परिचय
शब्द-रचना भाषा में नए शब्द बनने की प्रक्रिया को समझाती है। उपसर्ग, प्रत्यय, समास और सन्धि की पहचान से केवल व्याकरण के प्रश्न नहीं सुलझते; अपरिचित शब्दों का अर्थ समझने और अपने लेखन में सटीक शब्द चुनने में भी सहायता मिलती है। शब्द को छोटे हिस्सों में बाँटना तभी उपयोगी है जब उनका सम्बन्ध नियम और अर्थ दोनों से स्पष्ट हो।
“हार” और “हारना” का अर्थ प्रसंग से बदलता है, जबकि “असफलता” में निषेध, सफलता और भाववाचकता की परतें दिखाई देती हैं। इस अध्याय में शब्द और पद का अन्तर, शब्दों के वर्गीकरण तथा प्रमुख रचना-पद्धतियाँ उदाहरणों से समझाई गई हैं। विद्यालय के हिंदी पाठ्यक्रम के अनुसार इनमें से कुछ विषय मुख्य और कुछ पुनरावृत्ति या विस्तार के रूप में पढ़ाए जा सकते हैं।
अधिगम उद्देश्य
शब्द और पद का अन्तर वाक्य के उदाहरण से स्पष्ट करना।
उत्पत्ति, रचना और प्रयोग के आधार पर शब्दों का वर्गीकरण करना।
उपसर्ग और प्रत्यय पहचानकर अर्थ-परिवर्तन समझाना।
समास का विग्रह करके उपयुक्त भेद बताना।
प्रमुख स्वर सन्धियों को उदाहरणों में लागू करना।
अनुस्वार, अनुनासिक और प्रचलित शब्द-रूपों की शुद्धि करना।
मुख्य अवधारणाएँ
1. शब्द और पद में सम्बन्ध समझिए
शब्द अर्थ व्यक्त करने वाली स्वतंत्र भाषिक इकाई है। वही शब्द जब वाक्य में व्याकरणिक सम्बन्ध ग्रहण करता है तो पद कहलाता है। “लड़की” एक शब्द है; “लड़की पुस्तक पढ़ती है” में वह कर्ता के रूप में प्रयुक्त पद है। पद का रूप और कार्य वाक्य की अन्य इकाइयों से जुड़ता है।
“घर” और “घर में” की तुलना कीजिए। दूसरे प्रयोग में “में” स्थान का सम्बन्ध स्पष्ट करता है। पद पहचानते समय केवल कोश में दिया अर्थ नहीं, वाक्य में भूमिका देखनी चाहिए। “सुन्दर” सामान्य शब्द है, लेकिन “सुन्दर चित्र बिक गया” में चित्र की विशेषता बताने वाला विशेषण पद है। हर शब्द का एक ही कार्य सभी वाक्यों में निश्चित नहीं होता।
2. उत्पत्ति के आधार पर वर्गीकरण कीजिए
तत्सम शब्द संस्कृत से लगभग मूल रूप में आए हैं, जैसे अग्नि और दन्त। तद्भव शब्द ऐतिहासिक ध्वनि-परिवर्तन से विकसित हुए हैं, जैसे आग और दाँत। देशज शब्द स्थानीय बोलचाल तथा जनभाषा की परम्परा से जुड़े होते हैं; उनके सुदूर मूल का निर्धारण हमेशा सरल नहीं होता। विदेशज शब्द दूसरी भाषाओं से आए हैं, जैसे अंग्रेज़ी से रेल और स्कूल तथा फ़ारसी से बाज़ार।
प्रकार | पहचान का आधार | उदाहरण |
|---|---|---|
तत्सम | संस्कृत का लगभग सुरक्षित रूप | अग्नि, दन्त |
तद्भव | परिवर्तित ऐतिहासिक रूप | आग, दाँत |
देशज | स्थानीय जनभाषिक प्रचलन | खटपट जैसे लोकप्रचलित ध्वन्यात्मक प्रयोग |
विदेशज | अन्य भाषा से ग्रहण | रेल, बाज़ार |
केवल कठिन दिखने से कोई शब्द तत्सम नहीं बनता। देशज और विदेशी मूल वाले कुछ शब्दों के इतिहास पर मतभेद मिलते हैं; परीक्षा में पाठ्यपुस्तक के मान्य उदाहरण अपनाएँ, अनुमान से व्युत्पत्ति न गढ़ें।
3. रचना के आधार पर शब्द समझिए
रूढ़ शब्द का वर्तमान प्रचलित अर्थ उसके टुकड़ों से आसानी से नहीं निकाला जाता, जैसे घर। यौगिक शब्द अर्थपूर्ण घटकों से बनता है, जैसे विद्यालय = विद्या का आलय। योगरूढ़ शब्द के घटक अर्थ देते हैं, पर पूरा शब्द किसी विशेष अर्थ में रूढ़ हो जाता है। “पंकज” का शाब्दिक अर्थ पंक में जन्मा है, लेकिन प्रचलित अर्थ विशेष रूप से कमल है।
इसलिए हर कीचड़ में जन्मी वस्तु को पंकज नहीं कहेंगे। प्रश्न यदि योगरूढ़ता का कारण पूछे तो केवल विग्रह पर्याप्त नहीं; विशेष अर्थ भी बताइए। “विद्या का आलय” सामान्य रचनात्मक अर्थ सुरक्षित रखता है, जबकि “पंक में जन्मा” से कमल तक सीमित प्रयोग योगरूढ़ता दिखाता है। शब्द का आधुनिक व्यवहार पहचान का आवश्यक आधार है।
4. उपसर्ग से अर्थ में परिवर्तन पहचानिए
उपसर्ग शब्द से पहले जुड़कर उसके अर्थ में परिवर्तन करता है। “सु + विचार = सुविचार” अच्छे विचार का भाव देता है। “प्रति + दिन = प्रतिदिन” हर दिन का अर्थ देता है। उपसर्ग का स्वतंत्र वाक्यगत प्रयोग सामान्यतः नहीं होता।
उपसर्ग | मुख्य अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
अ / अन | निषेध या अभाव | असत्य, अनपढ़ |
सु | अच्छा | सुयोग्य, सुविचार |
दुर् / दुस् | बुरा या कठिन | दुर्गुण, दुष्कर |
प्रति | प्रत्येक या दिशा-सम्बन्ध | प्रतिदिन, प्रतिक्रिया |
उप | समीप या सहायक | उपनगर, उपप्रधान |
बे | अभाव | बेकार, बेईमान |
एक उपसर्ग के कई प्रसंगानुकूल अर्थ हो सकते हैं। “प्रतिक्रिया” में प्रति का अर्थ केवल हर नहीं है। विभाजन करते समय वास्तविक आधार शब्द की जाँच करें; आरम्भ के समान अक्षर देखकर किसी भी शब्द को उपसर्गयुक्त कहना गलत है। “अनार” को अन + आर करके अभाववाचक शब्द न मानें।
5. प्रत्यय का कार्य और शब्द-परिवार समझिए
प्रत्यय आधार के बाद जुड़कर नया शब्द या रूप बनाता है। “सुन्दर + ता = सुन्दरता” में विशेषण से भाववाचक संज्ञा बनती है। “अपना + पन = अपनापन” आत्मीयता का भाव देता है। “लिख + आवट = लिखावट” क्रिया से सम्बन्धित संज्ञा बनाता है। जुड़ने पर आधार में ध्वनि या वर्तनी का परिवर्तन भी हो सकता है।
कृत प्रत्यय धातु या क्रियात्मक आधार से शब्द बनाते हैं, जैसे पढ़ना से पढ़ाई का सम्बन्ध। तद्धित प्रत्यय संज्ञा, सर्वनाम या विशेषण आदि से शब्द बनाते हैं, जैसे मानव से मानवता। किसी पाठ्यपुस्तक में दिए तकनीकी विभाजन का पालन करें; सभी अन्तिम अक्षर प्रत्यय नहीं होते। “पहाड़” का “ड़” देखकर उसे प्रत्यय मानना उचित नहीं।
हल किया उदाहरण: “ईमानदारी” में ईमानदार व्यक्ति का गुण व्यक्त होता है। पहले आधार “ईमानदार” पहचानें, फिर भाववाचक रूप देखें। केवल अंतिम अक्षर हटाकर ऐसा अंश न निकालें जिसका भाषा में कोई सम्बन्धित आधार ही न हो।
6. समास और विग्रह की प्रक्रिया सीखिए
समास में दो या अधिक पद संक्षिप्त होकर एक संयुक्त पद बनाते हैं। विग्रह में उनके छिपे सम्बन्ध को स्पष्ट किया जाता है। “राजपुत्र” का विग्रह राजा का पुत्र है। “का” जैसे सम्बन्धसूचक शब्द का लोप संक्षेप में हुआ है। समास पहचानने के लिए पहले अर्थपूर्ण विग्रह बनाइए, फिर प्रधानता और सम्बन्ध देखिए।
समास | मुख्य पहचान | उदाहरण और विग्रह |
|---|---|---|
अव्ययीभाव | सामान्यतः पहला अव्यय प्रधान | प्रतिदिन = प्रत्येक दिन |
तत्पुरुष | सामान्यतः उत्तरपद प्रधान, कारक सम्बन्ध | राजपुत्र = राजा का पुत्र |
कर्मधारय | विशेषण-विशेष्य या समानाधिकरण सम्बन्ध | नीलकमल = नीला कमल |
द्विगु | संख्यावाची पूर्वपद और समूह का अर्थ | त्रिलोक = तीन लोकों का समूह |
द्वन्द्व | दोनों पद समान रूप से प्रधान | माता-पिता = माता और पिता |
बहुव्रीहि | अर्थ किसी बाहरी व्यक्ति या वस्तु की ओर | दशानन = दस आनन हैं जिसके |
कर्मधारय और द्विगु को कई व्याकरण-परम्पराएँ तत्पुरुष के अन्तर्गत रखती हैं। विद्यालयी प्रश्न में अपनाया वर्गीकरण देखें। “दशानन” यदि किसी व्यक्ति का संकेत है तो बाहरी अर्थ प्रधान है; केवल संख्या देखकर उसे द्विगु नहीं कह सकते।
7. सन्धि को समास से अलग रखिए
सन्धि में निकट आए वर्णों के मेल से ध्वनि-परिवर्तन होता है। सन्धि-विच्छेद में मूल वर्ण और शब्द दिखाते हैं। समास मुख्यतः पदों के अर्थ-सम्बन्ध का संक्षेप है; दोनों प्रक्रियाएँ किसी एक शब्द में साथ भी मिल सकती हैं। “विद्यालय” में विद्या + आलय से आ + आ = आ का स्वर-परिवर्तन भी समझा जा सकता है।
स्वर सन्धि | नियम का संकेत | उदाहरण |
|---|---|---|
दीर्घ | समान प्रकार के स्वरों का दीर्घ मेल | विद्या + आलय = विद्यालय |
गुण | अ/आ के साथ इ/ई, उ/ऊ, ऋ | देव + इन्द्र = देवेन्द्र |
वृद्धि | अ/आ के साथ ए/ऐ, ओ/औ | सदा + एव = सदैव |
यण | इ/ई, उ/ऊ, ऋ के बाद भिन्न स्वर पर य्, व्, र् | अति + अधिक = अत्यधिक |
स्वर, व्यञ्जन और विसर्ग सन्धि व्यापक वर्ग हैं। अपने पाठ्यक्रम में निर्धारित नियमों का अभ्यास करें। हर संयुक्त अक्षर सन्धि से नहीं बना होता; विच्छेद में सार्थक मूल और सही नियम दोनों चाहिए।
8. अनुस्वार और अनुनासिक में अन्तर कीजिए
अनुस्वार प्रायः बिन्दु से लिखा जाता है और सम्बन्धित नासिक्य व्यञ्जन का संकेत दे सकता है, जैसे अंक तथा संबंध के प्रचलित मानक रूप सम्बन्ध में व्यञ्जन-समूह। अनुनासिकता में स्वर का उच्चारण नाक और मुख दोनों से होता है, जैसे माँ, चाँद और हँसना। चन्द्रबिन्दु उसका सामान्य चिह्न है; शिरोरेखा के ऊपर मात्रा होने पर बिन्दु भी अनुनासिकता दर्शा सकता है, जैसे हैं।
अर्थभेद पर ध्यान दें: “हंस” पक्षी है और “हँस” हँसना क्रिया से सम्बन्धित है। केवल हर बिन्दु को एक ही ध्वनि मान लेने से अर्थ बदल सकता है। मानक वर्तनी के लिए पाठ्यपुस्तक और शब्दकोश की परम्परा अपनाएँ। एकाधिक स्वीकृत रूपों के प्रसंग में शिक्षक को परीक्षा की अपेक्षा स्पष्ट करनी चाहिए।
9. शब्दार्थ और प्रयोग से शुद्धि जाँचिए
पर्यायवाची शब्द हर वाक्य में एक-दूसरे के स्थान पर नहीं आ सकते। “जल” और “पानी” निकट अर्थ रखते हैं, पर मुहावरे और स्थापित पदों में मनमाना परिवर्तन नहीं होता। अनेकार्थी शब्द का अर्थ प्रसंग से तय होता है, जैसे “कल” समय भी बता सकता है और यन्त्र का अर्थ भी दे सकता है। श्रुतिसमभिन्नार्थक शब्द ध्वनि में निकट लेकिन अर्थ में अलग होते हैं, जैसे ओर और और।
अभ्यास में “मेरे ___ दो पौधे हैं” के लिए “और” अतिरिक्त संख्या बताता है, जबकि “उस ___ देखो” में “ओर” दिशा बताता है। उपसर्ग, प्रत्यय या समास का विश्लेषण करने के बाद पूरा शब्द मूल वाक्य में रखिए। यदि अर्थ न बचे तो रचना का विश्लेषण दोबारा जाँचें। व्याकरण अर्थ को समझने का साधन है, अक्षरों को मनमाने ढंग से काटने का खेल नहीं।
प्रश्न हल करने की विधि
शब्द का प्रसंगानुकूल अर्थ और वाक्य में कार्य पहचानिए।
प्रश्न का आधार तय कीजिए—उत्पत्ति, रचना, उपसर्ग, प्रत्यय, समास या सन्धि।
अर्थपूर्ण आधार और जुड़ने वाले अंश अलग कीजिए।
समास में पहले विग्रह, सन्धि में पहले वर्णों का नियम लिखिए।
बने रूप को मूल वाक्य में रखकर अर्थ तथा वर्तनी जाँचिए।
अस्पष्ट वर्गीकरण में पाठ्यपुस्तक की निर्धारित परम्परा अपनाइए।
सम्बन्ध
वाक्य-व्याकरण में पद का कार्य कर्ता, कर्म और विशेषण की पहचान कराता है।
अपठित पठन में शब्द-परिवार अपरिचित शब्द का अर्थ समझने में सहायक हैं।
संस्कृत अध्ययन में सन्धि और समास के विस्तृत नियम इसी आधार को आगे बढ़ाते हैं।
सामान्य त्रुटियाँ
अनार को अन + आर मान लेना; अक्षर-समानता वास्तविक उपसर्ग सिद्ध नहीं करती।
दशानन को केवल संख्या देखकर द्विगु कहना; बाहरी व्यक्ति का संकेत बहुव्रीहि बनाता है।
सन्धि और समास को एक कहना; एक ध्वनि-परिवर्तन, दूसरा पदों का अर्थ-सम्बन्ध है।
शब्द और पद में कोई अन्तर न मानना; पद वाक्य के सम्बन्ध में प्रयुक्त होता है।
पुनरावृत्ति सूची
मैं शब्द और पद का अन्तर उदाहरण से समझा सकता/सकती हूँ।
मैं शब्दों के प्रमुख वर्गीकरण पहचान सकता/सकती हूँ।
मैं उपसर्ग और प्रत्यय से बने शब्दों का अर्थ बता सकता/सकती हूँ।
मैं समास का विग्रह और प्रमुख स्वर सन्धियों का विच्छेद कर सकता/सकती हूँ।
मैं अर्थ और वर्तनी के आधार पर अपना विश्लेषण जाँच सकता/सकती हूँ।