परिचय
धातुरूप संस्कृत क्रिया की वह रूप-व्यवस्था है जिससे पुरुष, वचन तथा काल या भाव का बोध होता है। मूल धातु पठ् है, लेकिन वाक्य में पठति, पठामि, अपठत् या पठेत् जैसे रूप आते हैं। इन्हें एक-दूसरे के स्थान पर रखने से कभी कर्ता और कभी पूरा समय या प्रयोजन बदल जाता है।
हिंदी में तुम पढ़ते हो और मैं पढ़ता हूँ का मेल अलग है। संस्कृत में भी त्वं पठसि और अहं पठामि में क्रिया का मेल आवश्यक है। इस अध्याय में पाँच प्रमुख लकारों के अर्थ, पूर्ण रूप-सारणियाँ, प्रमुख असमान क्रियाएँ और वाक्य-परिवर्तन दिए गए हैं। रूपों को अर्थपूर्ण वाक्यों में प्रयोग करने पर याद करना अधिक उपयोगी बनता है।
अधिगम उद्देश्य
पहचानें कि धातु, लकार, पद, पुरुष और वचन का संबंध क्या है।
लिखें कि पठ् और गम् के पाँच प्रमुख लकारों के पूर्ण रूप क्या हैं।
प्रयोग करें कि अस्, भू, कृ और आत्मनेपदी धातुओं के मुख्य रूप कैसे लगते हैं।
चुनें कि कर्ता के पुरुष तथा वचन से कौन-सी क्रिया मेल खाती है।
बदलें कि काल या भाव बदलते समय वाक्य में क्या सुरक्षित रखना है।
सुधारें कि मिलते-जुलते रूपों की अशुद्धि कैसे पहचानी जाती है।
मुख्य अवधारणाएँ
1. पुरुष और वचन की सही पंक्ति
प्रथमपुरुष सः, सा, तत्, संज्ञा तथा भवान्/भवती जैसे कर्ताओं के साथ आता है। मध्यमपुरुष त्वम्, युवाम्, यूयम् और उत्तमपुरुष अहम्, आवाम्, वयम् के साथ है। संस्कृत के इन नामों को अंग्रेजी के क्रम से उलट न दें।
तीन वचन हैं: एकवचन, द्विवचन और बहुवचन। ‘बालकौ पठतः’ में दो पढ़ने वाले हैं। ‘बालकाः पठन्ति’ में तीन या अधिक हैं। संस्कृत की सामान्य समापिका क्रिया में कर्ता का लिंग बदलने से पुरुष-वचन का रूप नहीं बदलता: ‘बालकः पठति’ तथा ‘बालिका पठति’ दोनों में पठति है।
भवान् का अर्थ आदरपूर्वक आप है, लेकिन क्रिया प्रथमपुरुष एकवचन होगी: ‘भवान् गच्छति।’ ‘भवान् गच्छसि’ अर्थ के हिंदी संबोधन से प्रभावित गलत मेल है। भवती के साथ भी प्रथमपुरुष एकवचन लगता है।
2. लकार और उनका प्रयोजन
लकार | मुख्य विद्यालयी अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
लट् | वर्तमान | सः पठति — वह पढ़ता है |
लृट् | सामान्य भविष्य | सः पठिष्यति — वह पढ़ेगा |
लङ् | भूत की घटना | सः अपठत् — उसने पढ़ा |
लोट् | आज्ञा, प्रार्थना, अनुमति या आशीर्वाद | सः पठतु — वह पढ़े |
विधिलिङ् | चाहिए, संभावना या विधान | सः पठेत् — उसे पढ़ना चाहिए |
लकार केवल समय नहीं, भाव भी बताते हैं। पठतु और पठेत् को हर जगह समान अनुवाद देकर बदलना उचित नहीं। प्रश्न में आदेश हो तो लोट्, उचित आचरण का विधान हो तो विधिलिङ् अपेक्षित हो सकता है। संस्कृत में अन्य लकार भी हैं; यहाँ विद्यालयी अभ्यास के इन पाँच पर केंद्रित अध्ययन है।
3. पठ् के पाँच पूर्ण रूप
पठ् परस्मैपदी धातु का नियमित उदाहरण है। पहले पुरुष-पंक्ति और वचन-स्तंभ चुनें, फिर लकार की सारणी देखें। केवल ति या तः देखकर लकार न तय करें; पूरा आधार भी पहचानें।
लट्:
पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथम | पठति | पठतः | पठन्ति |
मध्यम | पठसि | पठथः | पठथ |
उत्तम | पठामि | पठावः | पठामः |
लृट्:
पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथम | पठिष्यति | पठिष्यतः | पठिष्यन्ति |
मध्यम | पठिष्यसि | पठिष्यथः | पठिष्यथ |
उत्तम | पठिष्यामि | पठिष्यावः | पठिष्यामः |
लङ्:
पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथम | अपठत् | अपठताम् | अपठन् |
मध्यम | अपठः | अपठतम् | अपठत |
उत्तम | अपठम् | अपठाव | अपठाम |
लोट्:
पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथम | पठतु | पठताम् | पठन्तु |
मध्यम | पठ | पठतम् | पठत |
उत्तम | पठानि | पठाव | पठाम |
विधिलिङ्:
पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथम | पठेत् | पठेताम् | पठेयुः |
मध्यम | पठेः | पठेतम् | पठेत |
उत्तम | पठेयम् | पठेव | पठेम |
उदाहरण: ‘आवां पठावः’ वर्तमान है; ‘आवाम् अपठाव’ भूत है। पठाव और पठावः का अंतिम चिह्न अर्थ-पहचान में महत्त्वपूर्ण है। ‘यूयं पठत’ आज्ञा है; ‘यूयं पठथ’ वर्तमान कथन है। लिखित रूपों को सुनने और लिखने दोनों से अलग करें।
4. गम् का परिवर्तित आधार
गम् धातु लट् आदि में गच्छ् आधार लेती है, पर भविष्य में गमिष्य रूप आता है। इसलिए हर लकार में गच्छिष्य लिखना गलत होगा। नियमित प्रत्यय की समझ के साथ धातु का उपयुक्त आधार भी याद रखें।
लट्:
पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथम | गच्छति | गच्छतः | गच्छन्ति |
मध्यम | गच्छसि | गच्छथः | गच्छथ |
उत्तम | गच्छामि | गच्छावः | गच्छामः |
लृट्:
पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथम | गमिष्यति | गमिष्यतः | गमिष्यन्ति |
मध्यम | गमिष्यसि | गमिष्यथः | गमिष्यथ |
उत्तम | गमिष्यामि | गमिष्यावः | गमिष्यामः |
लङ्:
पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथम | अगच्छत् | अगच्छताम् | अगच्छन् |
मध्यम | अगच्छः | अगच्छतम् | अगच्छत |
उत्तम | अगच्छम् | अगच्छाव | अगच्छाम |
लोट्:
पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथम | गच्छतु | गच्छताम् | गच्छन्तु |
मध्यम | गच्छ | गच्छतम् | गच्छत |
उत्तम | गच्छानि | गच्छाव | गच्छाम |
विधिलिङ्:
पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथम | गच्छेत् | गच्छेताम् | गच्छेयुः |
मध्यम | गच्छेः | गच्छेतम् | गच्छेत |
उत्तम | गच्छेयम् | गच्छेव | गच्छेम |
सुलझा परिवर्तन: ‘ते विद्यालयं गच्छन्ति’ का भविष्य ‘ते विद्यालयं गमिष्यन्ति’ है। कर्ता प्रथमपुरुष बहुवचन और गंतव्य विद्यालयम् सुरक्षित हैं। केवल समय बदलता है। ‘ते’ को ‘त्वम्’ बना देना लकार-परिवर्तन से अधिक अनावश्यक बदलाव होगा।
5. अस्, भू और कृ के वर्तमान पूर्ण रूप
अस् होना या उपस्थित होना बताती है। भू का वर्तमान आधार भव् है। कृ का वर्तमान रूप करोति है, जो पठति के आधार की यांत्रिक नकल नहीं करता। नीचे प्रत्येक की वर्तमान पूर्ण सारणी है।
पुरुष-वचन | अस् | भू | कृ, परस्मैपद |
|---|---|---|---|
प्रथम एकवचन | अस्ति | भवति | करोति |
प्रथम द्विवचन | स्तः | भवतः | कुरुतः |
प्रथम बहुवचन | सन्ति | भवन्ति | कुर्वन्ति |
मध्यम एकवचन | असि | भवसि | करोषि |
मध्यम द्विवचन | स्थः | भवथः | कुरुथः |
मध्यम बहुवचन | स्थ | भवथ | कुरुथ |
उत्तम एकवचन | अस्मि | भवामि | करोमि |
उत्तम द्विवचन | स्वः | भवावः | कुर्वः |
उत्तम बहुवचन | स्मः | भवामः | कुर्मः |
‘वयं छात्राः स्मः’ में स्मः चाहिए, ‘सन्ति’ नहीं। ‘ते कार्यं कुर्वन्ति’ में कर्ता बहुवचन है। कर्म कार्यम् एकवचन होने से कर्तृवाच्य क्रिया एकवचन नहीं हो जाती। कर्ता और कर्म की भूमिका पहले अलग करें।
भू के अन्य मुख्य प्रथमपुरुष एकवचन रूप भविष्य में भविष्यति, भूत में अभवत्, आज्ञा में भवतु और विधि में भवेत् हैं। कृ के उसी क्रम में करिष्यति, अकरोत्, करोतु और कुर्यात् मिलते हैं। इन्हें मुख्य पहचान के रूप में लें; अन्य पुरुषों में परिवर्तन करते समय पूरी निर्धारित धातु-सारणी का अभ्यास आवश्यक है।
6. आत्मनेपद और परस्मैपद
परस्मैपद और आत्मनेपद प्रत्यय-व्यवस्थाएँ हैं। परस्मैपद में पठति और आत्मनेपद में लभते जैसे रूप आते हैं। इनके नामों से यह सरल निष्कर्ष न निकालें कि क्रिया का हर फल सचमुच केवल दूसरे या स्वयं को ही मिलेगा। धातु और प्रयोग के अनुसार रूप-व्यवस्था सीखें।
लभ् का वर्तमान पूर्ण रूप:
पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथम | लभते | लभेते | लभन्ते |
मध्यम | लभसे | लभेथे | लभध्वे |
उत्तम | लभे | लभावहे | लभामहे |
सेव् का वर्तमान पूर्ण रूप:
पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
प्रथम | सेवते | सेवेते | सेवन्ते |
मध्यम | सेवसे | सेवेथे | सेवध्वे |
उत्तम | सेवे | सेवावहे | सेवामहे |
‘वयं ज्ञानं लभामहे’ में लभ् आत्मनेपद का उत्तमपुरुष बहुवचन है। ‘त्वं वृद्धान् सेवसे’ में मध्यमपुरुष एकवचन है। कुछ धातुओं के दोनों पदों में प्रयोग होते हैं, जिन्हें उभयपदी कहते हैं। निर्धारित धातु और वाक्य के अनुरूप पद चुनें।
7. कर्ता-क्रिया मेल और संयुक्त कर्ता
‘रामः च सीता च पठतः’ में दो संज्ञाएँ मिलकर द्विवचन कर्ता हैं। ‘रामः सीता गीता च पठन्ति’ में तीन के कारण बहुवचन है। केवल निकटतम संज्ञा एकवचन है, इसलिए क्रिया एकवचन कर देना गलत होगा।
अलग पुरुषों के संयुक्त कर्ता में उत्तमपुरुष को प्राथमिकता मिलती है। ‘अहं त्वं च पठावः’ में दो व्यक्ति और उत्तमपुरुष द्विवचन है। ‘त्वं सः च पठथः’ में मध्यमपुरुष द्विवचन है। पहले समूह की संख्या और फिर उसमें सम्मिलित पुरुषों का संबंध देखें।
सर्वनाम अनुपस्थित हो तो क्रियारूप से भी कर्ता समझ सकते हैं। ‘पठामि’ में अहम् का बोध है। लेकिन अनुवाद प्रश्न में यदि पूर्ण वाक्य अपेक्षित हो तो कर्ता स्पष्ट रखना उपयोगी है। संधि से अहम् का अहं और त्वम् का त्वं बनना क्रिया के पुरुष को नहीं बदलता।
8. लकार-परिवर्तन और अशुद्धि-संशोधन
सुलझा उदाहरण: ‘त्वं पुस्तकं पठसि’ को भूतकाल में करें। कर्ता मध्यमपुरुष एकवचन, कर्म पुस्तकम्। पठ् की लङ् सारणी से अपठः लें। उत्तर: ‘त्वं पुस्तकम् अपठः।’ यदि ह्यः पहले दिया हो, वह भूत का संकेत है; श्वः भविष्य का और अद्य वर्तमान संदर्भ का सहायक संकेत हो सकता है।
‘युवां गच्छन्ति’ अशुद्ध है क्योंकि युवाम् द्विवचन मध्यमपुरुष है। सुधार: ‘युवां गच्छथः।’ ‘भवती पठसि’ का सुधार ‘भवती पठति’ है। ‘वयं लभन्ते’ का सुधार ‘वयं लभामहे’ है। हर सुधार के साथ संबंधित पुरुष-वचन-पद का कारण बताएँ।
निषेध के लिए न और मा के संदर्भ अलग हो सकते हैं। ‘सः न पठति’ वर्तमान निषेध है। ‘मा पठ’ संबोधित व्यक्ति को निषेधात्मक आदेश है। शब्द जोड़कर भाव न बदलें; प्रश्न के निर्देश के अनुसार लकार और निषेध रखें।
प्रश्न हल करने की विधि
मुख्य धातु और उसका उपयुक्त आधार पहचानें।
कर्ता से पुरुष और वचन निर्धारित करें।
अर्थ या निर्देश से लकार चुनें।
परस्मैपद या आत्मनेपद की सही सारणी देखें।
कर्म, स्थान और निषेध को अनावश्यक रूप से न बदलें।
पूरा वाक्य पढ़कर काल, भाव और अन्विति की पुष्टि करें।
सम्बन्ध
शब्दरूप से कर्ता का वचन और विभक्ति पहचानना सरल होता है।
अनुवाद तथा वाच्य में धातु, काल और नई क्रिया-रचना का ज्ञान आवश्यक है।
साहित्यिक पठन में कविता के बदले क्रम के बावजूद क्रिया अन्वय का केंद्र रहती है।
सामान्य त्रुटियाँ
भवान् को मध्यमपुरुष की क्रिया देना; प्रथमपुरुष एकवचन रखें।
हर धातु पर पठ् का आधार लगाना; गच्छ्, गमिष्य और करोति जैसे रूप पहचानें।
द्विवचन को बहुवचन बनाना; युवाम् और आवाम् की अलग पंक्ति रखें।
आत्मनेपद धातु को परस्मैपदी प्रत्यय देना; पद की उपयुक्त सारणी चुनें।
पुनरावृत्ति सूची
मैं पुरुष और वचन के अनुसार क्रिया चुन सकता/सकती हूँ।
मैं पाँच प्रमुख लकारों का अर्थ स्पष्ट कर सकता/सकती हूँ।
मैं पठ् और गम् के पूर्ण रूप लिख सकता/सकती हूँ।
मैं मुख्य असमान तथा आत्मनेपदी रूप पहचान सकता/सकती हूँ।
मैं संयुक्त कर्ता की अन्विति कर सकता/सकती हूँ।
मैं अर्थ सुरक्षित रखकर लकार-परिवर्तन और संशोधन कर सकता/सकती हूँ।