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8 MIN LESSON · SANSKRIT

Class 11 Sanskrit: Translation and Transformation: Complete Concepts and Practice

संस्कृत — हिन्दी-संस्कृत अनुवाद, कारक और काल, कर्तृवाच्य-कर्मवाच्य-भाववाच्य, वचन-परिवर्तन, क्त-क्तवतु प्रयोग, अव्यय, समय-लेखन, क्रमबद्धता और वाक्य-संशोधन।

परिचय

अनुवाद का उद्देश्य मूल कथन का अर्थ दूसरी भाषा में शुद्ध और स्वाभाविक रूप से रखना है। हिन्दी का प्रत्येक शब्द उसी क्रम में संस्कृत में रख देने से सही अनुवाद नहीं बनता। “मुझे पुस्तक चाहिए” में चाहने का आशय और व्यक्ति-सम्बन्ध समझना होगा; केवल मुझे के लिए एक रूप और चाहिए के लिए कोई परिचित क्रिया जोड़ना पर्याप्त नहीं है।

रूपान्तरण में मूल घटना या कथन बनाए रखते हुए काल, वचन, वाच्य या वाक्य-रचना बदली जाती है। “बालिका पुस्तकं पठति” को कर्मवाच्य में बदलते समय पढ़ने की घटना वही रहेगी, लेकिन कर्ता और कर्म की विभक्ति तथा क्रिया का नियामक बदल जाएगा। यही अर्थ-सुरक्षा इस अध्याय का आधार है।

अधिगम उद्देश्य

  • पहचानें अनुवाद से पहले कर्ता, कर्म, काल और मुख्य भाव।

  • लिखें कारक और पुरुष-वचन के अनुसार शुद्ध संस्कृत वाक्य।

  • बदलें कर्तृवाच्य को कर्मवाच्य और भाववाच्य में।

  • प्रयोग करें क्त, क्तवतु, तुमुन् और पूर्वकार्य के रूप।

  • लिखें समय और अव्ययों के सही प्रयोग।

  • सुधारें त्रुटिपूर्ण वाक्य और घटनाओं का अनुचित क्रम।

मुख्य अवधारणाएँ

1. शब्दशः अनुवाद के स्थान पर अर्थ-योजना

पहले वाक्य का मुख्य ढाँचा बनाएँ: कौन, क्या करता है, किसे या क्या, कहाँ और कब? फिर सम्बन्ध के अनुसार विभक्ति और क्रिया चुनें। सरल वाक्य में संस्कृत का सामान्य क्रम कर्ता–कर्म–क्रिया हो सकता है, पर विभक्ति सही होने पर पदक्रम बदल भी सकता है।

हिन्दी

संस्कृत

कारण

बच्चा पुस्तक पढ़ता है।

बालकः पुस्तकं पठति।

कर्ता प्रथमा, कर्म द्वितीया

बच्ची लेखनी से लिखती है।

बालिका लेखन्या लिखति।

साधन तृतीया

शिक्षक छात्र को पुस्तक देता है।

शिक्षकः छात्राय पुस्तकं ददाति।

प्राप्तकर्ता चतुर्थी

पत्ता वृक्ष से गिरता है।

पत्रं वृक्षात् पतति।

अलगाव या स्रोत पञ्चमी

विद्यालय में उद्यान है।

विद्यालये उद्यानम् अस्ति।

स्थान सप्तमी

हिन्दी के ‘से’ का अर्थ कभी साधन, कभी साथ और कभी अलगाव होता है। “लेखनी से” तृतीया और “वृक्ष से गिरना” पञ्चमी है। एक ही हिन्दी परसर्ग देखकर हर वाक्य में वही विभक्ति लगाना गलत होगा।

2. पुरुष, वचन, लिङ्ग और काल

अहम् के साथ उत्तम पुरुष, त्वम् के साथ मध्यम और सः/सा के साथ प्रथम पुरुष आता है। भवान्/भवती सम्मानसूचक होते हुए भी प्रथम पुरुष क्रिया लेते हैं। दो कर्ताओं के लिए द्विवचन पर ध्यान दें।

वाक्य का आशय

संस्कृत

मैं पढ़ता/पढ़ती हूँ।

अहं पठामि।

हम दोनों जाते हैं।

आवां गच्छावः।

तुम दोनों लिखते हो।

युवां लिखथः।

वे सब पढ़ेंगे।

ते पठिष्यन्ति।

कल बीते दिन मैंने पढ़ा।

ह्यः अहम् अपठम्।

आप यहाँ बैठिए।

भवान् अत्र उपविशतु।

सामान्य तिङन्त क्रिया लिङ्ग से नहीं बदलती: बालकः पठति और बालिका पठति। लेकिन विशेषण तथा क्तवतु जैसे कृदन्त बदलते हैं। समयसूचक अव्यय भी जाँचें: ह्यः बीता कल, श्वः आने वाला कल और अद्य आज है।

3. सकर्मक और अकर्मक क्रिया

सकर्मक क्रिया में कर्म की अपेक्षा होती है: बालकः पुस्तकं पठति। क्या पढ़ता है? पुस्तक। अकर्मक क्रिया में वैसा कर्म नहीं होता: बालकः हसति। हँसने के लिए उसी प्रकार का कर्म नहीं चाहिए।

गन्तव्य बताने वाली द्वितीया को हर बार साधारण क्रिया-कर्म न मानें। “सः ग्रामं गच्छति” में ग्रामं गन्तव्य है। वाच्य का विद्यालयी अभ्यास करते समय क्रिया की प्रकृति और दिए उदाहरण के नियम देखें। पुस्तकं पठति का कर्मवाच्य सीधा है; हसति के लिए वही द्वितीया-प्रथमा परिवर्तन नहीं होगा।

4. कर्तृवाच्य से कर्मवाच्य

कर्तृवाच्य में कर्ता प्रथमा में और क्रिया सामान्यतः कर्ता के पुरुष-वचन के अनुसार होती है। कर्मवाच्य में पहले का कर्म प्रथमा, पहले का कर्ता तृतीया और क्रिया नए प्रथमान्त पद के पुरुष-वचन के अनुसार होती है। लट् कर्मवाच्य के परिचित रूप पठ्यते, लिख्यते, दृश्यते और क्रियते हैं।

कर्तृवाच्य

कर्मवाच्य

नियामक पद

छात्रः पाठं पठति।

छात्रेण पाठः पठ्यते।

पाठः एकवचन

बालिका पुस्तकानि पठति।

बालिकया पुस्तकानि पठ्यन्ते।

पुस्तकानि बहुवचन

अध्यापकः छात्रौ पश्यति।

अध्यापकेन छात्रौ दृश्येते।

छात्रौ द्विवचन

वयं कार्यं कुर्मः।

अस्माभिः कार्यं क्रियते।

कार्यम् एकवचन

त्वं मां पश्यसि।

त्वया अहं दृश्ये।

अहम् उत्तम पुरुष एकवचन

अन्तिम उदाहरण का कारण: दृश्ये को केवल तृतीया कर्ता त्वया देखकर मध्यम पुरुष न बनाएँ। कर्मवाच्य में प्रथमान्त अहम् नियामक है। इसी प्रकार “मया त्वं दृश्यसे” में त्वम् मध्यम पुरुष है, इसलिए दृश्यसे।

5. भाववाच्य

भाववाच्य में क्रिया का भाव प्रधान होता है। अकर्मक क्रिया के साथ कर्ता तृतीया में और क्रिया प्रथम पुरुष एकवचन में रहती है। यहाँ किसी कर्म को प्रथमा में लाने का प्रश्न नहीं है।

कर्तृवाच्य

भाववाच्य

बालकः हसति।

बालकेन हस्यते।

बालकाः धावन्ति।

बालकैः धाव्यते।

वयं नृत्यामः।

अस्माभिः नृत्यते।

सः तिष्ठति।

तेन स्थीयते।

“बालकैः धाव्यन्ते” में बहुवचन तृतीया देखकर क्रिया बहुवचन कर दी गई है; यह भाववाच्य का नियम तोड़ता है। बालकैः धाव्यते शुद्ध है। कर्मवाच्य और भाववाच्य दोनों में कर्ता तृतीया हो सकता है, पर क्रिया का नियामक समान नहीं है।

6. पूर्ण भूतकार्य के लिए क्त और क्तवतु

क्तवतु से बना रूप कार्य कर चुके कर्ता का लिङ्ग-वचन लेता है। क्त का प्रयोग सकर्मक क्रिया में प्रायः कर्म के अनुसार होता है; अकर्मक गतः जैसे रूप कर्ता से मिल सकते हैं।

आशय

उदाहरण

सामञ्जस्य

बालक ने पढ़ा

बालकः पाठं पठितवान्।

कर्ता पुल्लिङ्ग

बालिका ने पढ़ा

बालिका पाठं पठितवती।

कर्ता स्त्रीलिङ्ग

बालिका द्वारा कथा पढ़ी गई

बालिकया कथा पठिता।

कथा स्त्रीलिङ्ग

बच्चे द्वारा पुस्तक पढ़ी गई

बालकेन पुस्तकं पठितम्।

पुस्तक नपुंसकलिङ्ग

छात्रा गई

छात्रा गता।

अकर्मक गम्, कर्ता स्त्रीलिङ्ग

केवल हर भूतकार्य में पठितवान् लिखना गलत है। कर्ता और कथन की रचना के अनुसार रूप चुनें। “बालिका पठितवान्” को सुधारकर बालिका पठितवती करें।

7. उद्देश्य और पूर्वकार्य

तुमुन् उद्देश्य बताता है: पठितुम् — पढ़ने के लिए। क्त्वा/ल्यप् पहले सम्पन्न कार्य बताता है: पठित्वा — पढ़कर, आगत्य — आकर। सामान्य पूर्वकार्य-प्रयोग में दोनों क्रियाओं का कर्ता एक होता है।

उदाहरण: सीमा पुस्तकं पठितुं पुस्तकालयं गच्छति। वह पढ़ने के उद्देश्य से जा रही है। सीमा पुस्तकं पठित्वा गृहं गच्छति। वह पढ़ चुकी है और फिर घर जा रही है। दोनों में पुस्तक पढ़ना है, पर घटनाक्रम और उद्देश्य अलग हैं।

संस्कृत से हिन्दी में अनुवाद करते समय इस अन्तर को सुरक्षित रखें। पठितुम् को पढ़कर कहना भविष्य के उद्देश्य को सम्पन्न कार्य बना देता है।

8. अव्यय और सम्बन्धसूचक युग्म

अव्यय लिङ्ग-वचन से अपना रूप नहीं बदलते। उनका अर्थ वाक्यों का समय, स्थान, कारण या शर्त जोड़ता है।

अव्यय

अर्थ

उदाहरण

अत्र / तत्र / कुत्र

यहाँ / वहाँ / कहाँ

छात्राः अत्र सन्ति।

अधुना / पुरा

अब / पहले

पुरा अत्र वनम् आसीत्।

शनैः / सहसा

धीरे / अचानक

कच्छपः शनैः चलति।

यदि … तर्हि

यदि … तो

यदि वर्षा भविष्यति तर्हि वयं गृहे स्थास्यामः।

यदा … तदा

जब … तब

यदा घण्टा नदति तदा छात्राः आगच्छन्ति।

यत्र … तत्र

जहाँ … वहाँ

यत्र जलम् अस्ति तत्र जीवनम् अस्ति।

यदा समय का सम्बन्ध है और यत्र स्थान का। “यत्र घण्टा नदति तदा” में आशय यदि समय है तो यदा चाहिए। अव्यय का रूप स्थिर होने का अर्थ यह नहीं कि कोई भी अव्यय किसी भी स्थान पर अर्थपूर्ण होगा।

9. समय-लेखन

घण्टे के लिए वादनम् आता है। सपाद सवा, सार्ध साढ़े और पादोन अगले घण्टे से चौथाई कम बताता है।

समय

संस्कृत

तर्क

4:00

चतुर्वादनम्

पूरा घण्टा

4:15

सपादचतुर्वादनम्

चार और पन्द्रह मिनट

4:30

सार्धचतुर्वादनम्

चार और आधा घण्टा

4:45

पादोनपञ्चवादनम्

पाँच से पन्द्रह मिनट कम

4:10

दशाधिकचतुर्वादनम्

चार से दस मिनट अधिक

4:50

दशोनपञ्चवादनम्

पाँच से दस मिनट कम

वाक्य में समय को अधिकरण रूप दें: अहं पञ्चवादने उत्तिष्ठामि। केवल समय का नाम पूछे तो पञ्चवादनम्, पर “कब उठते हो?” के उत्तर में पञ्चवादने उपयुक्त है। घड़ी देखकर पादोन में पिछला घण्टा लिखना सामान्य त्रुटि है।

10. वचन और वाक्य-संशोधन

मूल: बालकः पुस्तकं पठति। द्विवचन: बालकौ पुस्तकं पठतः। बहुवचन: बालकाः पुस्तकं पठन्ति। यदि निर्देश केवल कर्ता का वचन बदलने का है तो कर्म पुस्तकं अपने आप पुस्तकानि नहीं हो जाता; एक ही पुस्तक कई लोग पढ़ सकते हैं।

अशुद्ध

शुद्ध

कारण

वयं गच्छन्ति।

वयं गच्छामः।

उत्तम पुरुष

बालिकाः पठति।

बालिकाः पठन्ति।

बहुवचन

मित्रस्य सह गच्छामि।

मित्रेण सह गच्छामि।

सह के साथ तृतीया

सुन्दरः पुस्तकं पश्यामि।

सुन्दरं पुस्तकं पश्यामि।

विशेषण नपुंसकलिङ्ग द्वितीया

संशोधन के बाद अर्थ भी जाँचें। “वयं गच्छन्ति” में वयम् को ते कर देना भी रूपगत मेल बना सकता है, पर यदि मूल अर्थ हम है तो क्रिया सुधारना उचित है। प्रश्न में रेखाङ्कित पद या निर्देश देखें।

11. घटनाक्रम और सन्दर्भ

क्रमबद्धता में पहले घटना के कारण और परिणाम पहचानें। छात्रः पुस्तकालयम् अगच्छत्। सः पुस्तकम् अलभत। सः पुस्तकं पठित्वा टिप्पणीरूपेण सारम् अलिखत्। पुस्तक मिलने से पहले उसका सार लिखने का क्रम सामान्य सन्दर्भ में अनुचित होगा।

कथन किससे कहा गया है, यह भी महत्त्वपूर्ण है। मित्र को “त्वम्” और सम्माननीय प्राप्तकर्ता को “भवान्/भवती” देकर उसी के अनुसार क्रिया रखें। शब्दशः मिलान से आगे बढ़कर विनम्रता और आशय का स्तर भी सुरक्षित रखें।

प्रश्न हल करने की विधि

  1. मूल वाक्य का अर्थ और अपेक्षित परिवर्तन लिखें।

  2. कर्ता, कर्म, अन्य कारक, काल और भाव पहचानें।

  3. वाच्य बदलने पर विभक्ति और क्रिया का नियामक अलग जाँचें।

  4. समय, अव्यय और कृदन्त के रूप मिलाएँ।

  5. उत्तर को वापस हिन्दी में समझकर देखें कि मूल अर्थ बचा है।

सम्बन्ध

  • शब्दरूप विभक्ति बदलने में शुद्ध आधार देते हैं।

  • धातुरूप काल, पुरुष और वचन चुनने में सहायता करते हैं।

  • रचनात्मक लेखन अनुवाद-कौशल को पूरे पत्र और अनुच्छेद में लागू करता है।

सामान्य त्रुटियाँ

  • कर्मवाच्य में क्रिया को तृतीया कर्ता से न मिलाएँ; प्रथमान्त पद देखें।

  • भाववाच्य में बहुवचन तृतीया के कारण क्रिया बहुवचन नहीं होती।

  • तुमुन् और क्त्वा बदलने से उद्देश्य और पूर्वकार्य का अर्थ बदलता है।

  • पादोन के साथ अगले घण्टे का नाम चाहिए; 4:45 पादोनपञ्चवादनम् है।

पुनरावृत्ति सूची

  • मैं कारक और काल के अनुसार अनुवाद कर सकता/सकती हूँ।

  • मैं तीनों वाच्यों का अन्तर समझा सकता/सकती हूँ।

  • मैं कृदन्त में लिङ्ग-वचन मिला सकता/सकती हूँ।

  • मैं समय और अव्यय का सही प्रयोग कर सकता/सकती हूँ।

  • मैं मूल अर्थ बनाए रखते हुए वाक्य सुधार सकता/सकती हूँ।

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