परिचय
अनुवाद में केवल एक भाषा के शब्द दूसरी भाषा में नहीं रखे जाते। कर्ता, कर्म, समय, निषेध, उद्देश्य और भाव का संबंध सुरक्षित रखना पड़ता है। हिंदी का हर को संस्कृत में द्वितीया और हर से तृतीया नहीं बनता; संस्कृत धातु तथा उपपद की अपनी विभक्ति-व्यवस्था है।
रूपांतरण में कुछ निश्चित पक्ष बदलते हैं और बाकी अर्थ बना रहता है। लकार बदलने पर समय या भाव, वाच्य बदलने पर व्याकरणिक प्रधानता और वचन बदलने पर संख्या बदलती है। इस अध्याय में अनुवाद, कर्ता-क्रिया मेल, वाच्य, समय-लेखन और अशुद्धि-संशोधन का क्रमबद्ध अभ्यास है। उदाहरणों में सरल संस्कृत और हिंदी व्याख्या रखी गई है।
अधिगम उद्देश्य
अलग करें कि अनुवाद में कौन-सी अर्थगत भूमिकाएँ सुरक्षित रखनी हैं।
चुनें कि विभक्ति, पुरुष, वचन और लकार के उचित रूप कौन-से हैं।
बदलें कि कर्तृवाच्य तथा कर्मवाच्य में कर्ता-कर्म की रचना कैसे बदलती है।
पहचानें कि अकर्मक क्रिया का भाववाच्य कैसे अलग है।
लिखें कि संस्कृत में पूरा, सवा, साढ़े और पौने समय कैसे व्यक्त होते हैं।
सुधारें कि मिश्र अन्विति तथा अनावश्यक अर्थ-परिवर्तन की त्रुटि कैसे मिलेगी।
मुख्य अवधारणाएँ
1. अनुवाद की अर्थ-योजना
पहले मुख्य क्रिया खोजें। फिर पूछें: कौन, क्या, किसे, किस साधन से, कहाँ, कहाँ से और कब। उसके बाद संस्कृत धातु, विभक्ति और क्रियारूप चुनें। हिंदी वाक्य ‘बालिका बगीचे में फूल देखती है’ का ढाँचा बालिका कर्ता, फूल कर्म और बगीचे में स्थान है।
अनुवाद: ‘बालिका उद्याने पुष्पाणि पश्यति।’ बालिका प्रथमा एकवचन, उद्याने सप्तमी एकवचन, पुष्पाणि द्वितीया बहुवचन और पश्यति प्रथमपुरुष एकवचन है। कर्म बहुवचन होने पर भी कर्तृवाच्य क्रिया कर्ता के अनुसार एकवचन है। हिंदी शब्दक्रम को थोड़ा बदलने से संस्कृत का अर्थ नहीं बदलना चाहिए।
2. विभक्ति और क्रिया का मेल
हिंदी वाक्य | संस्कृत रूप | प्रमुख कारण |
|---|---|---|
दो विद्यार्थी पढ़ते हैं | छात्रौ पठतः। | द्विवचन कर्ता और क्रिया |
हम पुस्तक पढ़ते हैं | वयं पुस्तकं पठामः। | उत्तमपुरुष बहुवचन |
तुम मित्र के साथ जाते हो | त्वं मित्रेण सह गच्छसि। | सह के साथ तृतीया |
बालक गुरु को नमस्कार करता है | बालकः गुरवे नमः करोति। | नमः के साथ चतुर्थी |
पत्ता पेड़ से गिरता है | पत्रं वृक्षात् पतति। | अलग होने का स्रोत पंचमी |
यह बालिका की पुस्तक है | इदं बालिकायाः पुस्तकम् अस्ति। | संबंध में षष्ठी |
‘मैं लिखता हूँ’ और ‘मैं लिखती हूँ’ दोनों का सामान्य संस्कृत वर्तमान ‘अहं लिखामि’ है। समापिका क्रिया का यह रूप लिंग से नहीं बदलता। लेकिन ‘मैंने पढ़ा’ को कृदन्त से व्यक्त करें तो वक्ता के लिंग के अनुसार ‘अहं पठितवान्’ या ‘अहं पठितवती’ हो सकता है। रूप की श्रेणी पहले पहचानें।
3. काल, भाव और निषेध बचाना
‘वे कल जाएँगे’ में आने वाला कल हो तो ‘ते श्वः गमिष्यन्ति।’ ‘वे कल गए थे’ में बीता कल हो तो ‘ते ह्यः अगच्छन्।’ हिंदी कल अस्पष्ट हो सकता है; क्रिया का समय बताता है कि श्वः चाहिए या ह्यः। बिना संदर्भ दोनों का एक ही रूप न लिखें।
लकार-परिवर्तन में कर्ता और कर्म को स्थिर रखें। ‘त्वं कथां पठसि’ का भविष्य ‘त्वं कथां पठिष्यसि’ और भूत ‘त्वं कथाम् अपठः’ है। पुस्तक को कथा में बदलना या तुम को वह करना अनावश्यक परिवर्तन होगा।
‘मा धाव’ मत दौड़ो है। ‘सः न धावति’ वह नहीं दौड़ता है। पहला निषेधात्मक आदेश और दूसरा नकारात्मक कथन है। ‘सः धावेत्’ उसे दौड़ना चाहिए का विधान हो सकता है। केवल हिंदी के मोटे अर्थ से लोट् और विधिलिङ् न मिलाएँ।
4. कर्तृवाच्य और कर्मवाच्य
कर्तृवाच्य में कर्ता की प्रधानता होती है और समापिका क्रिया उसके पुरुष-वचन से मेल करती है। ‘बालकः पुस्तकं पठति’ में बालकः पढ़ने वाला है। कर्मवाच्य में कर्म प्रथमा में मुख्य व्याकरणिक पद बनता है, मूल कर्ता तृतीया में आता है और क्रिया कर्मवाच्य रूप लेती है।
परिवर्तन: ‘बालकेन पुस्तकं पठ्यते।’ पुस्तकम् नपुंसकलिंग होने से प्रथमा और द्वितीया एक जैसे दिखते हैं। इसलिए लिखावट न बदलने पर भी भूमिका बदल गई है। यदि स्त्रीलिंग उदाहरण लें, ‘बालकः कथां पठति’ से ‘बालकेन कथा पठ्यते’ होगा; यहाँ कथाम् से कथा का परिवर्तन स्पष्ट है।
कर्तृवाच्य | कर्मवाच्य | ध्यान देने योग्य बात |
|---|---|---|
बालकः कथां पठति। | बालकेन कथा पठ्यते। | कर्म प्रथमा एकवचन |
बालकौ कथां पठतः। | बालकाभ्यां कथा पठ्यते। | मूल कर्ता दो, पर कर्म एक |
बालकः कथाः पठति। | बालकेन कथाः पठ्यन्ते। | कर्म बहुवचन से क्रिया बहुवचन |
अहं पुस्तकं पठामि। | मया पुस्तकं पठ्यते। | अहम् का तृतीया मया |
त्वं पुस्तकं पठसि। | त्वया पुस्तकं पठ्यते। | त्वम् का तृतीया त्वया |
कर्मवाच्य में क्रिया को हमेशा एकवचन रखना गलत है। कथाः कई हों तो पठ्यन्ते होगा। मूल कर्ता बहुवचन है, इसलिए पठ्यन्ते होगा कहना भी गलत कारण है। नए प्रथमा पद का वचन देखें।
5. कर्मवाच्य क्रिया और भाववाच्य
लट् कर्मवाच्य में अनेक धातुओं से य-आधार और आत्मनेपद प्रत्यय बनते हैं। पठ् से पठ्यते, कृ से क्रियते, दृश् से दृश्यते तथा लिख् से लिख्यते जैसे स्थापित रूप मिलते हैं। हर धातु में केवल अंत का ति हटाकर यते लगा देना सही नियम नहीं; आधार बदल सकता है।
भाववाच्य में क्रिया का भाव प्रधान होता है, कोई कर्म प्रथमा में नहीं लाया जाता और क्रिया सामान्यतः प्रथमपुरुष एकवचन रहती है। ‘बालकः हसति’ का भाववाच्य ‘बालकेन हस्यते’ है। ‘बालकाः हसन्ति’ का भाववाच्य ‘बालकैः हस्यते’ होगा। कर्ता बहुवचन के कारण हस्यन्ते न करें।
कर्मवाच्य और भाववाच्य में मूल कर्ता तृतीया में होने की समानता है, लेकिन कर्म की उपस्थिति तथा नई क्रिया-अन्विति अलग है। पहले तय करें कि मूल क्रिया सकर्मक है या अकर्मक और वाक्य में वास्तविक कर्म दिया है या नहीं।
6. वचन और प्रश्नवाचक रूपांतरण
‘बालकः पठति’ का द्विवचन ‘बालकौ पठतः’ और बहुवचन ‘बालकाः पठन्ति’ है। संज्ञा के साथ विशेषण हो तो वह भी बदलता है: ‘सुन्दरः बालकः’ से ‘सुन्दरौ बालकौ’। केवल क्रिया बदलना पर्याप्त नहीं।
प्रश्न बनाने में लक्ष्य पद की विभक्ति बनाए रखें। ‘बालकः उद्याने क्रीडति’ में स्थान पूछें: ‘बालकः कुत्र क्रीडति?’ ‘बालिका मित्रेण सह गच्छति’ में साथी पूछें: ‘बालिका केन सह गच्छति?’ ‘सा वृक्षेभ्यः जलं ददाति’ में प्राप्तकर्ता पूछें: ‘सा केभ्यः जलं ददाति?’
कः, का, किम् लिंग और भूमिका के अनुसार बदलते हैं। ‘कः पठति?’ व्यक्ति कर्ता पूछता है; ‘किं पठति?’ पढ़ी जाने वाली वस्तु पूछ सकता है। प्रश्नवाचक शब्द चुनते समय केवल शब्दार्थ नहीं, वाक्य-भूमिका भी देखें।
7. समय-लेखन की मूल संरचना
समय बताने में ‘कति वादनानि?’ जैसे प्रश्न और ‘त्रिवादनम्’ जैसे उत्तर मिलते हैं। किसी घटना का समय बताने में सप्तमी प्रयोग होता है: ‘सभा त्रिवादने आरभते।’ स्वयं समय का नाम और घटना के समय का रूप अलग रखें।
समय | समय का नाम | घटना के साथ प्रयोग |
|---|---|---|
3:00 | त्रिवादनम् | त्रिवादने |
3:15 | सपादत्रिवादनम् | सपादत्रिवादने |
3:30 | सार्धत्रिवादनम् | सार्धत्रिवादने |
3:45 | पादोनचतुर्वादनम् | पादोनचतुर्वादने |
6:15 | सपादषड्वादनम् | सपादषड्वादने |
6:30 | सार्धषड्वादनम् | सार्धषड्वादने |
6:45 | पादोनसप्तवादनम् | पादोनसप्तवादने |
सपाद में एक चौथाई घंटा अधिक, सार्ध में आधा घंटा अधिक और पादोन में आने वाले घंटे से एक चौथाई कम है। इसलिए 3:45 में तीन नहीं, अगला घंटा चार लेते हैं। एक घंटा 60 मिनट, चौथाई 60 ÷ 4 = 15 मिनट और आधा 60 ÷ 2 = 30 मिनट है।
8. समय के सुलझे वाक्य
‘पठन सभा सवा तीन बजे शुरू होती है’ का अनुवाद ‘पठनसभा सपादत्रिवादने आरभते।’ ‘विद्यार्थी साढ़े छह बजे आते हैं’ का ‘छात्राः सार्धषड्वादने आगच्छन्ति।’ क्रिया का वचन समय के शब्द से नहीं, कर्ता से तय है। सभा एकवचन, छात्राः बहुवचन है।
‘बस पौने सात बजे जाती है’ में समय का रूप पादोनसप्तवादने होगा। नाममात्र के रूप में पादोनसप्तवादनम् लिख सकते हैं, लेकिन घटना के वाक्य में सप्तमी चाहिए। अलग पाठ्यपुस्तकों में संयुक्त पद का स्थान-विन्यास बदल सकता है; अर्थ और संख्या का संबंध वही रहता है।
यदि घड़ी की सुइयों का चित्र हो तो पहले सामान्य समय पहचानें। मिनट की सुई नौ पर और घंटे की सुई छह तथा सात के बीच हो, तो 6:45 है। उसे 9 बजे या सवा छह न पढ़ें। उसके बाद संस्कृत रूप बनाना अधिक सुरक्षित है।
9. संपूर्ण संशोधन अभ्यास
अशुद्ध: ‘वयं पुस्तकं पठति।’ कर्ता उत्तमपुरुष बहुवचन है; सुधार ‘वयं पुस्तकं पठामः।’ अशुद्ध: ‘भवान् गच्छसि।’ सुधार ‘भवान् गच्छति।’ अशुद्ध: ‘बालकैः कथाः पठ्यते।’ कर्मवाच्य का नया प्रथमा पद कथाः बहुवचन है, इसलिए ‘बालकैः कथाः पठ्यन्ते।’
अशुद्ध समय: 3:45 को पादोनत्रिवादनम् कहना। वह पौने तीन अर्थात 2:45 होगा। 3:45 के लिए अगला घंटा चार लें: पादोनचतुर्वादनम्। दोनों समयों में एक घंटे का अंतर है; पहले हिंदी अर्थ में बदलकर जाँच करना उपयोगी है।
अंतिम अर्थ-परीक्षण में पूछें कि किसने क्या किया, कब किया और क्या निषेध या उद्देश्य बदला। व्याकरणिक रूप देखने में सही हो सकता है, पर गलत समय या भूमिका के कारण अनुवाद फिर भी गलत होगा। इसलिए रूप और अर्थ का संयुक्त परीक्षण आवश्यक है।
प्रश्न हल करने की विधि
मुख्य क्रिया और कर्ता-कर्म-स्थान की भूमिकाएँ अलग करें।
पुरुष, वचन, लकार और विशेष विभक्ति का चयन करें।
रूपांतरण में केवल निर्देशित पक्ष बदलें।
वाच्य में मूल कर्ता, नया प्रथमा पद और क्रिया का मेल जाँचें।
समय में पूरा, सवा, साढ़े या पौने का गणित पहले स्पष्ट करें।
वापस हिंदी अर्थ बनाकर जाँचें कि मूल आशय सुरक्षित है।
सम्बन्ध
शब्दरूप कर्ता-कर्म तथा तृतीया-सप्तमी रूपों का आधार देते हैं।
धातुरूप पुरुष, वचन और लकार के सही परिवर्तन में आवश्यक हैं।
व्यावहारिक संस्कृत लेखन में कार्यक्रम और दिनचर्या के समय इसी पद्धति से लिखे जाते हैं।
सामान्य त्रुटियाँ
हिंदी के प्रत्येक परसर्ग का एक स्थिर संस्कृत रूप मानना; क्रिया और उपपद देखें।
कर्मवाच्य में मूल कर्ता से क्रिया मिलाना; नया प्रथमा पद देखें।
भाववाच्य को बहुवचन बनाना; सामान्य प्रथमपुरुष एकवचन क्रिया रखें।
पौने समय में उसी घंटे का नाम देना; आने वाला घंटा चुनें।
पुनरावृत्ति सूची
मैं भूमिकाएँ पहचानकर सरल वाक्य अनुवाद कर सकता/सकती हूँ।
मैं कर्ता-क्रिया और विशेषण का मेल रख सकता/सकती हूँ।
मैं कर्तृवाच्य और कर्मवाच्य रूपांतरित कर सकता/सकती हूँ।
मैं भाववाच्य की अलग अन्विति समझ सकता/सकती हूँ।
मैं समय का नाम और घटना का समय सही लिख सकता/सकती हूँ।
मैं रूप और अर्थ दोनों से अशुद्धि सुधार सकता/सकती हूँ।