (आ + ई = ए)।

  • स्वागतम्: "स्व" में व् यण् सन्धि का संकेत है → सु + आगतम्।

  • पावकः: "आव्" अयादि सन्धि का संकेत है → पौ + अकः।

  • जगन्नाथः: "न्न" अनुनासिक सन्धि → जगत् + नाथः।

  • मनोरथः: "ओ" के बाद घोष वर्ण → विसर्ग सन्धि (उत्व) → मनः + रथः।

प्रश्न हल करने की विधि

  1. पहले देखें कि मेल स्वर-स्वर, व्यञ्जन-व्यञ्जन/स्वर या विसर्ग-वर्ण का है।

  2. स्वर सन्धि में: समान स्वर → दीर्घ; अ + इ/उ/ऋ → गुण; अ + ए/ओ → वृद्धि; इ/उ/ऋ + भिन्न स्वर → यण्; ए/ऐ/ओ/औ + स्वर → अयादि।

  3. व्यञ्जन सन्धि में अगले वर्ण का वर्ग और घोषत्व देखें।

  4. विसर्ग सन्धि में विसर्ग से पहले का स्वर और बाद का वर्ण देखें।

सम्बन्ध

  • पदच्छेद और अन्वय के लिए सन्धि-विच्छेद आवश्यक है।

  • समास में भी पदों के जुड़ने पर सन्धि होती है।

  • हिन्दी व्याकरण की सन्धि इन्हीं नियमों पर आधारित है।

सामान्य त्रुटियाँ

  • गुण और वृद्धि को मिलाना। अ + इ = ए (गुण), पर अ + ए = ऐ (वृद्धि)।

  • "निराशा" को "निः + राशा" बताना। सही विच्छेद "निः + आशा" है।

  • "सूर्योदयः" को दीर्घ सन्धि बताना। अ + उ = ओ, यह गुण सन्धि है।

  • "रामोऽवदत्" में अवग्रह (ऽ) भूलना।

पुनरावृत्ति सूची

  • मैं स्वर सन्धि के पाँचों भेद नियम और उदाहरण सहित बता सकता/सकती हूँ।

  • मैं श्चुत्व, ष्टुत्व, जश्त्व, चर्त्व, अनुनासिक, अनुस्वार, परसवर्ण और लत्व समझा सकता/सकती हूँ।

  • मैं सत्व, उत्व, रुत्व और विसर्ग-लोप के नियम लागू कर सकता/सकती हूँ।

  • मैं किसी भी शब्द का सन्धि-विच्छेद करके सन्धि का नाम बता सकता/सकती हूँ।

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