परिचय
समास और शब्द-निर्माण संस्कृत की संक्षिप्त तथा अर्थपूर्ण अभिव्यक्ति के प्रमुख साधन हैं। ‘ग्रामस्य मार्गः’ को ग्राममार्गः कहने पर संबंध बचता है, पर बीच की विभक्ति का विस्तृत रूप हट जाता है। इसी तरह पठ् से पठित्वा और पठितवान् बनने पर एक धातु से अलग कार्य-भूमिकाएँ व्यक्त होती हैं।
केवल शब्द छोटा या लंबा होना उसकी रचना नहीं बताता। हमें मूल पद, अर्थ-संबंध, प्रत्यय और वाक्य में कार्य देखना पड़ता है। इस अध्याय में प्रमुख समास, अर्थपूर्ण विग्रह, उपसर्ग और कृत्-तद्धित-स्त्रीप्रत्यय के उदाहरण हैं। विस्तृत संस्कृत व्याकरण में इनके अनेक उपभेद हैं; विद्यालय की निर्धारित प्रत्यय-सूची के अनुसार प्राथमिकता दें।
अधिगम उद्देश्य
स्पष्ट करें कि समास, विग्रह और संधि का आधार कैसे अलग है।
पहचानें कि प्रमुख समासों में कौन-सा पद प्रधान है।
बनाएँ कि संदर्भ के अनुसार सही विग्रह और समस्त पद कैसे मिलते हैं।
प्रयोग करें कि उपसर्ग धातु या शब्द का अर्थ कैसे बदलता है।
पहचानें कि प्रमुख प्रत्यय से अव्यय, विशेषण और संज्ञा कैसे बनते हैं।
जाँचें कि व्युत्पन्न रूप का लिंग-वचन-विभक्ति और वाक्यार्थ से मेल है या नहीं।
मुख्य अवधारणाएँ
1. समास और संधि का अंतर
समास अर्थ-संबंध रखने वाले पदों की संक्षिप्त रचना है। बना शब्द समस्त पद और उसका विस्तार विग्रह है। संधि पास आने वाले वर्णों में ध्वनि-परिवर्तन की प्रक्रिया है। समास में संधि हो सकती है, लेकिन दोनों एक प्रक्रिया नहीं हैं।
‘राज्ञः पुत्रः’ से राजपुत्रः में संबंध का संक्षेप है। ‘विद्या + आलयः’ में आ और आ का स्वर-मेल विद्यालयः बनाता है। यदि प्रश्न समास-विग्रह पूछे तो अर्थ-संबंध बताना चाहिए; यदि संधि-विच्छेद पूछे तो मूल वर्णों का मेल दिखाएँ। एक ही शब्द की दोनों दिशाओं से जाँच संभव हो सकती है।
पहले विग्रह करने की आदत गलत नामकरण कम करती है। ‘माता च पिता च’ में दोनों व्यक्ति बराबर हैं, जबकि ‘राज्ञः पुत्रः’ में पुत्र मुख्य है। केवल पदों की संख्या समान होने से भेद समान नहीं होता।
2. अव्ययीभाव समास
अव्ययीभाव में पहला अव्यय प्रधान होता है और पूरा पद प्रायः अव्ययवत् काम करता है। ‘शक्तिम् अनतिक्रम्य’ का यथाशक्ति अर्थ है शक्ति की सीमा में या शक्ति के अनुसार। ‘दिनं दिनं प्रति’ का प्रतिदिनम् प्रत्येक दिन है। पूरा पद संज्ञा की तरह सामान्य विभक्ति-परिवर्तन नहीं लेता।
मौलिक वाक्य: ‘छात्राः यथाशक्ति कार्यं कुर्वन्ति।’ यहाँ यथाशक्ति काम करने की सीमा या रीति बताता है। ‘ग्रामस्य समीपम्’ का उपग्रामम् गाँव के पास का अर्थ देता है। ध्यान दें कि विग्रह में आने वाले सभी शब्दों को यांत्रिक रूप से जोड़ देना पर्याप्त नहीं; स्थापित रूप और अर्थ दोनों चाहिए।
3. तत्पुरुष और कारक-संबंध
तत्पुरुष में उत्तरपद प्रधान होता है और पूर्वपद उसके साथ कारक आदि संबंध रखता है। ‘ग्रामस्य मार्गः = ग्राममार्गः’ में मार्ग मुख्य और ग्राम संबंध बताता है। ‘भयात् मुक्तः = भयमुक्तः’ में पंचमी संबंध है।
संबंध | विग्रह | समस्त पद |
|---|---|---|
द्वितीया | ग्रामं गतः | ग्रामगतः |
तृतीया | हस्तेन लिखितम् | हस्तलिखितम् |
चतुर्थी | भोजनाय शाला | भोजनशाला |
पंचमी | भयात् मुक्तः | भयमुक्तः |
षष्ठी | ग्रामस्य मार्गः | ग्राममार्गः |
सप्तमी | वने वासः | वनवासः |
हर तत्पुरुष का विग्रह केवल षष्ठी से करना गलत है। हस्तलिखितम् का अर्थ हाथ का लिखित नहीं, हाथ से लिखा हुआ है। विग्रह का कारक वास्तविक संबंध से चुनें। नञ् तत्पुरुष में निषेध आता है: ‘न न्यायः = अन्यायः’, ‘न सत्यम् = असत्यम्’। बने शब्द का स्थापित रूप भी सीखें।
4. कर्मधारय और द्विगु
कर्मधारय में विशेषण-विशेष्य या उपमान-उपमेय समानाधिकरण संबंध होता है। ‘नीलं कमलम् = नीलकमलम्’ में कमल मुख्य और नीला उसकी विशेषता है। ‘महान् पुरुषः = महापुरुषः’ में महत्त्व का गुण जुड़ता है।
द्विगु में संख्या पूर्वपद के साथ समाहार का अर्थ महत्त्वपूर्ण है। ‘त्रयाणां लोकानां समाहारः = त्रिलोकम्’ संख्या से समूह बनाता है। संख्या दिखना अकेले पर्याप्त नहीं; ‘तीन लोकों का समूह’ और ‘तीन लोक हैं जिसके’ अलग अर्थ हैं। बाद वाला किसी अन्य का संकेत होने पर बहुव्रीहि होगा।
विद्यालयी वर्गीकरण में कर्मधारय तथा द्विगु को तत्पुरुष के उपभेद भी कहा जा सकता है। प्रश्न यदि विशिष्ट भेद पूछे तो वही दें। परीक्षा में पाठ्यपुस्तक का स्वीकृत वर्गीकरण और संदर्भ सबसे उपयोगी आधार हैं।
5. द्वंद्व और बहुव्रीहि
द्वंद्व में दोनों या सभी पद समान रूप से प्रधान होते हैं। ‘रामः च कृष्णः च = रामकृष्णौ’ में दो पुरुष होने के कारण द्विवचन है। ‘फलानि च पुष्पाणि च = फलपुष्पाणि’ में दो वस्तु-वर्ग साथ आते हैं। केवल और का हिंदी अनुवाद नहीं, संयुक्त संख्या और रूप भी देखें।
बहुव्रीहि किसी ऐसे अन्य व्यक्ति या वस्तु का बोध देता है जो दोनों मूल पदों से बाहर है। ‘पीतम् अम्बरं यस्य सः = पीताम्बरः’ पीला वस्त्र धारण करने वाले व्यक्ति का संकेत हो सकता है। यदि केवल ‘पीतम् अम्बरम्’ अर्थात पीला वस्त्र अर्थ हो तो पीताम्बरम् कर्मधारय होगा। अर्थ और लिंग दोनों संकेत देते हैं।
इसी प्रकार ‘नीलः कण्ठः यस्य सः = नीलकण्ठः’ किसी धारक की ओर जाता है। बिना संदर्भ केवल नाम देखकर बहुव्रीहि या कर्मधारय का एक उत्तर निश्चित करना असुरक्षित हो सकता है। विग्रह में यस्य का होना बाहरी संकेत स्पष्ट करता है।
6. उपसर्ग और धातु का अर्थ
उपसर्ग धातु से पहले जुड़कर उसके अर्थ को विशेष बनाता है। गम् जाना है; आगच्छति आता है, निर्गच्छति बाहर जाता है और प्रतिगच्छति लौटता है। ध्वनि या आधार में परिवर्तन हो सकता है, इसलिए उपसर्ग जोड़ते समय सही क्रियारूप भी देखें।
मौलिक वाक्य: ‘छात्रः कक्षातः निर्गच्छति।’ कक्षा से बाहर जाना स्पष्ट है। ‘छात्रः कक्षाम् आगच्छति’ कक्षा में आने का अर्थ देता है। उपसर्ग बदलकर स्थान की विभक्ति यांत्रिक रूप से न छोड़ दें; नई क्रिया का अर्थ और संबंध देखें।
प्र, परा, अप, सम्, अनु, अव, निस्/निर्, दुस्/दुर्, वि, आ, नि, अधि, अपि, अति, सु, उत्, अभि, प्रति, परि और उप प्रमुख परंपरागत उपसर्ग हैं। सूची याद करने के साथ परिचित क्रियाओं में अर्थ का अंतर पहचानना अधिक उपयोगी है।
7. क्त्वा, ल्यप् और तुमुन्
क्त्वा सामान्यतः एक ही कर्ता के पहले पूरे हुए कार्य को दिखाता है: ‘बालकः पठित्वा लिखति’ अर्थात बालक पढ़कर लिखता है। पठित्वा पहले कार्य का अव्यय रूप है। इसका रूप कर्ता के लिंग या वचन से नहीं बदलता।
ल्यप् उपसर्गयुक्त धातुओं के पूर्वकालिक प्रयोग में आता है: ‘आगत्य’ आकर और ‘प्रणम्य’ प्रणाम करके। उदाहरण: ‘छात्रः गुरुम् प्रणम्य उपविशति।’ पहले प्रणाम, फिर बैठना, और दोनों का कर्ता एक है। हर उपसर्गयुक्त रूप में केवल धातु के बाद य लगा देना सही निर्माण नहीं; स्थापित रूप सीखें।
तुमुन् उद्देश्य या करने की इच्छा के लिए तुम् अंत वाला अव्यय बनाता है: पठितुम् पढ़ने के लिए, गन्तुम् जाने के लिए, कर्तुम् करने के लिए। ‘सा पठितुं पुस्तकालयं गच्छति’ में जाना मुख्य कार्य और पढ़ना उद्देश्य है। इसे पठित्वा कर देने पर अर्थ पढ़ने के बाद जाना हो जाएगा।
8. क्त, क्तवतु, शतृ और शानच्
क्त से बना भूतकृदन्त प्रायः संपन्न स्थिति बताता है: पठितम् पुस्तकम्, लिखा हुआ पत्र लिखितं पत्रम्। विशेषण की तरह लिंग-वचन-विभक्ति का मेल रखता है। ‘लिखिता कथा’ स्त्रीलिंग है और ‘लिखितानि पत्राणि’ नपुंसकलिंग बहुवचन।
क्तवतु सक्रिय भूत का बोध देता है: पठितवान्, पठितवती, पठितवन्तः। ‘बालिका कथां पठितवती’ में पढ़ने वाली बालिका है। इसे पठिता कथा से अलग समझें, जहाँ पढ़ी गई कथा प्रधान है।
शतृ का रूप चल रही क्रिया से संबंधित विशेषण बनाता है: पठन् बालकः और पठन्ती बालिका। इनका अर्थ पढ़ता हुआ बालक और पढ़ती हुई बालिका है। लिंग और वचन बदलने पर रूप भी बदलता है। शानच् के उदाहरण सेवमानः, सेवमाना, सेवमानम् हैं। ‘सेवमानः छात्रः’ सेवा कर रहे छात्र का बोध देता है।
कृदन्त को समापिका क्रिया से न मिलाएँ। पठति पूरा क्रियात्मक कथन दे सकता है; पठन् सामान्यतः किसी संज्ञा से जुड़ता है या विस्तृत संरचना में आता है। रूप और वाक्य-भूमिका दोनों जाँचें।
9. तद्धित और स्त्रीप्रत्यय
तद्धित प्रत्यय संज्ञा आदि से नया अर्थ बनाते हैं। मतुप् गुण या वस्तु से युक्त होने का अर्थ देता है: धनवान्, धनवती, धनवत्; बुद्धिमान्, बुद्धिमती, बुद्धिमत्। ‘बुद्धिमती बालिका’ में स्त्रीलिंग का मेल है। केवल बुद्धिमान् हर संज्ञा के साथ न रखें।
त्व और तल् भाववाचक रूप बनाते हैं: मित्रत्वम् और मित्रता। मित्रत्वम् नपुंसकलिंग है; मित्रता स्त्रीलिंग। मूल अर्थ संबंध रखते हुए व्याकरणिक लिंग बदल सकता है। ‘सुन्दरता’ और ‘सुन्दरत्वम्’ भी गुण के भाव को व्यक्त करते हैं।
टाप् और ङीप् जैसे स्त्रीप्रत्यय विभिन्न आधारों पर स्त्रीलिंग शब्द बनाते हैं। उदाहरणतः बालक से बालिका में क रूप के साथ परिवर्तन होता है और कुमार से कुमारी बनता है। हर शब्द पर आ या ई जोड़ देना सही नहीं; मूल शब्द और स्वीकृत निर्माण सीखें। विद्यालय की प्रत्यय-सूची से विशेष नियमों का अभ्यास करें।
10. सुलझा रूप-चयन
‘सा ___ भोजनं खादति’, मूल भाव हाथ धोकर। उचित अव्यय प्रक्षाल्य हो सकता है: ‘सा हस्तौ प्रक्षाल्य भोजनं खादति।’ पहले धोना और फिर खाना, दोनों का कर्ता समान है। ‘प्रक्षालितुम्’ करने से धोने के उद्देश्य के लिए भोजन खाना जैसा असंगत संबंध बन सकता है।
‘पीला वस्त्र धारण करने वाला व्यक्ति’ के लिए पहले बाहरी धारक पहचानें। विग्रह पीतम् अम्बरं यस्य सः, इसलिए बहुव्रीहि। ‘नीला कमल’ में कोई बाहरी धारक नहीं; विग्रह नीलं कमलम्, इसलिए कर्मधारय। इस प्रकार अर्थ की जाँच नाम रटने से अधिक विश्वसनीय है।
प्रश्न हल करने की विधि
तय करें कि प्रश्न समास, उपसर्ग या प्रत्यय पर है।
समास में पहले पूरा अर्थपूर्ण विग्रह लिखें।
प्रधानता, कारक-संबंध और बाहरी धारक से भेद पहचानें।
प्रत्यय में पहले पूर्ण कार्य, उद्देश्य या गुण का संबंध तय करें।
अव्यय को स्थिर रखें और विशेषण का आवश्यक मेल करें।
बने रूप को पूरे वाक्य में रखकर समय और अर्थ जाँचें।
सम्बन्ध
संधि समस्त तथा व्युत्पन्न पदों में बदले वर्णों की पहचान करती है।
शब्दरूप विशेषण और कृदन्त का लिंग-वचन-विभक्ति मेल बनाए रखते हैं।
अनुवाद और साहित्यिक पठन में छोटे समस्त पद का विस्तृत अर्थ खोलना आवश्यक है।
सामान्य त्रुटियाँ
संधि और समास को एक मानना; वर्ण-मेल और अर्थ-संक्षेप का अंतर रखें।
संख्या देखकर हर शब्द को द्विगु कहना; समाहार और बाहरी धारक जाँचें।
पठित्वा तथा पठितुम् बदल देना; पूर्व कार्य और उद्देश्य अलग हैं।
कृदन्त विशेषण को हर जगह एक रूप में रखना; संज्ञा के अनुसार मेल करें।
पुनरावृत्ति सूची
मैं समास और संधि का अंतर स्पष्ट कर सकता/सकती हूँ।
मैं प्रमुख समासों का अर्थपूर्ण विग्रह कर सकता/सकती हूँ।
मैं संदर्भ से प्रधानता और बाहरी संकेत पहचान सकता/सकती हूँ।
मैं उपसर्ग से क्रिया का अर्थ-परिवर्तन समझ सकता/सकती हूँ।
मैं प्रमुख प्रत्ययों की भूमिका और रूप बता सकता/सकती हूँ।
मैं अव्यय तथा विशेषण के भिन्न प्रयोग सही रख सकता/सकती हूँ।