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8 MIN LESSON · SANSKRIT

Class 10 Sanskrit: Nouns and Case Endings: Complete Concepts and Practice

संस्कृत — लिंग-वचन-विभक्ति, राम-फल-लता-हरि-गुरु-नदी की पूर्ण सारणियाँ, अस्मद्-युष्मद्, कारक, उपपद विभक्ति, विशेषण-अन्विति और वाक्य-संशोधन।

परिचय

शब्दरूप संस्कृत संज्ञा और सर्वनाम की विभक्ति तथा वचन के अनुसार बनने वाली रूप-व्यवस्था है। हिंदी में अनेक संबंध को, से, के लिए और में जैसे परसर्गों से स्पष्ट होते हैं। संस्कृत में शब्द का अंत ही इन संबंधों का महत्त्वपूर्ण संकेत देता है। इसलिए रूप याद करना और उनका वाक्य में प्रयोग समझना साथ चलना चाहिए।

‘बालकः पुस्तकं पठति’ में बालकः पढ़ने वाला और पुस्तकम् पढ़ी जाने वाली वस्तु है। क्रम बदलकर ‘पुस्तकं बालकः पठति’ करने पर भी विभक्ति वही संबंध रखती है। इस अध्याय में प्रमुख पूर्ण रूप-सारणियाँ, कारक, उपपद विभक्ति, सर्वनाम और विशेषण-अन्विति का अभ्यास है। निर्धारित पाठ्यक्रम में अतिरिक्त शब्द हों तो शिक्षक की सूची के अनुसार उनका विस्तार करें।

अधिगम उद्देश्य

  • पहचानें कि लिंग, वचन और विभक्ति रूप को कैसे प्रभावित करते हैं।

  • लिखें कि प्रमुख संज्ञाओं की पूर्ण रूप-सारणियाँ कैसी हैं।

  • समझाएँ कि कारक और सामान्य विभक्ति-संबंध क्या हैं।

  • चुनें कि उपपद के कारण कौन-सी विभक्ति अपेक्षित है।

  • प्रयोग करें कि सर्वनाम और विशेषण संज्ञा से कैसे मेल खाते हैं।

  • सुधारें कि संदर्भ के आधार पर गलत रूप कैसे पहचाना जाता है।

मुख्य अवधारणाएँ

1. लिंग, वचन और विभक्ति की संयुक्त पहचान

संस्कृत में पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग हैं। व्याकरणिक लिंग केवल वास्तविक जीव के स्त्री या पुरुष होने से नहीं तय होता। पुस्तक शब्द का नपुंसकलिंग रूप पुस्तकम् है। एकवचन एक, द्विवचन दो और बहुवचन तीन या अधिक का बोध देता है।

सात विभक्तियाँ प्रथमा से सप्तमी तक हैं; संबोधन के रूप अलग पंक्ति में रखे जाते हैं। किसी रूप की पहचान में मूल शब्द, लिंग, विभक्ति और वचन चारों दें। ‘रामाभ्याम्’ द्विवचन है, लेकिन तृतीया, चतुर्थी या पंचमी हो सकता है। पूरा वाक्य ही उनमें से उचित अर्थ चुनता है। एक रूप देखकर हमेशा केवल एक विभक्ति घोषित करना गलत है।

2. अकारान्त पुल्लिंग राम के पूर्ण रूप

विभक्ति

एकवचन

द्विवचन

बहुवचन

प्रथमा

रामः

रामौ

रामाः

द्वितीया

रामम्

रामौ

रामान्

तृतीया

रामेण

रामाभ्याम्

रामैः

चतुर्थी

रामाय

रामाभ्याम्

रामेभ्यः

पंचमी

रामात्

रामाभ्याम्

रामेभ्यः

षष्ठी

रामस्य

रामयोः

रामाणाम्

सप्तमी

रामे

रामयोः

रामेषु

संबोधन

हे राम

हे रामौ

हे रामाः

बालक, छात्र, वृक्ष आदि अनेक अकारान्त पुल्लिंग शब्द समान ढाँचे पर चलते हैं, लेकिन णत्व जैसे वर्ण-नियमों के कारण प्रत्येक अक्षर यांत्रिक रूप से न बदलें। रामेण के साथ बालकेन और रामाणाम् के साथ बालकानाम् मिलता है। ‘छात्रः वृक्षं पश्यति’ में छात्रः कर्ता और वृक्षम् कर्म है।

3. नपुंसकलिंग फल और आकारान्त स्त्रीलिंग लता

नपुंसकलिंग में प्रथमा, द्वितीया और संबोधन के रूप प्रत्येक वचन में परस्पर समान होते हैं। फलम् एकवचन और फलानि बहुवचन है। शेष विभक्तियों का ढाँचा अकारान्त पुल्लिंग के समान है, पर मूल शब्द फल रहता है।

विभक्ति

एकवचन

द्विवचन

बहुवचन

प्रथमा

फलम्

फले

फलानि

द्वितीया

फलम्

फले

फलानि

तृतीया

फलेन

फलाभ्याम्

फलैः

चतुर्थी

फलाय

फलाभ्याम्

फलेभ्यः

पंचमी

फलात्

फलाभ्याम्

फलेभ्यः

षष्ठी

फलस्य

फलयोः

फलानाम्

सप्तमी

फले

फलयोः

फलेषु

संबोधन

हे फल

हे फले

हे फलानि

लता आकारान्त स्त्रीलिंग का प्रतिनिधि है। ‘बालिका’ जैसे शब्द इसी ढाँचे पर अभ्यास किए जा सकते हैं। तृतीया लतया और चतुर्थी लतायै को अलग सुनकर तथा लिखकर अभ्यास करें; दोनों एक रूप नहीं हैं।

विभक्ति

एकवचन

द्विवचन

बहुवचन

प्रथमा

लता

लते

लताः

द्वितीया

लताम्

लते

लताः

तृतीया

लतया

लताभ्याम्

लताभिः

चतुर्थी

लतायै

लताभ्याम्

लताभ्यः

पंचमी

लतायाः

लताभ्याम्

लताभ्यः

षष्ठी

लतायाः

लतयोः

लतानाम्

सप्तमी

लतायाम्

लतयोः

लतासु

संबोधन

हे लते

हे लते

हे लताः

4. इकारान्त हरि, उकारान्त गुरु और ईकारान्त नदी

हरि तथा गुरु की रूप-व्यवस्था अकारान्त शब्दों से भिन्न है। ‘हरये’ और ‘गुरवे’ चतुर्थी एकवचन हैं; ‘हरौ’ और ‘गुरौ’ सप्तमी एकवचन। समान ध्वनि वाले शब्दों में भी लिंग और मूलांत देखें।

विभक्ति

हरि एकवचन

हरि द्विवचन

हरि बहुवचन

प्रथमा

हरिः

हरी

हरयः

द्वितीया

हरिम्

हरी

हरीन्

तृतीया

हरिणा

हरिभ्याम्

हरिभिः

चतुर्थी

हरये

हरिभ्याम्

हरिभ्यः

पंचमी

हरेः

हरिभ्याम्

हरिभ्यः

षष्ठी

हरेः

हर्योः

हरीणाम्

सप्तमी

हरौ

हर्योः

हरिषु

संबोधन

हे हरे

हे हरी

हे हरयः

विभक्ति

गुरु एकवचन

गुरु द्विवचन

गुरु बहुवचन

प्रथमा

गुरुः

गुरू

गुरवः

द्वितीया

गुरुम्

गुरू

गुरून्

तृतीया

गुरुणा

गुरुभ्याम्

गुरुभिः

चतुर्थी

गुरवे

गुरुभ्याम्

गुरुभ्यः

पंचमी

गुरोः

गुरुभ्याम्

गुरुभ्यः

षष्ठी

गुरोः

गुर्वोः

गुरूणाम्

सप्तमी

गुरौ

गुर्वोः

गुरुषु

संबोधन

हे गुरो

हे गुरू

हे गुरवः

नदी ईकारान्त स्त्रीलिंग है। ‘नदी’ और ‘नद्या’ को अलग रूप समझें। ‘बालकः नद्याः जलं पश्यति’ में नदी के जल का संबंध है; ‘नद्याम् मत्स्याः सन्ति’ में स्थान है। अर्थ से विभक्ति चुनें।

विभक्ति

एकवचन

द्विवचन

बहुवचन

प्रथमा

नदी

नद्यौ

नद्यः

द्वितीया

नदीम्

नद्यौ

नदीः

तृतीया

नद्या

नदीभ्याम्

नदीभिः

चतुर्थी

नद्यै

नदीभ्याम्

नदीभ्यः

पंचमी

नद्याः

नदीभ्याम्

नदीभ्यः

षष्ठी

नद्याः

नद्योः

नदीनाम्

सप्तमी

नद्याम्

नद्योः

नदीषु

संबोधन

हे नदि

हे नद्यौ

हे नद्यः

5. सर्वनाम अस्मद् और युष्मद्

अस्मद् वक्ता और युष्मद् संबोधित व्यक्ति के लिए हैं। इनके मुख्य पूर्ण रूप नीचे हैं। विशेष संदर्भों में इनके लघु विकल्प भी मिलते हैं, लेकिन प्रारंभिक रूप-पहचान के लिए इन स्पष्ट रूपों का अभ्यास करें।

विभक्ति

अस्मद् एकवचन

द्विवचन

बहुवचन

प्रथमा

अहम्

आवाम्

वयम्

द्वितीया

माम्

आवाम्

अस्मान्

तृतीया

मया

आवाभ्याम्

अस्माभिः

चतुर्थी

मह्यम्

आवाभ्याम्

अस्मभ्यम्

पंचमी

मत्

आवाभ्याम्

अस्मत्

षष्ठी

मम

आवयोः

अस्माकम्

सप्तमी

मयि

आवयोः

अस्मासु

विभक्ति

युष्मद् एकवचन

द्विवचन

बहुवचन

प्रथमा

त्वम्

युवाम्

यूयम्

द्वितीया

त्वाम्

युवाम्

युष्मान्

तृतीया

त्वया

युवाभ्याम्

युष्माभिः

चतुर्थी

तुभ्यम्

युवाभ्याम्

युष्मभ्यम्

पंचमी

त्वत्

युवाभ्याम्

युष्मत्

षष्ठी

तव

युवयोः

युष्माकम्

सप्तमी

त्वयि

युवयोः

युष्मासु

‘अहं पठामि’, ‘आवां पठावः’ और ‘वयं पठामः’ में कर्ता के वचन से क्रिया बदलती है। संधियुक्त रूप अहम् का अहं हो सकता है। संस्कृत में अहम् उत्तमपुरुष, त्वम् मध्यमपुरुष और सः प्रथमपुरुष के साथ पढ़े जाते हैं। हिंदी या अंग्रेजी के क्रम से नाम उलटने से बचें।

6. कारक और सामान्य विभक्ति

कारक का संबंध क्रिया से होता है। कर्ता, कर्म, करण, संप्रदान, अपादान और अधिकरण छह प्रमुख कारक हैं। षष्ठी संबंध बताती है; विद्यालयी तालिका में साथ रखने पर भी उसे स्वतंत्र कारक नहीं मानते। कर्तृवाच्य के सामान्य प्रयोगों में निम्न संबंध उपयोगी हैं।

भूमिका

सामान्य विभक्ति

मौलिक उदाहरण और अर्थ

कर्ता

प्रथमा

बालिका पठति — बालिका पढ़ती है

कर्म

द्वितीया

बालिका पुस्तकं पठति — पुस्तक पढ़ती है

करण

तृतीया

सा लेखन्या लिखति — लेखनी से लिखती है

संप्रदान

चतुर्थी

सा बालकाय फलं ददाति — बालक को फल देती है

अपादान

पंचमी

वृक्षात् पत्रं पतति — पेड़ से पत्ता गिरता है

संबंध

षष्ठी

बालकस्य पुस्तकम् — बालक की पुस्तक

अधिकरण

सप्तमी

उद्याने बालकः क्रीडति — बगीचे में खेलता है

कर्तृवाच्य में कर्ता सामान्यतः प्रथमा में है, लेकिन कर्मवाच्य में कर्ता तृतीया में हो सकता है: ‘बालकेन पुस्तकं पठ्यते।’ इसलिए कर्ता की अर्थगत भूमिका और हर वाक्य में प्रथमा को एक ही न मानें। वाच्य क्रिया-संबंध बदलता है।

7. उपपद विभक्ति के महत्त्वपूर्ण प्रयोग

उपपद विभक्ति में किसी विशेष शब्द या धातु के साथ विभक्ति अपेक्षित होती है। हिंदी अनुवाद के परसर्ग से सीधे रूप चुनने के बजाय संस्कृत योग देखें। ‘सह’ के साथ तृतीया है, भले हिंदी में साथ का प्रयोग हो।

योग

अपेक्षित रूप

उदाहरण

परितः, अभितः, प्रति

द्वितीया

विद्यालयं परितः वृक्षाः सन्ति

सह, साकम्, सार्धम्

तृतीया

बालिका मित्रेण सह गच्छति

अलम्, निषेध के अर्थ में

तृतीया

अलं कोलाहलेन

नमः

चतुर्थी

गुरवे नमः

रुच्, जिसे अच्छा लगे

चतुर्थी

बालकाय फलं रोचते

बहिः, भीति का स्रोत

पंचमी

ग्रामात् बहिः उद्यानम्; बालकः सिंहात् बिभेति

उपरि, अधः, समीपे

षष्ठी के प्रचलित योग

वृक्षस्य अधः बालकः तिष्ठति

‘विना’ के साथ अलग संदर्भों में द्वितीया, तृतीया और पंचमी मिल सकती हैं। ऐसा प्रश्न जिसमें संदर्भ या अपेक्षित पद्धति न हो, उसे एकमात्र विभक्ति तक सीमित करना ठीक नहीं। स्पष्ट योग वाले अभ्यास पहले करें।

8. विशेषण-अन्विति और सुलझा प्रयोग

विशेषण संज्ञा के लिंग, वचन और विभक्ति के अनुसार मेल रखता है। ‘सुन्दरं फलम्’, ‘सुन्दरे फले’ और ‘सुन्दराणि फलानि’ में नपुंसकलिंग की अलग वचन-रचना है। ‘सुन्दराः फलानि’ अशुद्ध होगा। पुल्लिंग में ‘सुन्दराः वृक्षाः’ सही है। शब्दांत समान दिखना ही अन्विति नहीं; मूल लिंग देखें।

सुलझा प्रश्न: बालिका ___ सह पठति, मूल शब्द मित्र। सह के कारण तृतीया चाहिए। मित्र नपुंसकलिंग एकवचन हो तो रूप मित्रेण। पूरा वाक्य: ‘बालिका मित्रेण सह पठति।’ यदि दो मित्र हों तो मित्राभ्याम् होगा। अर्थ, संख्या और उपपद तीनों आवश्यक हैं।

सुलझा संशोधन: ‘बालकः गुरुः नमः वदति’ में नमः का संबोधित प्राप्तकर्ता चतुर्थी में चाहिए। सुधार: ‘बालकः गुरवे नमः वदति।’ यदि केवल ‘गुरवे नमः’ लिखा जाए तो वह भी स्वतंत्र अभिवादन है। प्रश्न की माँग के अनुसार पूरा वाक्य या एक पद लिखें।

प्रश्न हल करने की विधि

  1. मूल शब्द, अंतिम स्वर और लिंग पहचानें।

  2. अर्थ से वचन और वाक्य में भूमिका निर्धारित करें।

  3. किसी उपपद या धातु की विशेष विभक्ति अपेक्षा जाँचें।

  4. पूर्ण तालिका से रूप लें; मिलते रूपों को संदर्भ से अलग करें।

  5. विशेषण, सर्वनाम और क्रिया का आवश्यक मेल देखें।

  6. पूरा अर्थ पढ़कर पुष्टि करें कि भूमिका नहीं उलटी है।

सम्बन्ध

  • धातुरूप में कर्ता के पुरुष और वचन के अनुसार क्रिया चुनने के लिए शब्दरूप आवश्यक हैं।

  • अनुवाद और वाच्य में कर्ता, कर्म तथा तृतीया का संबंध बदलते समय यही ज्ञान काम आता है।

  • श्लोक-पठन में पदक्रम बदलने पर विभक्ति अन्वय का मुख्य आधार रहती है।

सामान्य त्रुटियाँ

  • हिंदी के को या से देखकर विभक्ति तय करना; संस्कृत क्रिया और उपपद देखें।

  • द्विवचन भूलकर हर अनेक समूह को बहुवचन बनाना; दो के लिए अलग रूप रखें।

  • एक जैसे रूप को केवल एक विभक्ति मानना; संदर्भ से भूमिका तय करें।

  • नपुंसकलिंग विशेषण को पुल्लिंग में रखना; लिंग-वचन-विभक्ति का मेल जाँचें।

पुनरावृत्ति सूची

  • मैं लिंग, वचन और विभक्ति पहचान सकता/सकती हूँ।

  • मैं प्रमुख संज्ञाओं की पूरी रूप-सारणी लिख सकता/सकती हूँ।

  • मैं अस्मद् और युष्मद् के रूप वाक्य में लगा सकता/सकती हूँ।

  • मैं कारक और उपपद के अनुसार विभक्ति चुन सकता/सकती हूँ।

  • मैं विशेषण तथा क्रिया का आवश्यक मेल रख सकता/सकती हूँ।

  • मैं एक से अधिक पहचान वाले रूप को संदर्भ से स्पष्ट कर सकता/सकती हूँ।

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