Skip to content
8 MIN LESSON · SANSKRIT

Class 11 Sanskrit: Compounds and Word Formation: Complete Concepts and Practice

संस्कृत — समास और विग्रह, अव्ययीभाव, तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु, द्वन्द्व, बहुव्रीहि, उपपद, नञ्, उपसर्ग, कृत्-तद्धित प्रत्यय, स्त्रीप्रत्यय और वाक्य में प्रयोग।

परिचय

संस्कृत में नया शब्द बनाते समय अर्थ और व्याकरण दोनों बदल सकते हैं। समास में अर्थसम्बद्ध पद संक्षिप्त होकर एक पद बनते हैं; उपसर्ग धातु के अर्थ को प्रभावित करता है; प्रत्यय आधार से नया पद बनाता है। “राजपुत्रः” को समझने के लिए राजन् और पुत्र का सम्बन्ध जानना पड़ता है, जबकि “गन्तुम्” में गम् के साथ तुमुन् का प्रयोजन समझना पड़ता है।

इन प्रक्रियाओं को पहचानने से कठिन साहित्यिक शब्द सरल हो जाते हैं। परीक्षा में विग्रह, समास का नाम, प्रत्यय-विभाजन, रिक्तस्थान और शुद्ध प्रयोग पूछे जा सकते हैं। इस अध्याय में हर वर्ग के पहचान-संकेत के साथ उदाहरण और अर्थ दिए गए हैं, ताकि केवल बाहरी आकार देखकर निर्णय करने की भूल न हो।

अधिगम उद्देश्य

  • समझाएँ समास, सन्धि, उपसर्ग और प्रत्यय का अन्तर।

  • करें प्रमुख समासों का सही विग्रह।

  • पहचानें अर्थप्रधानता से समास का प्रकार।

  • बनाएँ उपसर्गयुक्त धातु के अर्थपूर्ण उदाहरण।

  • प्रयोग करें प्रमुख कृत्, तद्धित और स्त्रीप्रत्ययों का।

  • जाँचें निर्मित पद का लिङ्ग, वचन और वाक्यगत कार्य।

मुख्य अवधारणाएँ

1. समास का आधार और विग्रह

समास अर्थसम्बद्ध पदों की संक्षिप्त पदरचना है। सामान्यतः भीतर के विभक्ति-प्रत्ययों का लोप होता है और पूरा समस्तपद बाहर की विभक्ति लेता है। समास-विग्रह पदों का अर्थपूर्ण विस्तार है। राजपुत्रः = राज्ञः पुत्रः; यहाँ राजा और पुत्र का सम्बन्ध षष्ठी से व्यक्त है।

सन्धि ध्वनियों का परिवर्तन है। समास बनते समय सन्धि हो सकती है, पर समास का नाम अर्थगत सम्बन्ध से तय होगा। केवल एक संयुक्ताक्षर देखकर समास का प्रकार नहीं पता चलता। “नीलोत्पलम्” में नील + उत्पल के ध्वनि-मेल के साथ विशेषण-विशेष्य सम्बन्ध भी है।

2. अव्ययीभाव समास

अव्ययीभाव में प्रायः पूर्वपद अव्यय होता है और समस्त पद अव्यय की तरह प्रयुक्त होता है। अर्थ में पूर्वपद की प्रधानता रहती है। रूप को वाक्य के सामान्य संज्ञापद की तरह हर विभक्ति में न बदलें।

समस्तपद

विग्रह

आशय

प्रतिदिनम्

दिनं दिनं प्रति

प्रत्येक दिन

यथाशक्ति

शक्तिम् अनतिक्रम्य

शक्ति के अनुसार

यथाविधि

विधिम् अनतिक्रम्य

नियम के अनुसार

उपग्रामम्

ग्रामस्य समीपम्

ग्राम के पास

प्रयोग: सः प्रतिदिनं पठति। वयं यथाशक्ति सहाय्यं कुर्मः। यथाशक्ति का अर्थ शक्ति को न लाँघते हुए है; इसे “बहुत शक्तिशाली व्यक्ति” न समझें। वाक्य में यह कार्य की रीति बताता है।

3. विभक्ति-तत्पुरुष

तत्पुरुष में सामान्यतः उत्तरपद प्रधान होता है। पूर्वपद का उत्तरपद से सम्बन्ध जिस विभक्ति से व्यक्त होता है, उसी आधार पर द्वितीया, तृतीया आदि तत्पुरुष कहते हैं। सम्बन्ध का वास्तविक अर्थ पहचानें।

भेद

समस्तपद

विग्रह

द्वितीया

ग्रामगतः

ग्रामं गतः

तृतीया

धनहीनः

धनेन हीनः

चतुर्थी

यूपदारु

यूपाय दारु

पञ्चमी

चोरभयम्

चोरात् भयम्

षष्ठी

राजपुत्रः

राज्ञः पुत्रः

सप्तमी

वनवासः

वने वासः

कारण सहित पहचान: वनवासः में वास मुख्य बात है और वन उसका स्थान है। स्थान का विग्रह सप्तमी से होता है, इसलिए सप्तमी तत्पुरुष। राजपुत्रः में व्यक्ति पुत्र है; राजा उससे सम्बन्धित है। इसे दोनों का समुच्चय मानकर द्वन्द्व कहना गलत होगा।

4. कर्मधारय

कर्मधारय में समानाधिकरण पद विशेषण-विशेष्य या उपमान-उपमेय के सम्बन्ध में होते हैं। सरल विशेषण-विशेष्य उदाहरण में दोनों एक ही वस्तु की विशेषता और पहचान बताते हैं। इसे तत्पुरुष का विशेष भेद भी माना जाता है।

समस्तपद

विग्रह

पहचान

नीलोत्पलम्

नीलं च तत् उत्पलम्

नीला कमल ही अभिप्रेत वस्तु

महापुरुषः

महान् च असौ पुरुषः

महान व्यक्ति

कृष्णसर्पः

कृष्णः च असौ सर्पः

काला सर्प

यहाँ नील और उत्पल दो अलग वस्तुओं की सूची नहीं है। “नीलोत्पलम्” में उसी कमल का रंग बताया गया है। विग्रह में लिङ्ग और वचन मिलाएँ; नपुंसकलिङ्ग उत्पलम् के साथ नीलम् होना चाहिए, नीलः नहीं।

5. द्विगु

द्विगु में संख्यावाचक पूर्वपद होता है और सामान्य समाहार-उदाहरणों में कई वस्तुओं का समूह अभिप्रेत है। केवल संख्या से शुरू होने वाला हर शब्द बिना अर्थ देखे द्विगु नहीं कहलाता।

समस्तपद

विग्रह

समाहार

त्रिभुवनम्

त्रयाणां भुवनानां समाहारः

तीन लोकों का समूह

पञ्चवटी

पञ्चानां वटानां समाहारः

पाँच वटों का समूह

त्रिफला

त्रयाणां फलानां समाहारः

तीन फलों का समूह

तुलना: दशाननः किसी व्यक्ति के दस मुख होने का विशेषण है; उसमें बाहरी व्यक्ति प्रधान हो तो बहुव्रीहि है। संख्या होना अकेला निर्णायक संकेत नहीं। समाहार या बाहरी विशेष्य का प्रश्न पूछना अधिक विश्वसनीय है।

6. द्वन्द्व

द्वन्द्व में दोनों या अनेक पद प्रधान होते हैं। विग्रह में सामान्यतः च का प्रयोग होता है। इतरेतर द्वन्द्व में अलग पदों का समुच्चय और उनके अनुसार वचन रहता है; समाहार द्वन्द्व में समूह एक इकाई के रूप में आता है।

भेद

उदाहरण

विग्रह

इतरेतर

रामलक्ष्मणौ

रामः च लक्ष्मणः च

इतरेतर

हरिहरौ

हरिः च हरः च

समाहार

पाणिपादम्

पाणी च पादौ च तेषां समाहारः

रामलक्ष्मणौ दो व्यक्तियों को बताता है, इसलिए द्विवचन है। अनेक व्यक्तियों के समुच्चय में बहुवचन हो सकता है। समाहार में पदों की सूची के स्थान पर सामूहिक इकाई प्रधान होती है। केवल च दिखाई देने से हर विग्रह द्वन्द्व न मानें; कर्मधारय के व्याख्यात्मक विग्रह में भी च हो सकता है।

7. बहुव्रीहि

बहुव्रीहि में समस्तपद के भीतर के पदों से अलग कोई बाहरी विशेष्य प्रधान होता है। विग्रह में यस्य, यस्याः, येन आदि से सम्बन्ध खुलता है।

समस्तपद

विग्रह

अभिप्रेत

दशाननः

दश आननानि यस्य सः

दस मुख वाला व्यक्ति

चक्रपाणिः

चक्रं पाणौ यस्य सः

हाथ में चक्र रखने वाला

पीताम्बरः

पीतम् अम्बरं यस्य सः

पीला वस्त्र धारण करने वाला

महत्त्वपूर्ण तुलना: पीताम्बरम् का अर्थ केवल पीला वस्त्र हो तो कर्मधारय हो सकता है। पीताम्बरः किसी वस्त्रधारी व्यक्ति को बताए तो बहुव्रीहि है। अर्थ और वाक्य के विशेष्य से निर्णय करें, केवल पद के परिचित नाम से नहीं।

8. नञ् और उपपद

नञ्-तत्पुरुष में निषेध का अर्थ अ या अन् जैसे रूप से आता है: अज्ञः = न ज्ञः, अनादरः = न आदरः। स्वर से पहले अन् का रूप परिचित है। पर हर अ से शुरू होने वाले शब्द को नञ् न मानें; मूल व्युत्पत्ति भी चाहिए।

उपपद-तत्पुरुष में एक पद के साथ धातु से बना रूप आता है। कुम्भकारः = कुम्भं करोति इति, जलदः = जलं ददाति इति। कुम्भकार बर्तन बनाने वाले को बताता है; यह केवल कुम्भ और कार नाम के दो व्यक्तियों का समुच्चय नहीं है।

9. उपसर्ग और अर्थ-परिवर्तन

सूत्र-संकेत: उपसर्गाः क्रियायोगे। धातु से जुड़कर विशेष अर्थ देने वाले प्र आदि उपसर्ग हैं। प्रमुख सूची में प्र, परा, अप, सम्, अनु, अव, निस्, निर्, दुस्, दुर्, वि, आ, नि, अधि, अपि, अति, सु, उद्, अभि, प्रति, परि और उप आते हैं। रूप सन्धि से बदल सकता है।

निर्माण

रूप

आशय

आ + गम्

आगच्छति

आता है

अनु + गम्

अनुगच्छति

अनुसरण करता है

प्रति + गम्

प्रतिगच्छति

लौटता है

उप + विश्

उपविशति

बैठता है

प्र + नम्

प्रणमति

प्रणाम करता है

एक उपसर्ग का हर धातु के साथ बिल्कुल एक हिन्दी अर्थ नहीं रहता। उपविशति में उप को अलग से पास और विश् को प्रवेश जोड़कर यन्त्रवत् अनुवाद करना स्वाभाविक अर्थ नहीं देगा। पूरे स्थापित प्रयोग को देखें।

10. प्रमुख कृत् प्रत्यय

कृत् प्रत्यय धातु से पद बनाते हैं। उनके नाम में कुछ अनुबन्ध होते हैं जो अन्तिम रूप में दिखाई नहीं देते; तुमुन् का पूरा नाम शब्द के अन्त में यथावत् नहीं जुड़ता।

प्रत्यय

आशय

उदाहरण

क्त

पूर्ण कार्य या भूत सम्बन्ध

लिखितम्, गतः

क्तवतु

कार्य कर चुका कर्ता

पठितवान्, पठितवती

तुमुन्

उद्देश्य या करने के लिए

पठितुम्, गन्तुम्

क्त्वा

पहले कार्य करके

पठित्वा, गत्वा

ल्यप्

उपसर्गयुक्त धातु से पूर्वकार्य

आगत्य, अवलोक्य

शतृ

वर्तमान क्रिया करने वाला, परस्मैपद

पठन्, पठन्ती

शानच्

वर्तमान क्रिया करने वाला, आत्मनेपद

सेवमानः, सेवमाना

तव्यत् / अनीयर्

किए जाने योग्य या अपेक्षित

पठितव्यम्, पठनीयम्

वाक्य: सः पठित्वा लिखति। पहले पढ़ना, फिर लिखना और दोनों का कर्ता वही है। “सः पठितुं गच्छति” उद्देश्य बताता है, पहले पढ़ चुकना नहीं। क्त्वा और तुमुन् का अर्थ बदल देने से घटनाक्रम बदल जाता है।

11. तद्धित, स्त्रीप्रत्यय और शुद्ध प्रयोग

तद्धित प्रत्यय नामपद के आधार से नए नाम या विशेषण बनाते हैं। त्व और तल् भाव बताते हैं: मित्रत्वम्, लघुत्वम् और सरलता। मतुप् सम्बन्धित गुण या वस्तु का होना बताता है: धनवान्, धनवती। हर आधार से रूप बनाते समय ध्वनि और लिङ्ग के नियम देखें।

स्त्रीप्रत्यय स्त्रीलिङ्ग रूप बनाते हैं। परिचित उदाहरण बालकः→बालिका, छात्रः→छात्रा और सुन्दरः→सुन्दरी हैं। एक ही प्रत्यय हर शब्द पर नहीं लगाया जा सकता। “गुरु” से स्त्रीवाचक रूप बनाना केवल मन से ई जोड़ने का अभ्यास नहीं; निर्धारित शब्दरूप और व्युत्पत्ति देखें।

कृदन्त विशेषण का सामञ्जस्य आवश्यक है: बालकः पठितवान्, बालिका पठितवती। अव्यय रूप गत्वा और पठितुम् लिङ्ग-वचन से नहीं बदलते। इसी भेद से वाक्य-संशोधन में उचित रूप चुना जा सकता है।

प्रश्न हल करने की विधि

  1. तय करें कि प्रश्न अर्थगत समास का है या ध्वनि और प्रत्यय का।

  2. समास में प्रधान पद और मूल सम्बन्ध पहचानें।

  3. पूर्ण विग्रह लिखकर लिङ्ग-वचन-विभक्ति मिलाएँ।

  4. प्रत्यय में आधार, आशय और अन्तिम स्थापित रूप चुनें।

  5. वाक्य में पद का अर्थ और सामञ्जस्य जाँचें।

सम्बन्ध

  • सन्धि समस्तपद के ध्वनि-रूप को समझने में सहायता देती है।

  • विभक्ति का ज्ञान तत्पुरुष के विग्रह का आधार है।

  • अनुवाद में कृदन्त, उद्देश्य और पूर्वकार्य का अन्तर अर्थ सुरक्षित रखता है।

सामान्य त्रुटियाँ

  • संख्या देखकर हर समास को द्विगु न कहें; समाहार और बाहरी विशेष्य देखें।

  • पीताम्बर को प्रसंग के बिना एक ही अर्थ न दें; वस्त्र और वस्त्रधारी अलग हैं।

  • तुमुन् को पहले कार्य करके न समझें; वह उद्देश्य का अर्थ देता है।

  • अव्यय कृदन्त को लिङ्ग-वचन से न बदलें; पठित्वा का रूप स्थिर रहता है।

पुनरावृत्ति सूची

  • मैं प्रमुख समासों का अर्थपूर्ण विग्रह कर सकता/सकती हूँ।

  • मैं कर्मधारय, द्विगु और बहुव्रीहि का अन्तर बता सकता/सकती हूँ।

  • मैं उपसर्ग से बदले स्थापित अर्थ पहचान सकता/सकती हूँ।

  • मैं कृत् और तद्धित प्रत्ययों के प्रयोग समझा सकता/सकती हूँ।

  • मैं कृदन्त का सामञ्जस्य और अव्यय रूप जाँच सकता/सकती हूँ।

Practise this topic →

Discussion

Sign in to join the discussion.

Sign in

No comments yet. Be the first to share your thoughts.