परिचय
संधि पास आने वाले वर्णों के कारण होने वाला नियमानुसार ध्वनि या वर्ण-परिवर्तन है। संस्कृत में लगातार पढ़ते समय ऐसे मेल बहुत मिलते हैं। ‘इति + आदि’ के स्थान पर इत्यादि बनने पर केवल लिखावट छोटी नहीं होती; इ के स्थान पर य् भी आता है। संधि समझने से शब्द पहचानना, पदच्छेद करना और वाक्य का सही अर्थ लेना सरल होता है।
संधि करने और संधि-विच्छेद करने की दिशाएँ अलग हैं। पहले में मूल पद दिए रहते हैं, दूसरे में बदले रूप से मूल पहचानना होता है। इस अध्याय में स्वर, व्यंजन और विसर्ग संधि के प्रमुख नियम हैं। विस्तृत सूत्र-पद्धति के कुछ सूक्ष्म अपवाद यहाँ विद्यालयी स्तर के अनुसार सीमित हैं; परीक्षा में निर्धारित सूची तथा शिक्षक की स्वीकृत रूप-पद्धति को प्राथमिकता दें।
अधिगम उद्देश्य
पहचानें कि संधि-स्थल पर कौन-से दो वर्ण मिल रहे हैं।
लागू करें कि प्रमुख स्वर संधियों में नया रूप कैसे बनता है।
समझाएँ कि व्यंजन के वर्ग, घोष और नासिक्य गुण से परिवर्तन कैसे होता है।
बनाएँ कि विसर्ग का रूप पूर्ववर्ती तथा परवर्ती वर्ण के अनुसार कैसे बदलता है।
करें कि संधियुक्त शब्द का अर्थपूर्ण विच्छेद कैसे मिलता है।
जाँचें कि अवग्रह और पद-सीमा के चिह्न कब आवश्यक हैं।
मुख्य अवधारणाएँ
1. संधि-स्थल और तीन मुख्य भेद
पहले पद का अंतिम वर्ण तथा दूसरे का पहला वर्ण संधि-स्थल बनाते हैं। स्वर संधि में स्वर का स्वर से मेल, व्यंजन संधि में व्यंजन से संबंधित परिवर्तन और विसर्ग संधि में ः का परिवर्तन देखा जाता है। हर लंबे शब्द को संधि का उदाहरण मानना सही नहीं; मूल पद और नियम दोनों मिलने चाहिए।
उदाहरण: ‘महा + उत्सवः’ में आ और उ मिलते हैं, इसलिए स्वर संधि की जाँच करेंगे। ‘जगत् + ईशः’ में त् और ई हैं, इसलिए व्यंजन परिवर्तन देखेंगे। ‘नमः + ते’ में विसर्ग के कारण अलग प्रक्रिया है। संधि का भेद अनुमान से नहीं, वास्तविक वर्णों से तय करें।
2. दीर्घ संधि
सूत्र अकः सवर्णे दीर्घः समान स्वर के मेल पर दीर्घ रूप बताता है। अ/आ के साथ अ/आ से आ, इ/ई के साथ इ/ई से ई तथा उ/ऊ के साथ उ/ऊ से ऊ बनता है। ह्रस्व और दीर्घ का कोई भी उपयुक्त संयोजन उसी स्वर-समूह के अंतर्गत आता है।
मेल | उदाहरण | बदलता भाग |
|---|---|---|
आ + आ | विद्या + आलयः = विद्यालयः | दोनों आ के स्थान पर एक आ |
अ + आ | हिम + आलयः = हिमालयः | अ और आ के स्थान पर आ |
इ + ई | गिरि + ईशः = गिरीशः | इ और ई के स्थान पर ई |
उ + उ | गुरु + उपदेशः = गुरूपदेशः | उ और उ के स्थान पर ऊ |
‘विद्यालयः’ में अर्थपूर्ण मूल विद्या और आलयः हैं। केवल जहाँ आ दिखे, वहाँ दो अ की कल्पना न करें। शब्द की वास्तविक रचना से पुष्टि आवश्यक है।
3. गुण और वृद्धि संधि
सूत्र आद्गुणः के विद्यालयी प्रयोग में अ या आ के बाद इ/ई से ए, उ/ऊ से ओ और ऋ से अर् होता है। ‘महा + ईशः = महेशः’, ‘महा + उत्सवः = महोत्सवः’ और ‘महा + ऋषिः = महर्षिः’ तीन अलग उपप्रकार स्पष्ट करते हैं। मूल शब्दों में केवल मेल वाले वर्ण बदलते हैं, शेष भाग बचता है।
वृद्धिरेचि के अनुसार अ/आ के बाद ए/ऐ से ऐ और ओ/औ से औ होता है। ‘सदा + एव = सदैव’, ‘महा + औषधम् = महौषधम्’ और ‘वन + ओषधिः = वनौषधिः’ वृद्धि के उदाहरण हैं।
तुलना | गुण | वृद्धि |
|---|---|---|
दूसरे पद का आरंभ | इ/ई, उ/ऊ, ऋ | ए/ऐ, ओ/औ |
मुख्य परिणाम | ए, ओ, अर् | ऐ, औ |
उदाहरण | महोत्सवः | महौषधम् |
केवल ओ या औ देखकर नाम तय न करें। महोत्सवः में आ + उ से ओ है, जबकि महौषधम् में आ + औ से औ है। विच्छेद में मूल स्वर पहचानना मुख्य कदम है।
4. यण, अयादि और पूर्वरूप
सूत्र इको यणचि के अनुसार इ/ई, उ/ऊ और ऋ के बाद भिन्न स्वर आने पर उनके स्थान पर क्रमशः य्, व् और र् आते हैं। ‘अति + अधिकम् = अत्यधिकम्’, ‘इति + आदि = इत्यादि’, ‘सु + आगतम् = स्वागतम्’ और ‘पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा’ उदाहरण हैं। यदि अगला स्वर उसी प्रकार का हो तो पहले दीर्घ का नियम देखें।
सूत्र एचोऽयवायावः में ए, ऐ, ओ, औ के स्थान पर क्रमशः अय्, आय्, अव्, आव् होते हैं जब बाद में स्वर हो। पारंपरिक विद्यालयी उदाहरण ‘ने + अनम् = नयनम्’, ‘गै + अकः = गायकः’, ‘पो + अनः = पवनः’ और ‘पौ + अकः = पावकः’ हैं। इनके मूल धातु-संबंध सामान्य स्वतंत्र हिंदी शब्द जैसे न भी लगें, फिर भी संधि-अभ्यास में स्वीकृत रूप हैं।
पूर्वरूप संधि में पदांत ए या ओ के बाद ह्रस्व अ लुप्त हो सकता है और अवग्रह लगता है: ‘ते + अपि = तेऽपि’। अवग्रह का चिह्न ऽ है। ‘तेऽपि’ का अर्थ वे भी है। इसे ‘ते + पि’ न करें; मूल अ पुनः दिखाना आवश्यक है।
5. वर्गीय व्यंजन और घोष-परिवर्तन
क, च, ट, त, प वर्गों के तीसरे वर्ण क्रमशः ग, ज, ड, द, ब हैं। झलां जशोऽन्ते के विद्यालयी प्रयोग में पदांत उपयुक्त व्यंजन घोष वर्ण या स्वर से पहले अपने वर्ग के घोष रूप में बदल सकता है। ‘वाक् + ईशः = वागीशः’ में क् से ग् और ‘जगत् + ईशः = जगदीशः’ में त् से द् होता है।
खरि च के अंतर्गत अघोष वर्ण के पहले उपयुक्त घोष व्यंजन अघोष रूप ग्रहण कर सकता है। ‘उद् + साहः = उत्साहः’ में द् से त् और ‘सद् + कारः = सत्कारः’ में भी द् से त् होता है। अगले वर्ण के गुण की अनदेखी करके हर अंतिम त् को द् न करें।
श्चुत्व में स् या त-वर्ग का श् अथवा च-वर्ग के प्रभाव से तालव्य रूप बन सकता है। ‘उत् + ज्वलः = उज्ज्वलः’ में त् ज् के अनुरूप बदलता है। ‘सत् + चित् = सच्चित्’ में त् से च् होता है। ष्टुत्व में संबंधित मूर्धन्य प्रभाव देखा जाता है; इसकी सूक्ष्म सीमाएँ अपनी निर्धारित सूची से अभ्यास करें।
6. नासिक्य, अनुस्वार और लत्व
नासिक्य वर्ण के पहले पदांत वर्गीय व्यंजन उसी वर्ग का नासिक्य रूप ले सकता है। ‘जगत् + नाथः = जगन्नाथः’ में त् से न् होता है। ‘वाक् + मयम् = वाङ्मयम्’ में क् का क-वर्गीय नासिक्य ङ् रूप है। नासिक्य का वर्ग देखना वर्तनी की शुद्धता के लिए आवश्यक है।
मोऽनुस्वारः के अनुसार पदांत म् के बाद व्यंजन होने पर अनुस्वार हो सकता है। ‘हरिम् + वन्दे = हरिं वन्दे।’ शब्दों के बीच स्थान रहने पर भी संधि हो सकती है; संधि का अर्थ हर बार दो शब्दों को एक बिना अंतराल वाले शब्द में बदलना नहीं है।
परसवर्ण में अनुस्वार अगले वर्गीय व्यंजन का समान वर्गीय नासिक्य ले सकता है। ‘सम् + चयः’ का रूप ‘सञ्चयः’ है। अनुस्वारयुक्त संक्षिप्त वर्तनी संचयः भी प्रचलित है; प्रश्न की अपेक्षित लिपि-पद्धति पहचानें। तोर्लि के प्रयोग में ‘तत् + लीनः = तल्लीनः’ और ‘उत् + लासः = उल्लासः’ बनते हैं।
7. विसर्ग संधि के प्रमुख रूप
विसर्ग से पहले का स्वर और बाद का वर्ण दोनों देखें। केवल ः को हर जगह ओ बनाना गंभीर त्रुटि है। निम्न उदाहरण नियमों की अलग परिस्थितियाँ दिखाते हैं।
स्थिति का विद्यालयी संकेत | उदाहरण | परिणाम |
|---|---|---|
विसर्ग के बाद त् आदि अघोष वर्ण | नमः + ते = नमस्ते | स् का रूप |
नि: के बाद च-वर्ग का प्रभाव | निः + चलः = निश्चलः | श्च का मेल |
अः के बाद उपयुक्त घोष व्यंजन | मनः + रथः = मनोरथः | ओ का रूप |
अः के बाद ह्रस्व अ | रामः + अस्ति = रामोऽस्ति | ओ तथा अवग्रह |
इ/उ आदि के बाद विसर्ग और आगे उपयुक्त स्वर/घोष | निः + आशा = निराशा | र् का रूप |
अः के बाद अ से भिन्न स्वर | अतः + एव = अत एव | विसर्ग-लोप |
सः या एषः के बाद व्यंजन | सः + गच्छति = स गच्छति | विसर्ग-लोप |
इन स्थितियों का विस्तृत पाणिनीय विवेचन अधिक सूक्ष्म है। विद्यालयी उत्तर में दिए शब्द के स्थापित रूप और लागू शर्त दोनों स्पष्ट करें। ‘रामोऽस्ति’ में ऽ हटाकर ‘रामोस्ति’ लिखने से अपेक्षित संधि-चिह्न छूटता है। ‘निराशा’ का विच्छेद निः + आशा है, निः + राशा नहीं।
8. सुलझी विच्छेद-विधि और संदर्भ
महर्षिः: अर् परिवर्तन का संकेत है। मूल अर्थ महान ऋषि है। महा + ऋषिः लें; आ + ऋ से अर्, इसलिए गुण संधि। सदैव: ऐ मिलने पर सदा + एव जाँचें; आ + ए से ऐ, इसलिए वृद्धि। स्वागतम्: सु + आगतम् में उ के स्थान पर व् है, इसलिए यण।
जगन्नाथः: न्न मिलने पर जगत् + नाथः जाँचें; त् नासिक्य रूप न् हुआ है। मनोरथः: मनः + रथः में अः और घोष र् की स्थिति है। तेऽपि: ते + अपि में पदांत ए के बाद अ का लोप और अवग्रह है। प्रत्येक उत्तर में केवल नाम नहीं, बदलते वर्ण भी लिखें।
एक संधियुक्त रूप कभी अलग संदर्भों में भिन्न मूल दे सकता है। अर्थपूर्ण पद, वाक्य की अपेक्षा और रूप-व्यवस्था मिलाकर निर्णय लें। शब्दकोश-जैसे अनुमान से अप्रमाणित मूल न बनाएँ। प्रश्न में केवल मेल माँगा हो तो सही संयुक्त रूप पर्याप्त हो सकता है; नियम माँगा हो तो उसका नाम और वर्ण-संबंध भी दें।
प्रश्न हल करने की विधि
पहले पद का अंतिम तथा दूसरे का प्रारंभिक वर्ण लिखें।
स्वर, व्यंजन या विसर्ग प्रक्रिया पहचानें।
नियम की वास्तविक शर्त जाँचकर केवल आवश्यक वर्ण बदलें।
विच्छेद में अर्थपूर्ण मूल पद पुनः प्राप्त करें।
अवग्रह, अनुस्वार और संयुक्त वर्ण की वर्तनी जाँचें।
बने पद को वाक्य में पढ़कर अर्थ तथा व्याकरण की पुष्टि करें।
सम्बन्ध
पठन और पदच्छेद में बदले वर्णों से मूल पद पहचानने के लिए संधि आवश्यक है।
समास में पद जुड़ने पर संधि भी हो सकती है, लेकिन दोनों प्रक्रियाओं का आधार अलग है।
शब्दरूप और धातुरूप से सही मूल रूप की पुष्टि करके विच्छेद अधिक विश्वसनीय बनता है।
सामान्य त्रुटियाँ
हर ए या ओ को गुण कहना; पहले मूल स्वर और पद देखें।
समान स्वर पर यण लगा देना; दीर्घ की शर्त पहले जाँचें।
विसर्ग का रूप बिना अगले वर्ण देखे बदलना; दोनों ओर के वर्ण आवश्यक हैं।
अवग्रह के बाद मूल अ वापस न देना; विच्छेद में पूरा पद लिखें।
पुनरावृत्ति सूची
मैं संधि-स्थल के दोनों वर्ण पहचान सकता/सकती हूँ।
मैं स्वर संधियों का नियम और उदाहरण बता सकता/सकती हूँ।
मैं प्रमुख व्यंजन परिवर्तन वर्ग के आधार पर समझा सकता/सकती हूँ।
मैं विसर्ग की अलग स्थितियाँ पहचान सकता/सकती हूँ।
मैं अर्थपूर्ण विच्छेद तथा सही संयुक्त रूप लिख सकता/सकती हूँ।
मैं संधि और समास को अलग प्रक्रियाएँ समझ सकता/सकती हूँ।