परिचय
संस्कृत में शब्द का रूप वाक्य में उसके काम का संकेत देता है। बालकः, बालकम् और बालकेन एक ही प्रातिपदिक के रूप हैं, पर क्रमशः कर्ता, कर्म और साधन जैसे भिन्न सम्बन्ध व्यक्त कर सकते हैं। केवल हिन्दी अनुवाद के पदक्रम से संस्कृत वाक्य समझना इसलिए पर्याप्त नहीं है।
मान लीजिए वाक्य है “शिक्षकः छात्राय पुस्तकं ददाति।” कौन देता है, किसे देता है और क्या देता है — इन प्रश्नों के उत्तर विभक्ति से मिलते हैं। यह अध्याय पूरे शब्दरूपों को उनके व्यावहारिक प्रयोग से जोड़ता है ताकि अन्वय, रिक्तस्थान और वाक्य-संशोधन में रूप का कारण भी स्पष्ट रहे।
अधिगम उद्देश्य
पहचानें प्रातिपदिक, लिङ्ग, वचन और विभक्ति।
बनाएँ प्रमुख स्वरान्त शब्दों के पूरे रूप।
समझाएँ कारक और विभक्ति का सम्बन्ध तथा अन्तर।
प्रयोग करें अस्मद् और युष्मद् के रूपों का।
चुनें विशेष्य के अनुसार विशेषण का रूप।
सुधारें उपपद-विभक्ति और वाक्य-रचना की त्रुटियाँ।
मुख्य अवधारणाएँ
1. प्रातिपदिक, लिङ्ग और वचन
प्रातिपदिक नामपद का आधार है, जैसे राम, लता और फल। विभक्ति-प्रत्यय लगने पर रामः, लताम् और फलानि जैसे पद बनते हैं। पुल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग व्याकरणिक वर्ग हैं; निर्जीव वस्तुओं का भी लिङ्ग होता है। पुस्तक नपुंसकलिङ्ग और नदी स्त्रीलिङ्ग है। हिन्दी के लिङ्ग को सीधे संस्कृत पर लागू न करें।
एकवचन एक, द्विवचन दो और बहुवचन दो से अधिक बताता है। “द्वौ छात्रौ” के लिए द्विवचन क्रिया “पठतः” आएगी। दो व्यक्तियों को बहुवचन मानना संस्कृत के महत्त्वपूर्ण वचन-भेद को मिटा देता है।
2. विभक्ति और कारक
विभक्ति रूप का व्याकरणिक वर्ग है; कारक क्रिया से पद का अर्थगत सम्बन्ध है। दोनों का सामान्य सम्बन्ध उपयोगी है, पर हर विभक्ति को हर वाक्य में केवल एक कारक न मानें। षष्ठी सामान्यतः सम्बन्ध बताती है और पारम्परिक छह कारकों में नहीं गिनी जाती।
विभक्ति | सामान्य उपयोग | उदाहरण |
|---|---|---|
प्रथमा | कर्ता | छात्रः पठति। |
द्वितीया | कर्म, गन्तव्य | छात्रः पुस्तकं पठति; सः नगरं गच्छति। |
तृतीया | करण, साथ आदि | सः लेखन्या लिखति। |
चतुर्थी | सम्प्रदान, किसी को देना | शिक्षकः छात्राय पुस्तकं ददाति। |
पञ्चमी | अपादान, स्रोत या अलगाव | वृक्षात् पत्रं पतति। |
षष्ठी | सम्बन्ध | छात्रस्य पुस्तकम्। |
सप्तमी | अधिकरण, स्थान या समय | कक्षायां छात्राः सन्ति। |
सम्बोधन | पुकारना | हे छात्र! अत्र आगच्छ। |
प्रथमा का सूत्र-संकेत: प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा। कर्मणि द्वितीया, कर्तृकरणयोस्तृतीया, चतुर्थी सम्प्रदाने, अपादाने पञ्चमी, षष्ठी शेषे और सप्तम्यधिकरणे च प्रमुख उपयोग याद कराने वाले सूत्र हैं। वाच्य बदलने पर कर्ता की विभक्ति बदल सकती है; कर्मवाच्य में रामेण पठ्यते इसका उदाहरण है।
3. अकारान्त पुल्लिङ्ग: राम
विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथमा | रामः | रामौ | रामाः |
द्वितीया | रामम् | रामौ | रामान् |
तृतीया | रामेण | रामाभ्याम् | रामैः |
चतुर्थी | रामाय | रामाभ्याम् | रामेभ्यः |
पञ्चमी | रामात् | रामाभ्याम् | रामेभ्यः |
षष्ठी | रामस्य | रामयोः | रामाणाम् |
सप्तमी | रामे | रामयोः | रामेषु |
सम्बोधन | हे राम | हे रामौ | हे रामाः |
इसी प्रकार बालक और छात्र के रूप बनते हैं। छात्रेभ्यः चतुर्थी या पञ्चमी बहुवचन हो सकता है। केवल रूप देखकर दोनों में से एक निश्चित न करें; “छात्रेभ्यः पुस्तकानि ददाति” में देने के प्राप्तकर्ता हैं, इसलिए चतुर्थी है। वाक्य अर्थ निश्चित करता है।
4. आकारान्त स्त्रीलिङ्ग: लता
विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथमा | लता | लते | लताः |
द्वितीया | लताम् | लते | लताः |
तृतीया | लतया | लताभ्याम् | लताभिः |
चतुर्थी | लतायै | लताभ्याम् | लताभ्यः |
पञ्चमी | लतायाः | लताभ्याम् | लताभ्यः |
षष्ठी | लतायाः | लतयोः | लतानाम् |
सप्तमी | लतायाम् | लतयोः | लतासु |
सम्बोधन | हे लते | हे लते | हे लताः |
बालिका और माला इसी सामान्य ढाँचे पर चलते हैं। “बालिकया” साधन या कर्मवाच्य के कर्ता को बता सकता है। “कक्षायाम्” कक्षा का सप्तमी एकवचन है। लतायाः पञ्चमी और षष्ठी दोनों है; स्रोत और सम्बन्ध को प्रसंग से अलग करें।
5. अकारान्त नपुंसकलिङ्ग: फल
विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथमा | फलम् | फले | फलानि |
द्वितीया | फलम् | फले | फलानि |
तृतीया | फलेन | फलाभ्याम् | फलैः |
चतुर्थी | फलाय | फलाभ्याम् | फलेभ्यः |
पञ्चमी | फलात् | फलाभ्याम् | फलेभ्यः |
षष्ठी | फलस्य | फलयोः | फलानाम् |
सप्तमी | फले | फलयोः | फलेषु |
सम्बोधन | हे फल | हे फले | हे फलानि |
नपुंसकलिङ्ग में प्रथमा और द्वितीया के रूप समान होते हैं। इसलिए “फलानि पतन्ति” में फलानि कर्ता है, जबकि “बालकः फलानि खादति” में कर्म है। पुस्तकम्, पुस्तकानि जैसे रूप इसी प्रकार बनते हैं। फलम् के अन्त का म् अकेला देखकर उसे हर बार द्वितीया न कहें।
6. इकारान्त और उकारान्त पुल्लिङ्ग
विभक्ति | हरि एकवचन | हरि द्विवचन | हरि बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथमा | हरिः | हरी | हरयः |
द्वितीया | हरिम् | हरी | हरीन् |
तृतीया | हरिणा | हरिभ्याम् | हरिभिः |
चतुर्थी | हरये | हरिभ्याम् | हरिभ्यः |
पञ्चमी | हरेः | हरिभ्याम् | हरिभ्यः |
षष्ठी | हरेः | हर्योः | हरीणाम् |
सप्तमी | हरौ | हर्योः | हरिषु |
सम्बोधन | हे हरे | हे हरी | हे हरयः |
विभक्ति | गुरु एकवचन | गुरु द्विवचन | गुरु बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथमा | गुरुः | गुरू | गुरवः |
द्वितीया | गुरुम् | गुरू | गुरून् |
तृतीया | गुरुणा | गुरुभ्याम् | गुरुभिः |
चतुर्थी | गुरवे | गुरुभ्याम् | गुरुभ्यः |
पञ्चमी | गुरोः | गुरुभ्याम् | गुरुभ्यः |
षष्ठी | गुरोः | गुर्वोः | गुरूणाम् |
सप्तमी | गुरौ | गुर्वोः | गुरुषु |
सम्बोधन | हे गुरो | हे गुरू | हे गुरवः |
मुनि हरि जैसा और साधु गुरु जैसा सामान्यतः चलता है। अभ्यास: “गुरवे नमः” में नमः के कारण चतुर्थी है। “गुरुणा कथा कथ्यते” में कर्मवाच्य का कर्ता तृतीया में है। दोनों वाक्यों में व्यक्ति वही है पर उसका सम्बन्ध बदल गया है।
7. इकारान्त और ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग
विभक्ति | मति एकवचन | मति द्विवचन | मति बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथमा | मतिः | मती | मतयः |
द्वितीया | मतिम् | मती | मतीः |
तृतीया | मत्या | मतिभ्याम् | मतिभिः |
चतुर्थी | मत्यै / मतये | मतिभ्याम् | मतिभ्यः |
पञ्चमी | मत्याः / मतेः | मतिभ्याम् | मतिभ्यः |
षष्ठी | मत्याः / मतेः | मत्योः | मतीनाम् |
सप्तमी | मत्याम् / मतौ | मत्योः | मतिषु |
सम्बोधन | हे मते | हे मती | हे मतयः |
विभक्ति | नदी एकवचन | नदी द्विवचन | नदी बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथमा | नदी | नद्यौ | नद्यः |
द्वितीया | नदीम् | नद्यौ | नदीः |
तृतीया | नद्या | नदीभ्याम् | नदीभिः |
चतुर्थी | नद्यै | नदीभ्याम् | नदीभ्यः |
पञ्चमी | नद्याः | नदीभ्याम् | नदीभ्यः |
षष्ठी | नद्याः | नद्योः | नदीनाम् |
सप्तमी | नद्याम् | नद्योः | नदीषु |
सम्बोधन | हे नदि | हे नद्यौ | हे नद्यः |
दीर्घ ई वाले नदी और ह्रस्व इ वाले मति को एक ही रूपसारणी से न लिखें। उदाहरण: “नद्यां जलम् अस्ति” में स्थान सप्तमी है; “नद्याः जलम्” में सम्बन्ध षष्ठी है। सारणी में दिए वैकल्पिक रूप जहाँ मान्य हैं, वहाँ किसी एक को केवल कम परिचित होने के कारण अशुद्ध न मानें।
8. अस्मद् और युष्मद्
विभक्ति | अस्मद् एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथमा | अहम् | आवाम् | वयम् |
द्वितीया | माम् / मा | आवाम् / नौ | अस्मान् / नः |
तृतीया | मया | आवाभ्याम् | अस्माभिः |
चतुर्थी | मह्यम् / मे | आवाभ्याम् / नौ | अस्मभ्यम् / नः |
पञ्चमी | मत् | आवाभ्याम् | अस्मत् |
षष्ठी | मम / मे | आवयोः / नौ | अस्माकम् / नः |
सप्तमी | मयि | आवयोः | अस्मासु |
विभक्ति | युष्मद् एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथमा | त्वम् | युवाम् | यूयम् |
द्वितीया | त्वाम् / त्वा | युवाम् / वाम् | युष्मान् / वः |
तृतीया | त्वया | युवाभ्याम् | युष्माभिः |
चतुर्थी | तुभ्यम् / ते | युवाभ्याम् / वाम् | युष्मभ्यम् / वः |
पञ्चमी | त्वत् | युवाभ्याम् | युष्मत् |
षष्ठी | तव / ते | युवयोः / वाम् | युष्माकम् / वः |
सप्तमी | त्वयि | युवयोः | युष्मासु |
मा, मे, ते, नः आदि संक्षिप्त रूपों का स्थान और प्रयोग विशेष नियमों से बँधा होता है; स्वतंत्र अभ्यास में पूर्ण रूप सुरक्षित हैं। “अहं पठामि”, “त्वं पठसि” और “वयं पठामः” में सर्वनाम क्रिया का पुरुष भी निश्चित करता है।
9. उपपद-विभक्ति और विशेषण-सामञ्जस्य
उपपद या प्रयोग | अपेक्षित रूप का उदाहरण | आशय |
|---|---|---|
सह | मित्रेण सह | मित्र के साथ |
नमः | गुरवे नमः | गुरु को नमस्कार |
प्रति | विद्यालयं प्रति | विद्यालय की ओर |
पुरतः | गृहस्य पुरतः | घर के सामने |
निपुणः | कार्ये निपुणः | कार्य में दक्ष |
विशेषण विशेष्य के लिङ्ग, वचन और विभक्ति का अनुसरण करता है। “सुन्दराणि पुस्तकानि” में दोनों नपुंसकलिङ्ग बहुवचन हैं। “सुन्दरैः पुष्पैः” तृतीया बहुवचन है। केवल शब्द का शब्दकोश-रूप लिखने से वाक्य शुद्ध नहीं हो जाता।
समेकित उदाहरण: “वयं मित्राभ्यां सह नद्याः तटे सुन्दराणि पुष्पाणि पश्यामः।” वयम् के कारण पश्यामः, सह के कारण मित्राभ्याम्, सम्बन्ध के लिए नद्याः और कर्म के लिए पुष्पाणि है। एक वाक्य में कई रूपों का कारण अलग-अलग होता है।
प्रश्न हल करने की विधि
शब्द का प्रातिपदिक और लिङ्ग पहचानें।
वचन तथा क्रिया या उपपद से सम्बन्ध निश्चित करें।
उचित सारणी से विभक्ति चुनें।
विशेषण और सर्वनाम का सामञ्जस्य जाँचें।
समान रूपों की विभक्ति पूरे वाक्य के अर्थ से निश्चित करें।
सम्बन्ध
धातुरूप में कर्ता का पुरुष-वचन क्रिया का रूप निश्चित करता है।
अन्वय में विभक्तियाँ पदक्रम बदलने पर भी सम्बन्ध स्पष्ट रखती हैं।
वाच्य-परिवर्तन में कर्ता और कर्म की विभक्ति बदल सकती है।
सामान्य त्रुटियाँ
दो व्यक्तियों के लिए बहुवचन न लिखें; द्विवचन का प्रयोग करें।
नपुंसकलिङ्ग का म् देखकर हर बार कर्म न मानें; प्रथमा भी समान हो सकती है।
सह के साथ सामान्य प्रयोग में तृतीया चाहिए, केवल हिन्दी ‘के’ देखकर षष्ठी नहीं।
विशेषण को अकेले पहचानना पर्याप्त नहीं; उसका रूप विशेष्य से मिलाएँ।
पुनरावृत्ति सूची
मैं प्रमुख शब्दों के तीनों वचनों के रूप बना सकता/सकती हूँ।
मैं कारक और विभक्ति में अन्तर समझा सकता/सकती हूँ।
मैं सर्वनाम का वाक्य में सही प्रयोग कर सकता/सकती हूँ।
मैं उपपद के अनुसार विभक्ति चुन सकता/सकती हूँ।
मैं विशेषण-सामञ्जस्य और समान रूपों का अर्थ जाँच सकता/सकती हूँ।