परिचय
संस्कृत में शब्द का रूप बताता है कि वाक्य में उसकी क्या भूमिका है। "रामः वनं गच्छति" और "वनं रामः गच्छति" का अर्थ एक ही है, क्योंकि विभक्ति (शब्द के अन्त में लगने वाला प्रत्यय) बताती है कि कौन जा रहा है और कहाँ।
संज्ञा और सर्वनाम शब्दों के रूप सात विभक्तियों और तीन वचनों (एकवचन, द्विवचन, बहुवचन) में चलते हैं। इस अध्याय में प्रमुख शब्दरूप, कारक और उपपद विभक्तियाँ दी गई हैं, जो परीक्षा में रिक्त-स्थान पूर्ति और वाक्य-शुद्धि के रूप में पूछी जाती हैं।
अधिगम उद्देश्य
विभक्ति, वचन और कारक की अवधारणा समझाना।
प्रमुख शब्दों के रूप शुद्ध लिखना।
सात कारकों और उनकी विभक्तियों की पहचान करना।
उपपद विभक्तियों के नियम उदाहरणों सहित लागू करना।
वाक्यों में विभक्ति की अशुद्धि ठीक करना।
मुख्य अवधारणाएँ
1. विभक्ति और वचन
संस्कृत में सात विभक्तियाँ (प्रथमा से सप्तमी) और सम्बोधन होते हैं।
तीन वचन: एकवचन (एक), द्विवचन (दो), बहुवचन (तीन या अधिक)।
तीन लिङ्ग: पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग, नपुंसकलिङ्ग।
2. प्रमुख शब्दरूप
राम (अकारान्त पुंलिङ्ग):
विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथमा | रामः | रामौ | रामाः |
द्वितीया | रामम् | रामौ | रामान् |
तृतीया | रामेण | रामाभ्याम् | रामैः |
चतुर्थी | रामाय | रामाभ्याम् | रामेभ्यः |
पञ्चमी | रामात् | रामाभ्याम् | रामेभ्यः |
षष्ठी | रामस्य | रामयोः | रामाणाम् |
सप्तमी | रामे | रामयोः | रामेषु |
सम्बोधन | हे राम | हे रामौ | हे रामाः |
इसी प्रकार बालक, देव, वृक्ष, छात्र आदि के रूप चलते हैं (र, ऋ, ष न होने पर "ण" के स्थान पर "न": बालकेन, बालकानाम्)।
फल (अकारान्त नपुंसकलिङ्ग): प्रथमा और द्वितीया: फलम्, फले, फलानि; सम्बोधन: हे फल, हे फले, हे फलानि। शेष विभक्तियाँ राम के समान (फलेन, फलाय, फलात्, फलस्य, फले)।
लता (आकारान्त स्त्रीलिङ्ग):
विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथमा | लता | लते | लताः |
द्वितीया | लताम् | लते | लताः |
तृतीया | लतया | लताभ्याम् | लताभिः |
चतुर्थी | लतायै | लताभ्याम् | लताभ्यः |
पञ्चमी | लतायाः | लताभ्याम् | लताभ्यः |
षष्ठी | लतायाः | लतयोः | लतानाम् |
सप्तमी | लतायाम् | लतयोः | लतासु |
सम्बोधन | हे लते | हे लते | हे लताः |
हरि (इकारान्त पुंलिङ्ग):
विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथमा | हरिः | हरी | हरयः |
द्वितीया | हरिम् | हरी | हरीन् |
तृतीया | हरिणा | हरिभ्याम् | हरिभिः |
चतुर्थी | हरये | हरिभ्याम् | हरिभ्यः |
पञ्चमी | हरेः | हरिभ्याम् | हरिभ्यः |
षष्ठी | हरेः | हर्योः | हरीणाम् |
सप्तमी | हरौ | हर्योः | हरिषु |
सम्बोधन | हे हरे | हे हरी | हे हरयः |
अस्मद् (मैं) और युष्मद् (तुम) के मुख्य रूप:
विभक्ति | अस्मद् (एक / बहु) | युष्मद् (एक / बहु) |
|---|---|---|
प्रथमा | अहम् / वयम् | त्वम् / यूयम् |
द्वितीया | माम् / अस्मान् | त्वाम् / युष्मान् |
तृतीया | मया / अस्माभिः | त्वया / युष्माभिः |
चतुर्थी | मह्यम् / अस्मभ्यम् | तुभ्यम् / युष्मभ्यम् |
पञ्चमी | मत् / अस्मत् | त्वत् / युष्मत् |
षष्ठी | मम / अस्माकम् | तव / युष्माकम् |
सप्तमी | मयि / अस्मासु | त्वयि / युष्मासु |
3. कारक और विभक्ति
क्रिया से सीधा सम्बन्ध रखने वाले पद को कारक कहते हैं। कारक छह हैं; सम्बन्ध (षष्ठी) को कारक नहीं माना जाता क्योंकि उसका सम्बन्ध क्रिया से नहीं, संज्ञा से होता है।
कारक | विभक्ति | पहचान | उदाहरण |
|---|---|---|---|
कर्ता | प्रथमा | क्रिया करने वाला | बालकः पठति। |
कर्म | द्वितीया | जिस पर क्रिया का फल पड़े | सः पुस्तकम् पठति। |
करण | तृतीया | क्रिया का साधन | सः लेखन्या लिखति। |
सम्प्रदान | चतुर्थी | जिसे कुछ दिया जाए | नृपः विप्राय धनं ददाति। |
अपादान | पञ्चमी | जिससे अलग होना हो | वृक्षात् पत्रं पतति। |
सम्बन्ध | षष्ठी | सम्बन्ध दिखाने वाला | रामस्य पुत्रः लवः। |
अधिकरण | सप्तमी | क्रिया का आधार (स्थान, समय) | जले मत्स्याः वसन्ति। |
ध्यान दें: कर्मवाच्य और भाववाच्य में कर्ता तृतीया में होता है: मया पुस्तकं पठ्यते।
4. उपपद विभक्तियाँ
कुछ विशेष पदों (अव्ययों) या धातुओं के योग में विशेष विभक्ति लगती है, जिसे उपपद विभक्ति कहते हैं।
द्वितीया विभक्ति:
योग | उदाहरण |
|---|---|
अभितः (दोनों ओर), परितः (चारों ओर), उभयतः, सर्वतः | ग्रामम् परितः वृक्षाः सन्ति। |
प्रति (की ओर) | बालकः विद्यालयं प्रति गच्छति। |
धिक् | धिक् दुर्जनम्। |
निकषा, समया (समीप) | ग्रामं निकषा नदी वहति। |
अन्तरा (बीच में), अन्तरेण (बिना) | रामं कृष्णं च अन्तरा बालकः तिष्ठति। |
तृतीया विभक्ति:
योग | उदाहरण |
|---|---|
सह, साकम्, सार्धम्, समम् (साथ) | पुत्रः पित्रा सह गच्छति। |
अलम् (बस, निषेध के अर्थ में) | अलं कोलाहलेन। |
अङ्गविकार (शरीर के अङ्ग का दोष) | सः नेत्रेण काणः अस्ति। |
हेतु (कारण) | विद्यया यशः लभते। |
प्रकृत्या आदि | सः प्रकृत्या दयालुः। |
चतुर्थी विभक्ति:
योग | उदाहरण |
|---|---|
नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा | गणेशाय नमः। प्रजाभ्यः स्वस्ति। अग्नये स्वाहा। |
अलम् (पर्याप्त, समर्थ के अर्थ में) | दैत्येभ्यः हरिः अलम्। |
रुच् (अच्छा लगना) | बालकाय मोदकं रोचते। |
क्रुध्, द्रुह्, ईर्ष्य्, असूय् (क्रोध, द्रोह, ईर्ष्या) | पिता पुत्राय क्रुध्यति। |
स्पृह् (चाहना) | पुष्पेभ्यः स्पृहयति। |
पञ्चमी विभक्ति:
योग | उदाहरण |
|---|---|
बहिः (बाहर) | ग्रामात् बहिः उद्यानम् अस्ति। |
ऋते, विना (बिना) | ज्ञानात् ऋते मुक्तिः न। |
पूर्वम्, प्रभृति, आरभ्य | भोजनात् पूर्वं हस्तौ प्रक्षालय। बाल्यात् प्रभृति सः सत्यं वदति। |
भी, त्रा (डर, रक्षा) | बालकः सिंहात् बिभेति। |
प्रभव, जन् (उत्पत्ति) | हिमालयात् गङ्गा प्रभवति। |
तुलना (तरप् प्रत्यय वाले शब्द) | रामः श्यामात् पटुतरः। |
षष्ठी विभक्ति:
योग | उदाहरण |
|---|---|
उपरि, अधः | वृक्षस्य उपरि खगः, वृक्षस्य अधः बालकः। |
पुरतः, पृष्ठतः, समक्षम् | गृहस्य पुरतः उद्यानम्। |
कृते (के लिए) | बालकानां कृते पुस्तकानि। |
निर्धारण (बहुतों में से एक को श्रेष्ठ बताना): षष्ठी या सप्तमी: कवीनां (या कविषु) कालिदासः श्रेष्ठः।
सप्तमी विभक्ति:
योग | उदाहरण |
|---|---|
स्निह् (स्नेह करना) | माता पुत्रे स्निह्यति। |
विश्वस् (विश्वास करना) | मित्रे विश्वसिति। |
निपुण, कुशल, प्रवीण, दक्ष | सः क्रीडायां निपुणः। |
भाव-सप्तमी (एक क्रिया के होने पर दूसरी) | सूर्ये अस्तं गते सर्वे गृहं गच्छन्ति। |
5. वाक्य-शुद्धि के उदाहरण
अशुद्ध वाक्य | शुद्ध वाक्य | नियम |
|---|---|---|
ग्रामस्य परितः वृक्षाः। | ग्रामं परितः वृक्षाः। | परितः के योग में द्वितीया |
पुत्रः पिता सह गच्छति। | पुत्रः पित्रा सह गच्छति। | सह के योग में तृतीया |
शिवं नमः। | शिवाय नमः। | नमः के योग में चतुर्थी |
बालकः सर्पं बिभेति। | बालकः सर्पात् बिभेति। | भी धातु के योग में पञ्चमी |
वृक्षं उपरि खगः। | वृक्षस्य उपरि खगः। | उपरि के योग में षष्ठी |
माता पुत्रं स्निह्यति। | माता पुत्रे स्निह्यति। | स्निह् धातु के योग में सप्तमी |
प्रश्न हल करने की विधि
वाक्य में क्रिया और उपपद (सह, नमः, परितः आदि) पहचानें।
उपपद हो तो उसकी निर्धारित विभक्ति लगाएँ; न हो तो कारक के अनुसार विभक्ति लगाएँ।
शब्द का लिङ्ग और वचन देखकर सही रूप चुनें।
शब्दरूप तालिका से मिलान करें।
सम्बन्ध
धातुरूप और लकार के साथ मिलकर विभक्ति पूरा वाक्य बनाती है।
अनुवाद में सही विभक्ति का प्रयोग सबसे आवश्यक है।
वाच्य-परिवर्तन में कर्ता और कर्म की विभक्ति बदलती है।
सामान्य त्रुटियाँ
"सह" के साथ प्रथमा लगाना। सह के योग में तृतीया होती है।
"नमः" के साथ द्वितीया लगाना। नमः के योग में चतुर्थी होती है।
"सम्बन्ध" को कारक मानना। सम्बन्ध कारक नहीं है।
"रामेन" लिखना। र के बाद "ण" होता है: रामेण।
पुनरावृत्ति सूची
मैं राम, फल, लता, हरि, अस्मद् और युष्मद् के रूप लिख सकता/सकती हूँ।
मैं छह कारक और उनकी विभक्तियाँ पहचान सकता/सकती हूँ।
मैं सभी विभक्तियों की उपपद विभक्तियाँ उदाहरणों सहित बता सकता/सकती हूँ।
मैं विभक्ति-सम्बन्धी अशुद्धियाँ ठीक कर सकता/सकती हूँ।