परिचय
पास-पास आने वाली ध्वनियों के मेल से होने वाला नियमानुसार परिवर्तन सन्धि कहलाता है। यह ध्वनि का विषय है; केवल दो शब्दों को जोड़कर लिख देना सन्धि का पूरा अर्थ नहीं है। “विद्या + आलयः” में दो आ मिलकर एक दीर्घ आ देते हैं, जबकि “तत् + अपि” में त् बदलकर द् हो जाता है।
पाठ पढ़ते समय सन्धि से जुड़े पद पहचानना अनिवार्य है। सही विच्छेद से शब्दार्थ, विभक्ति और वाक्य का सम्बन्ध खुलता है। इस अध्याय में नियम के साथ उसकी शर्त दी गई है, ताकि केवल परिचित संयुक्त रूप याद करने के स्थान पर नए उदाहरण भी हल किए जा सकें।
अधिगम उद्देश्य
पहचानें स्वर, व्यञ्जन और विसर्ग-सन्धि की ध्वनि-सीमा।
लागू करें दीर्घ, गुण, वृद्धि, यण् और अयादि के नियम।
समझाएँ प्रमुख व्यञ्जन-सन्धियों के परिवर्तन।
बनाएँ विसर्ग के बाद वर्णानुसार सही रूप।
करें संयुक्त पद का व्याकरणसम्मत विच्छेद।
जाँचें कि प्रस्तावित विच्छेद मूल शब्द और अर्थ लौटाता है।
मुख्य अवधारणाएँ
1. नियम चुनने से पहले सीमा पहचानना
पहले पूर्वपद का अन्तिम और उत्तरपद का पहला वर्ण लिखें। “महा + ऋषिः” में सीमा आ + ऋ है; शब्द की बाकी ध्वनियों को अनावश्यक न बदलें। “उत् + चारणम्” में त् + च है, इसलिए स्वरसन्धि नहीं लगेगी।
सन्धि और समास अलग प्रक्रियाएँ हैं। सन्धि ध्वनियों का परिवर्तन है; समास पदों के अर्थगत सम्बन्ध से संक्षिप्त शब्द बनाता है। समास में सन्धि हो सकती है, पर हर सन्धि समास नहीं है। “तत् + अपि = तदपि” वाक्य में दो पदों का मेल भी हो सकता है।
2. दीर्घ सन्धि
सूत्र: अकः सवर्णे दीर्घः। समान वर्ग के स्वर मिलें तो उनका दीर्घ स्वर होता है। अ और आ परस्पर सवर्ण हैं; इसी तरह इ–ई और उ–ऊ हैं।
सीमा | परिवर्तन | उदाहरण |
|---|---|---|
अ/आ + अ/आ | आ | विद्या + आलयः = विद्यालयः |
इ/ई + इ/ई | ई | गिरि + ईशः = गिरीशः |
उ/ऊ + उ/ऊ | ऊ | सु + उक्तिः = सूक्तिः |
ऋ/ॠ + ऋ/ॠ | ॠ | नियम की पहचान में ऋ-वर्ग का दीर्घ ॠ |
“देव + इन्द्रः” में अ और इ समान वर्ग के नहीं हैं, इसलिए दीर्घ सन्धि नहीं लगेगी। नियम के नाम से पहले दोनों स्वरों की पहचान करें। “विद्यालयः” का विच्छेद “विद्या + लयः” करने पर उत्तरपद बदल जाएगा; मूल शब्द आलयः है।
3. गुण सन्धि
सूत्र: आद्गुणः। अ या आ के बाद इ/ई, उ/ऊ अथवा ऋ आने पर क्रमशः ए, ओ और अर् होते हैं।
सीमा | परिणाम | उदाहरण |
|---|---|---|
अ/आ + इ/ई | ए | देव + इन्द्रः = देवेन्द्रः |
अ/आ + उ/ऊ | ओ | महा + उत्सवः = महोत्सवः |
अ/आ + ऋ | अर् | महा + ऋषिः = महर्षिः |
समाधान: महा + उत्सवः में सीमा आ + उ है। गुण से ओ बनेगा और बाकी वर्ण यथास्थान रहेंगे: महोत्सवः। “महौत्सवः” लिखना वृद्धि और गुण का भ्रम है। महर्षिः में अर् का र् आगे के ष् से मिलता है, इसलिए संयुक्त लेखन पर ध्यान दें।
4. वृद्धि सन्धि
सूत्र: वृद्धिरेचि। अ या आ के बाद ए/ऐ हो तो ऐ और ओ/औ हो तो औ बनता है।
सीमा | परिणाम | उदाहरण |
|---|---|---|
अ/आ + ए/ऐ | ऐ | सदा + एव = सदैव |
अ/आ + ओ/औ | औ | महा + औषधिः = महौषधिः |
गुण से तुलना: आ + उ = ओ, पर आ + औ = औ। एक ही पूर्वपद महा होने से नियम निश्चित नहीं होता; उत्तरपद का पहला स्वर भी आवश्यक है। “सदैव” में एव का ए दीर्घ है, लेकिन केवल दीर्घ होने से दीर्घ-सन्धि नहीं बनती; यहाँ वृद्धि लागू होती है।
5. यण् सन्धि
सूत्र: इको यणचि। इ/ई, उ/ऊ, ऋ/ॠ और ऌ के बाद असवर्ण स्वर आने पर क्रमशः य्, व्, र् और ल् का आदेश होता है। समान स्वर होने पर पहले सवर्णदीर्घ का विचार करें।
सीमा | परिणाम | उदाहरण |
|---|---|---|
इ/ई + असवर्ण स्वर | य् | इति + आदि = इत्यादि |
उ/ऊ + असवर्ण स्वर | व् | सु + आगतम् = स्वागतम् |
ऋ + असवर्ण स्वर | र् | पितृ + आदेशः = पित्रादेशः |
यण् में पहला स्वर व्यञ्जन-सदृश अर्धस्वर में बदलता है; अगला स्वर रहता है। “इत्यादि” को “इति + यदि” तोड़ना गलत शब्द बनाता है। “सु + उक्तिः” में दोनों उ हैं, इसलिए सूक्तिः बनेगा, स्वुक्तिः नहीं।
6. अयादि सन्धि
सूत्र: एचोऽयवायावः। ए, ओ, ऐ और औ के बाद स्वर आने पर क्रमशः अय्, अव्, आय् और आव् होते हैं।
पूर्व स्वर | आदेश | परिचित उदाहरण |
|---|---|---|
ए | अय् | ने + अनम् = नयनम् |
ओ | अव् | पो + अनम् = पवनम् |
ऐ | आय् | गै + अकः = गायकः |
औ | आव् | नौ + इकः = नाविकः |
कुछ उदाहरण शब्द-निर्माण की प्रक्रिया के अभ्यास हैं; इन्हें हर बार दो स्वतंत्र शब्दों का वाक्यगत मेल न मानें। पदान्त ए/ओ के बाद अ जैसे विशेष प्रसंगों में अन्य सूत्र लागू हो सकते हैं, जैसे “ते + अपि = तेऽपि”। इसलिए केवल “स्वर के बाद स्वर” देखकर अयादि न लगा दें; दिए व्याकरणिक प्रसंग की शर्त देखें।
7. जश्त्व और घोष परिवर्तन
सूत्र-संकेत: झलां जशोऽन्ते। पदान्त वर्गीय कठोर व्यञ्जन का घोष रूप हो सकता है। विद्यालयी अभ्यास में क्→ग्, च्→ज्, ट्→ड्, त्→द् और प्→ब् जैसे सम्बन्ध देखें। आगे का वर्ण और अन्तिम लेखन भी जाँचें।
मेल | संयुक्त रूप | परिवर्तन |
|---|---|---|
तत् + अपि | तदपि | त् → द् |
वाक् + ईशः | वागीशः | क् → ग् |
जगत् + ईशः | जगदीशः | त् → द् |
एक से अधिक नियम भी क्रमशः लग सकते हैं। “सत् + जनः = सज्जनः” में केवल त् का द् लिखकर रुकना पर्याप्त नहीं; अगले तालव्य वर्ण के प्रभाव से अन्तिम संयुक्त रूप बनता है। अन्तिम स्वीकृत रूप तक प्रक्रिया समझें।
8. श्चुत्व, ष्टुत्व और तुक्
स्तोः श्चुना श्चुः का संकेत दन्त्य स्/तवर्ग का श्/चवर्ग के प्रभाव से तालव्य होना है। ष्टुना ष्टुः के प्रसंग में मूर्धन्य प्रभाव समझते हैं।
सन्धि | उदाहरण | मुख्य परिवर्तन |
|---|---|---|
श्चुत्व | सत् + चरित्रम् = सच्चरित्रम् | त् का च् |
श्चुत्व | उत् + चारणम् = उच्चारणम् | त् का च् |
ष्टुत्व | तत् + टीका = तट्टीका | दन्त्य त् का मूर्धन्य ट् |
तुक्-आगम | अनु + छेदः = अनुच्छेदः | छ के पहले त् का आगम और आगे परिवर्तन |
तुक्-आगम | परि + छेदः = परिच्छेदः | च्छ संयुक्त रूप |
तुक् में नया वर्ण जुड़ता है; यह केवल मौजूद वर्ण के बदलने से अलग प्रक्रिया है। “अनुच्छेदः” में छ को एक अकेला छ लिख देना संयुक्ताक्षर को अधूरा करता है। सूत्र की शर्त और परिणाम दोनों याद रखें।
9. अनुस्वार और परसवर्ण
मोऽनुस्वारः के अनुसार पदान्त म् के बाद व्यञ्जन आने पर अनुस्वार होता है: अहम् + गच्छामि = अहं गच्छामि। आगे स्वर होने पर यह नियम उसी प्रकार नहीं लगता: “अहम् अपि” में म् रहता है।
परसवर्ण में अनुस्वार आगे के वर्गीय व्यञ्जन के अनुनासिक के रूप में लिखा या पढ़ा जा सकता है। सम् + कल्पः से संकल्पः/सङ्कल्पः जैसे लेखन में कवर्ग का ङ् सम्बन्ध समझें। सन्धि-विच्छेद में मूल उपसर्ग सम् वापस आएगा, केवल अनुस्वार को नया स्वतंत्र पद न बना दें।
10. विसर्ग-सन्धि
विसर्ग का परिणाम उसके पहले के स्वर और बाद के वर्ण दोनों पर निर्भर करता है। केवल ः देखकर ओ जोड़ देना गलत है।
प्रसंग | उदाहरण | नियम का सार |
|---|---|---|
अः के बाद अ | रामः + अस्ति = रामोऽस्ति | ओ और अवग्रह |
अः के बाद घोष व्यञ्जन | रामः + गच्छति = रामो गच्छति | अः का ओ |
अः के बाद अ से भिन्न स्वर | रामः + इति = राम इति | विसर्ग लोप, स्वर अलग रहते हैं |
आः के बाद स्वर | बालाः + आगच्छन्ति = बाला आगच्छन्ति | विसर्ग लोप |
इ/उ आदि के बाद विसर्ग, आगे उपयुक्त स्वर | हरिः + आगच्छति = हरिरागच्छति | विसर्ग का र् |
उः के बाद ए | गुरुः + एव = गुरुरेव | विसर्ग का र् |
विसर्ग के बाद च | निः + चिन्तः = निश्चिन्तः | तालव्य प्रभाव |
रामोऽस्ति में अवग्रह लुप्त अ का संकेत है। “रामोस्ति” या “रामःअस्ति” वही शुद्ध सन्धिरूप नहीं। “हरिरागच्छति” में र् को मूल हरि का स्थायी अन्त न मानें; विच्छेद हरिः + आगच्छति होगा।
11. विच्छेद की स्वतन्त्र जाँच
पहले सम्भावित मूल पद लिखें, फिर उन्हीं पदों को दोबारा जोड़कर देखें। यदि दोनों दिशाओं में नियम ठीक बैठता है और अर्थ सही है, प्रस्ताव मजबूत है। संयुक्त रूप से हमेशा केवल एक ही विच्छेद निश्चित नहीं होता; वाक्य-प्रसंग आवश्यक हो सकता है।
समेकित उदाहरण: “गुरुरेव सदैव सत्यं वदति।” गुरुरेव = गुरुः + एव, सदैव = सदा + एव। पहले में विसर्ग का र् और दूसरे में वृद्धि से ऐ है। दोनों में उत्तरपद एव है, फिर भी पूर्व ध्वनि के कारण नियम अलग है। यही तुलना परीक्षा में कारण सहित उत्तर देने का अभ्यास कराती है।
प्रश्न हल करने की विधि
शब्द-सीमा पर दोनों मूल ध्वनियाँ लिखें।
स्वर, व्यञ्जन या विसर्ग का वर्ग पहचानें।
सूत्र की शर्त जाँचकर परिवर्तन करें।
आवश्यक हो तो अगला नियम भी लागू करें।
बने शब्द का अर्थ और उल्टा विच्छेद जाँचें।
सम्बन्ध
उच्चारणस्थान व्यञ्जन-सन्धि में दन्त्य, तालव्य और मूर्धन्य प्रभाव समझाता है।
पदच्छेद श्लोक का अन्वय और अर्थ खोलता है।
उपसर्ग और प्रत्यय शब्द-निर्माण में सन्धि का प्रयोग कराते हैं।
सामान्य त्रुटियाँ
आ + उ में औ न लिखें; गुण से ओ होता है।
समान स्वरों के मेल में यण् न लगाएँ; सवर्णदीर्घ देखें।
प्रत्येक विसर्ग का ओ नहीं होता; पहले का स्वर और आगे का वर्ण देखें।
मूल शब्द बदले बिना विच्छेद करें; केवल मिलता-जुलता अर्थ पर्याप्त नहीं।
पुनरावृत्ति सूची
मैं पाँच प्रमुख स्वरसन्धियाँ उदाहरण सहित बता सकता/सकती हूँ।
मैं व्यञ्जन-सन्धि का उच्चारणगत कारण समझा सकता/सकती हूँ।
मैं विसर्ग के अलग परिणाम पहचान सकता/सकती हूँ।
मैं अवग्रह और अनुस्वार का काम समझा सकता/सकती हूँ।
मैं विच्छेद को दोबारा जोड़कर जाँच सकता/सकती हूँ।