Skip to content
8 MIN LESSON · SANSKRIT

Class 11 Sanskrit: Reading and Pronunciation: Complete Concepts and Practice

संस्कृत — वर्णमाला, उच्चारणस्थान, ह्रस्व-दीर्घ स्वर, संयुक्ताक्षर, अनुस्वार-विसर्ग, पदच्छेद, अन्वय, गद्य-पद्यबोध, प्रश्ननिर्माण और सन्दर्भ सहित मौलिक अभ्यास।

परिचय

संस्कृत पढ़ने में केवल अक्षर पहचानना पर्याप्त नहीं है। शुद्ध पठन में ध्वनि, मात्रा, शब्द की सीमा और वाक्य के अर्थ का ध्यान रखना पड़ता है। “दिनम्” और “दीनम्” में स्वर की मात्रा बदलने से अर्थ बदल जाता है। इसी प्रकार संयुक्त पद को गलत जगह तोड़ने से श्लोक का आशय बदल सकता है।

किसी नीतिश्लोक को समझने के लिए पहले उसे सही पढ़ें, फिर पद अलग करें, विभक्ति और क्रिया पहचानें तथा सामान्य वाक्यक्रम बनाएँ। इस अध्याय में उच्चारण से अर्थ तक की यही क्रमबद्ध प्रक्रिया है। इससे अपठित गद्यांश, श्लोक का अन्वय, शब्दार्थ और प्रश्नोत्तर एक-दूसरे से जुड़े अभ्यास बन जाते हैं।

अधिगम उद्देश्य

  • पहचानें स्वर, व्यञ्जन, मात्रा और उच्चारणस्थान।

  • पढ़ें संयुक्ताक्षर, अनुस्वार और विसर्ग को ध्यानपूर्वक।

  • करें सन्धियुक्त पदों का अर्थसम्मत पदच्छेद।

  • बनाएँ कर्ता, क्रिया और विभक्ति से श्लोक का अन्वय।

  • दें अपठित गद्य और पद्य के प्रश्नों के प्रमाणित उत्तर।

  • बनाएँ विभक्ति और आशय के अनुकूल प्रश्न।

मुख्य अवधारणाएँ

1. स्वर और मात्रा

स्वर अपने उच्चारण में किसी अन्य वर्ण पर आश्रित नहीं होते। अ, इ, उ और ऋ ह्रस्व स्वर हैं; आ, ई, ऊ और ॠ उनके दीर्घ रूप हैं। ए, ऐ, ओ और औ सामान्य संस्कृत पठन में दीर्घ माने जाते हैं। ह्रस्व और दीर्घ का भेद स्पष्ट रखें; केवल बोलने की गति बढ़ाकर दीर्घ को ह्रस्व न बना दें।

युग्म

अन्तर

अभ्यास का उद्देश्य

दिनम् / दीनम्

इ और ई

मात्रा अर्थ बदल सकती है

बलम् / बालम्

अ और आ

छोटे और बड़े स्वर को अलग सुनना

सुतः / सूतः

उ और ऊ

लिखित मात्रा के अनुसार पढ़ना

ऋषिः

ऋ स्वर

ऋ को केवल रि लिखकर न बदलना

व्यञ्जन के साथ स्वर मात्रा से लिखा जाता है: क, का, कि, की, कु, कू, कृ, के, कै, को, कौ। “क” में अ का अन्तर्निहित स्वर है; क् में हलन्त के कारण वह स्वर नहीं है। “तत्” को “ततः” पढ़ना एक अलग पद बना देता है।

2. व्यञ्जनवर्ग और उच्चारणस्थान

स्पर्श व्यञ्जनों के पाँच वर्ग उच्चारणस्थान के अनुसार व्यवस्थित हैं। हर वर्ग में पहले और तीसरे वर्ण अल्पप्राण, दूसरे और चौथे महाप्राण तथा पाँचवाँ अनुनासिक होता है। अल्पप्राण–महाप्राण का भेद निकलने वाली वायु से जुड़ा है; क और ख को समान न पढ़ें।

वर्ग

वर्ण

मुख्य स्थान

कवर्ग

क ख ग घ ङ

कण्ठ

चवर्ग

च छ ज झ ञ

तालु

टवर्ग

ट ठ ड ढ ण

मूर्धा

तवर्ग

त थ द ध न

दन्त

पवर्ग

प फ ब भ म

ओष्ठ

य, र, ल, व अन्तःस्थ और श, ष, स, ह ऊष्म व्यञ्जन कहलाते हैं। श और ष के साथ दन्त्य स का अन्तर पहचानना शुद्ध वर्तनी में भी सहायक है। ट–त और ण–न का भेद केवल सजावट नहीं; “पाणिः” का अर्थ हाथ है, इसलिए वर्ण बदलने से पद का अर्थ बिगड़ सकता है।

3. संयुक्ताक्षर, अनुस्वार और विसर्ग

संयुक्ताक्षर में बीच का स्वर हटाकर व्यञ्जन जुड़ते हैं। क्ष = क् + ष, त्र = त् + र और ज्ञ = ज् + ञ। शास्त्रीय संस्कृत वर्णरचना में ये संयुक्त हैं; अलग सरल स्वर नहीं। “मित्रम्” को “मितरम्” कहने से अनावश्यक स्वर जुड़ जाता है।

अनुस्वार का चिह्न ं है। वर्गीय व्यञ्जन के पहले उसका उच्चारण सम्बन्धित वर्ग के अनुनासिक से जुड़ सकता है: अङ्क में ङ्, सञ्चय में ञ्, सन्त में न् और सम्बन्ध में म् का ध्यान रखें। केवल हर स्थान पर एक ही अस्पष्ट ध्वनि से पढ़ना उचित नहीं।

विसर्ग ः है। इसका उच्चारण और सन्धि आगे आने वाली ध्वनि से प्रभावित हो सकते हैं। रामः और रामम् अलग रूप हैं; विसर्ग को अनुस्वार समझना विभक्ति भी बदल देता है। पूर्ण विराम या दण्ड पर अर्थ के अनुसार रुकें, लेकिन प्रत्येक शब्द पर अनावश्यक ठहराव करके वाक्य को न तोड़ें।

4. लघु, गुरु और पठन की लय

लघु और गुरु अक्षर पद्य की लय समझने में सहायक हैं। सामान्यतः ह्रस्व स्वर वाला खुला अक्षर लघु होता है; दीर्घ स्वर, अनुस्वार या विसर्ग से युक्त अक्षर गुरु होता है। संयुक्त व्यञ्जन के पहले का ह्रस्व अक्षर भी सामान्य छन्द-नियमों में गुरु हो सकता है। विशेष छन्द में अपवाद और स्थानानुसार नियम होते हैं।

इसका उद्देश्य लय को समझना है, हर गद्यवाक्य को कृत्रिम गान में बदलना नहीं। श्लोक पढ़ते समय चरण की लय बनाएँ और अर्थ की सीमा समझें। केवल चरण समाप्त होने पर ऐसा विराम न दें जिससे सम्बद्ध कर्ता और क्रिया का अर्थ भटक जाए।

5. पदच्छेद: पदों को अलग करना

पदच्छेद में सन्धि से जुड़े पदों का मूल रूप पहचानते हैं। यह मनमाने ढंग से अक्षर काटना नहीं है। सन्धि का नियम और वाक्य का अर्थ दोनों जाँचें।

संयुक्त रूप

पदच्छेद

संकेत

तदेव

तत् + एव

त् का द् होना

विद्यालयः

विद्या + आलयः

आ + आ = आ

नास्ति

न + अस्ति

अ + अ = आ

गुरुरेव

गुरुः + एव

उ के बाद विसर्ग का र्

सोऽपि

सः + अपि

विसर्ग-सन्धि और अवग्रह

अवग्रह ऽ लुप्त अ का संकेत है; इसे अलग से उच्चरित अ या विसर्ग न समझें। पदच्छेद के बाद बने पद वाक्य में काम करने चाहिए। “तदेव” का “तदा + एव” करना अर्थ और ध्वनि दोनों बदल देगा।

6. अन्वय बनाने की विधि

अन्वय पद्य के पदों को व्याकरणसम्मत अर्थक्रम में रखता है। पहले मुख्य क्रिया खोजें, फिर उसका कर्ता, कर्म और दूसरे कारक। विशेषण को उसके विशेष्य के साथ रखें। संस्कृत में पदक्रम लचीला है, पर विभक्ति का कार्य मनमाना नहीं है।

प्रसिद्ध सुभाषित:

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।

उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥

पदच्छेद: अयम्, निजः, परः, वा, इति, गणना, लघुचेतसाम्; उदारचरितानाम्, तु, वसुधा, एव, कुटुम्बकम्।

अन्वय: अयं निजः परः वा इति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधा एव कुटुम्बकम्।

शब्दार्थ: निजः — अपना; परः — दूसरा; लघुचेतसाम् — संकीर्ण सोच वालों की; वसुधा — पृथ्वी; कुटुम्बकम् — परिवार।

सरलार्थ: यह अपना है या दूसरा, ऐसा संकीर्ण विभाजन छोटी सोच का लक्षण है। उदार आचरण वाले लोगों के लिए पृथ्वी ही परिवार है। यह सहानुभूति और व्यापक अपनत्व का विचार है; इसका अर्थ व्यक्तिगत उत्तरदायित्व छोड़ना नहीं।

7. मौलिक अपठित गद्यांश और समाधान

प्रातःकाले ग्रामस्य पुस्तकालयः उद्घाटितः भवति। तत्र केचन छात्राः समाचारपत्राणि पठन्ति। एका वृद्धा बालकेभ्यः कथाः कथयति। पुस्तकालयाध्यक्षः पुस्तकानि क्रमशः स्थापयति। रविः प्रतिदिनं तत्र गच्छति, किन्तु सः केवलं पुस्तकानि न पठति। सः कनिष्ठान् छात्रान् कठिनशब्दानाम् अर्थम् अपि बोधयति। ग्रामवासिनः मन्यन्ते यत् पुस्तकालयः सर्वेषां सहयोगेन वर्धते।

एकपदेन: पुस्तकालयः कदा उद्घाटितः भवति? — प्रातःकाले। “ग्रामस्य” स्थान-सम्बन्ध बताता है, समय नहीं।

पूर्णवाक्येन: वृद्धा किं करोति? — वृद्धा बालकेभ्यः कथाः कथयति। प्रश्न का कर्ता स्त्रीलिङ्ग है; उत्तर में उचित रूप रखें।

कारण: पुस्तकालयः कथं वर्धते? — पुस्तकालयः सर्वेषां सहयोगेन वर्धते। सहयोगेन साधन या रीति बताने वाला तृतीया रूप है।

शीर्षक: सहयोगेन पुस्तकालयस्य विकासः। यह पूरे अंश का मुख्य विचार देता है; केवल रवि या समाचारपत्र उसका सम्पूर्ण विषय नहीं है।

व्याकरण: “कठिनशब्दानाम्” षष्ठी बहुवचन है; “बोधयति” प्रथम पुरुष एकवचन क्रिया है। उत्तर पाठ में दिए रूप से लें, अनुमान से नया प्रसंग न जोड़ें।

8. प्रश्ननिर्माण और उत्तर की विभक्ति

उत्तर-पद

उपयुक्त प्रश्न

कारण

रविः

कः?

पुल्लिङ्ग प्रथमा

वृद्धा

का?

स्त्रीलिङ्ग प्रथमा

पुस्तकानि

कानि?

नपुंसकलिङ्ग बहुवचन

बालकेभ्यः

केभ्यः?

सम्प्रदान बहुवचन

पुस्तकालये

कुत्र?

स्थान

प्रातःकाले

कदा?

समय

सहयोगेन

केन?

साधन तृतीया

उदाहरण: “रविः पुस्तकालये पठति” में रेखाङ्कित पद पुस्तकालये हो तो प्रश्न “रविः कुत्र पठति?” होगा। रविः रेखाङ्कित हो तो “कः पुस्तकालये पठति?” होगा। प्रश्न का लक्ष्य बदलने से प्रश्नवाचक पद बदलता है; हर बार किम् लिखना गलत है।

9. सन्दर्भ, निष्कर्ष और प्रमाण

सन्दर्भ बताता है कि कथन किस परिस्थिति या विषय में है। निष्कर्ष उपलब्ध कथनों से निकलता है। गद्यांश में रवि दूसरों की सहायता करता है, इसलिए उसे सहयोगी कहना उचित है। उसे पुस्तकालय का संस्थापक कहना प्रमाणहीन होगा, क्योंकि पाठ ऐसा नहीं कहता।

उद्धृत श्लोक में “वसुधैव कुटुम्बकम्” का भाव व्यापक अपनत्व है। किसी परीक्षा में लेखक का नाम या प्रसंग माँगा जाए तो निर्धारित पाठ से प्रमाणित जानकारी दें। प्रसिद्ध उक्ति के लिए मन से रचयिता या ऐतिहासिक तिथि न जोड़ें।

प्रश्न हल करने की विधि

  1. अंश को एक बार सामान्य अर्थ के लिए और दूसरी बार विवरण के लिए पढ़ें।

  2. मात्रा, संयुक्ताक्षर और सन्धि देखकर कठिन पद अलग करें।

  3. मुख्य क्रिया, कर्ता और विभक्ति पहचानें।

  4. प्रश्न के अनुसार एक पद या पूरा वाक्य चुनें।

  5. उत्तर का अर्थ, विभक्ति, वचन और पाठ-प्रमाण जाँचें।

सम्बन्ध

  • शब्दरूप और कारक अन्वय में पदों का काम पहचानने में सहायता देते हैं।

  • सन्धि अध्याय संयुक्त पदों का शुद्ध पदच्छेद कराता है।

  • साहित्य-अध्ययन सरलार्थ को भावार्थ और मूल्य-विमर्श तक विकसित करता है।

सामान्य त्रुटियाँ

  • ह्रस्व को दीर्घ पढ़ना अर्थ बदल सकता है; मात्रा स्पष्ट पहचानें।

  • क्ष को स्वर समझना गलत है; यह क् और ष का संयुक्ताक्षर है।

  • पदच्छेद में मूल रूप के स्थान पर मनमाने अक्षर-विभाजन न करें।

  • पाठ के बाहर कल्पित प्रसंग जोड़ने से उत्तर प्रमाणित नहीं रहता; प्रश्न का लक्ष्य पहचानें।

पुनरावृत्ति सूची

  • मैं उच्चारणस्थान और वर्णभेद पहचान सकता/सकती हूँ।

  • मैं संयुक्ताक्षर और विसर्ग सही पढ़ सकता/सकती हूँ।

  • मैं पदच्छेद और अन्वय में अन्तर समझा सकता/सकती हूँ।

  • मैं गद्यांश से प्रमाणित उत्तर दे सकता/सकती हूँ।

  • मैं विभक्ति के अनुसार प्रश्न बना सकता/सकती हूँ।

Practise this topic →

Discussion

Sign in to join the discussion.

Sign in

No comments yet. Be the first to share your thoughts.