परिचय
शब्द और पद-रचना का अध्ययन बताता है कि भाषा की इकाइयाँ कैसे बनती हैं और वाक्य में जाकर कौन-सा कार्य करती हैं। अकेला शब्द केवल अर्थ बताता है; वाक्य में वही शब्द दूसरे पदों से संबंध बनाता है। इस अंतर को समझने पर पद-परिचय, पदबंध, समास और शब्द-निर्माण जैसे प्रश्न अधिक स्पष्ट होते हैं।
विद्यालय की सूचना में ‘प्रतिदिन अभ्यास करें’ और ‘अभ्यास की प्रतिदिन जाँच होगी’ पढ़ते समय हमें शब्द का रूप ही नहीं, उसका कार्य भी देखना पड़ता है। इस अध्याय में शब्द, पद, शब्दभेद, पदबंध, उपसर्ग, प्रत्यय, संधि और समास का तुलनात्मक अभ्यास है। हिंदी के अलग पाठ्यक्रमों में इनकी परीक्षा-सीमा भिन्न हो सकती है; अपनी निर्धारित सूची के अनुसार प्राथमिकता दें।
अधिगम उद्देश्य
स्पष्ट करें कि शब्द और पद में क्या अंतर है।
पहचानें कि वाक्य में विभिन्न शब्दभेद कौन-सा कार्य करते हैं।
विश्लेषण करें कि पदबंध की प्रधान इकाई और भूमिका क्या है।
बनाएँ कि उपसर्ग और प्रत्यय से शब्द कैसे बनते हैं।
पहचानें कि संधि और समास की प्रक्रियाएँ कैसे अलग हैं।
करें कि समस्त पद का विग्रह और भेद अर्थ के आधार पर कैसे तय होता है।
मुख्य अवधारणाएँ
1. शब्द, पद और व्याकरणिक संबंध
शब्द अर्थपूर्ण स्वतंत्र भाषिक इकाई है। पद वाक्य में प्रयुक्त वह शब्द है जिसका दूसरे पदों से व्याकरणिक संबंध बन गया है। ‘पुस्तक’ एक शब्द है। ‘पुस्तक मेज पर रखी है’ में पुस्तक कर्ता के रूप में प्रयुक्त पद है। पद का परिचय केवल शब्दकोश से नहीं, वाक्य में उसके कार्य से मिलता है।
एक ही रूप अलग काम कर सकता है। ‘वह तेज दौड़ता है’ में तेज दौड़ने की रीति बताता है; ‘तेज हवा चली’ में तेज हवा की विशेषता है। इसलिए हर बार तेज को विशेषण लिख देना गलत होगा। प्रश्न में रेखांकित अंश को पूरा पढ़कर देखें कि वह किसकी विशेषता, संबंध या क्रिया का बोध करा रहा है।
2. प्रमुख शब्दभेद और पद-परिचय
विकारी शब्दों के रूप लिंग, वचन, कारक, पुरुष या काल के अनुसार बदल सकते हैं। संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया इस वर्ग में पढ़े जाते हैं। अविकारी शब्द सामान्यतः ऐसे रूप-परिवर्तन नहीं लेते। क्रियाविशेषण, संबंधबोधक, समुच्चयबोधक और विस्मयादिबोधक इनके प्रमुख वर्ग हैं। सभी शब्दों में हर प्रकार का परिवर्तन नहीं होता; अनेक विशेषणों का रूप स्थिर भी रहता है।
शब्दभेद | कार्य | उदाहरण |
|---|---|---|
संज्ञा | व्यक्ति, वस्तु, स्थान या भाव का नाम | सीमा, पुस्तक, नगर, ईमानदारी |
सर्वनाम | संज्ञा के स्थान पर प्रयोग | वह आई; किसी ने पूछा |
विशेषण | संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता | साफ कमरा; तीन पुस्तकें |
क्रिया | कार्य या अवस्था | लिखता है; सो गई; उपस्थित है |
क्रियाविशेषण | क्रिया की रीति, समय, स्थान आदि | धीरे बोलो; आज आएँगे |
संबंधबोधक | पदों के बीच संबंध | मेज के नीचे; घर के सामने |
समुच्चयबोधक | शब्द या उपवाक्य जोड़ना | और, लेकिन, क्योंकि |
विस्मयादिबोधक | आकस्मिक भाव प्रकट करना | अरे! वाह! ओह! |
पद-परिचय में माँगी गई श्रेणियाँ ही दें। ‘रीना ने नई पुस्तक खरीदी’ में पुस्तक जातिवाचक संज्ञा, स्त्रीलिंग, एकवचन और कर्म है। ‘नई’ गुणवाचक विशेषण है, जिसका विशेष्य पुस्तक है। ‘खरीदी’ सकर्मक क्रिया है, क्योंकि क्या खरीदी का उत्तर पुस्तक मिलता है। क्रिया की पहचान करते समय सहायक क्रिया और काल का भी ध्यान रखें।
3. संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण के सूक्ष्म अंतर
जातिवाचक संज्ञा वर्ग बताती है, जैसे नदी; व्यक्तिवाचक संज्ञा विशेष नाम, जैसे नर्मदा; भाववाचक संज्ञा गुण, दशा या भाव, जैसे विनम्रता। ‘बचपन’ किसी एक बच्चे का नाम नहीं, जीवन की अवस्था है। संज्ञा का भेद अर्थ से तय करें।
सर्वनाम में पुरुषवाचक, निजवाचक, निश्चयवाचक, अनिश्चयवाचक, प्रश्नवाचक और संबंधवाचक प्रयोग मिलते हैं। ‘यह आया’ में यह संज्ञा का स्थान ले रहा है, इसलिए सर्वनाम है। ‘यह विद्यार्थी आया’ में यह विद्यार्थी की ओर संकेत करता है और सार्वनामिक विशेषण के रूप में पढ़ा जाता है। वाक्य में संज्ञा की उपस्थिति अंतर स्पष्ट करती है।
विशेषण गुण, संख्या, परिमाण या संकेत व्यक्त कर सकता है। ‘चार कुर्सियाँ’ संख्यावाचक है; ‘थोड़ा पानी’ परिमाणवाचक। पानी को सामान्यतः इस प्रसंग में गिना नहीं जा रहा, मात्रा बताई जा रही है। ‘अच्छा’ का रूप ‘अच्छी’ और ‘अच्छे’ हो सकता है, लेकिन ‘सुंदर’ अनेक प्रयोगों में रूप नहीं बदलता।
4. पदबंध: शब्दों का संयुक्त कार्य
पदबंध ऐसा पदसमूह है जो वाक्य में एक इकाई की तरह कार्य करता है, पर स्वतंत्र उपवाक्य की तरह पूर्ण कथन नहीं करता। इसकी पहचान शब्दों की संख्या से नहीं, प्रधान पद और भूमिका से होती है। ‘बरामदे में बैठा हुआ लड़का’ पूरा समूह किसी व्यक्ति का बोध कराता है, इसलिए संज्ञा पदबंध हो सकता है।
पदबंध | रेखांकित मानने योग्य समूह | आधार |
|---|---|---|
संज्ञा पदबंध | लाल टोपी वाला लड़का दौड़ा | पूरा समूह लड़का का विस्तृत बोध कराता है |
सर्वनाम पदबंध | हम सब में से कोई आएगा | पूरा समूह किसी अनिश्चित व्यक्ति का बोध कराता है |
विशेषण पदबंध | अत्यंत मेहनती और धैर्यवान छात्र सफल हुआ | समूह छात्र की विशेषता बताता है |
क्रियाविशेषण पदबंध | वह बहुत धीरे-धीरे बोला | समूह बोलने की रीति बताता है |
क्रिया पदबंध | वह अभ्यास करता चला गया | संयुक्त क्रियात्मक समूह कार्य की गति बताता है |
सीमा पर ध्यान दें। केवल ‘लाल टोपी वाला’ रेखांकित हो तो वह लड़के की विशेषता बताने वाला विशेषण पदबंध है। ‘लाल टोपी वाला लड़का’ पूरा रेखांकित हो तो प्रधान पद लड़का है और समूह संज्ञा पदबंध है। रेखांकन बदलने से उत्तर बदल सकता है; बाहर के शब्द को समूह में जोड़ना नहीं चाहिए।
5. उपसर्ग और प्रत्यय
उपसर्ग मूल शब्द से पहले जुड़कर अर्थ में परिवर्तन करता है। ‘सु + विचार = सुविचार’ में अच्छे विचार का अर्थ बनता है। ‘अ + न्याय = अन्याय’ में निषेध का अर्थ आता है। ‘प्रति + दिन = प्रतिदिन’ में प्रत्येक दिन का बोध है। हर आरंभिक अक्षर उपसर्ग नहीं होता; मूल और बने शब्द का संबंध समझें।
प्रत्यय शब्द या धातु के अंत में जुड़कर नया शब्द बनाता है। ‘सुंदर + ता = सुंदरता’, ‘मानव + ता = मानवता’, ‘मिठास’ में मीठा से भाववाचक रूप बनता है और रूपगत परिवर्तन भी होता है। ‘लिख + आवट = लिखावट’ क्रिया से बना रूप है। शब्द तोड़ते समय हमेशा अक्षरों का यांत्रिक विभाजन न करें।
विद्यालयी वर्गीकरण में धातु से बनने वाले प्रत्यय कृत और संज्ञा आदि से बनने वाले तद्धित कहे जाते हैं। ‘पढ़ाई’ पढ़ने की क्रिया से संबंध रखती है; ‘मानवता’ मानव से भाव बताती है। दिए गए पाठ्यक्रम में स्वीकृत प्रत्यय-रूपों का अभ्यास करें और बने शब्द को वाक्य में रखकर उसका अर्थ जाँचें।
6. संधि: वर्णों का परिवर्तन
संधि में पास आने वाले वर्णों के मेल से ध्वनि या वर्ण में परिवर्तन होता है। संधि-विच्छेद में मूल रूप अलग किए जाते हैं। ‘विद्या + आलय = विद्यालय’ में आ और आ मिलकर आ रहते हैं; यह दीर्घ स्वर संधि है। संधि ध्वनि-आधारित प्रक्रिया है, जबकि समास का केंद्र पदों का अर्थ-संबंध है।
प्रमुख स्वर संधि | नियम का संकेत | उदाहरण |
|---|---|---|
दीर्घ | समान स्वर मिलकर दीर्घ | हिम + आलय = हिमालय |
गुण | अ या आ के बाद इ/ई से ए, उ/ऊ से ओ | महा + उत्सव = महोत्सव |
वृद्धि | अ या आ के बाद ए/ऐ से ऐ, ओ/औ से औ | सदा + एव = सदैव |
यण | इ/ई, उ/ऊ आदि के बाद भिन्न स्वर पर य्, व् आदि | अति + अधिक = अत्यधिक |
व्यंजन संधि का उदाहरण ‘जगत् + ईश = जगदीश’ है, जहाँ त् से द् का परिवर्तन होता है। विसर्ग संधि का उदाहरण ‘नमः + ते = नमस्ते’ है। किसी ए या ओ को देखकर अकेले संधि घोषित न करें; अर्थपूर्ण मूल रूप और संगत नियम दोनों मिलना चाहिए। संधि का विस्तृत संस्कृत अभ्यास अलग विषय में किया जाता है।
7. समास और विग्रह
समास में दो या अधिक पदों का संक्षिप्त रूप बनता है और उनके बीच की विभक्ति या संबंधसूचक शब्द प्रायः लुप्त हो जाते हैं। बना रूप समस्त पद और उसका विस्तार विग्रह कहलाता है। ‘राजपुत्र’ का विग्रह राजा का पुत्र है। ‘का’ संबंध हटने पर संक्षिप्त पद बना है।
भेद | मुख्य पहचान | उदाहरण और विग्रह |
|---|---|---|
अव्ययीभाव | पहला पद प्रधान; पूरा पद अव्ययवत | यथाशक्ति — शक्ति के अनुसार |
तत्पुरुष | उत्तरपद प्रधान; बीच का कारक-संबंध लुप्त | राजपुत्र — राजा का पुत्र |
कर्मधारय | विशेषण-विशेष्य या उपमान-उपमेय संबंध | नीलकमल — नीला है जो कमल |
द्विगु | संख्या पूर्वपद और समाहार का अर्थ | त्रिलोक — तीन लोकों का समाहार |
द्वंद्व | दोनों पद समान रूप से प्रधान | माता-पिता — माता और पिता |
बहुव्रीहि | अर्थ किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु पर जाता है | दशानन — दस आनन हैं जिसके, अर्थात रावण |
कुछ विद्यालयी व्याकरणों में कर्मधारय और द्विगु को तत्पुरुष के अंतर्गत भी रखा जाता है। प्रश्न की अपेक्षित पद्धति के अनुसार विशिष्ट भेद दें। मात्र पहला पद संख्या होने से हर समास द्विगु नहीं हो जाता; समाहार या अन्य अर्थ देखना आवश्यक है।
8. अर्थ के आधार पर भेद तय करना
एक ही समस्त पद का भेद प्रसंग और विग्रह से बदल सकता है। ‘पीतांबर’ का अर्थ पीला वस्त्र हो तो रंग वस्त्र की विशेषता है और कर्मधारय समझा जा सकता है। ‘पीला अंबर है जिसका’ कहकर किसी विशेष व्यक्ति का बोध हो तो बहुव्रीहि होगा। बिना संदर्भ के ऐसे शब्द पर एकमात्र उत्तर थोपना उचित नहीं।
तत्पुरुष में संबंध भी स्पष्ट करें। ‘गृहप्रवेश’ घर में प्रवेश का संबंध रखता है; ‘ऋणमुक्त’ ऋण से मुक्त का। ‘रसोईघर’ रसोई के लिए घर का अर्थ देता है। केवल बीच में ‘का’ जोड़कर हर विग्रह करना गलत है। उपयुक्त कारक-संबंध अर्थ से चुनें।
सुलझा उदाहरण: ‘नीलकमल खिला’ में प्रश्न समास का हो। पहले विग्रह करें: नीला कमल। नीला कमल की विशेषता है, किसी अन्य व्यक्ति का संकेत नहीं। इसलिए कर्मधारय। यदि प्रश्न ‘शक्ति के अनुसार’ का समस्त पद पूछे, तो अर्थ सुरक्षित रखते हुए यथाशक्ति लिखें और अव्ययीभाव पहचानें।
प्रश्न हल करने की विधि
पूरा वाक्य और ठीक रेखांकित शब्द या समूह पढ़ें।
तय करें कि प्रश्न पद-परिचय, पदबंध, शब्द-निर्माण, संधि या समास का है।
पदबंध में प्रधान पद तथा पूरे समूह की भूमिका खोजें।
उपसर्ग-प्रत्यय में मूल रूप और अर्थ का संबंध जाँचें।
समास में पहले अर्थपूर्ण विग्रह करें, फिर प्रधानता और संबंध से भेद चुनें।
उत्तर को मूल वाक्य या शब्द में रखकर अर्थ की पुष्टि करें।
सम्बन्ध
वाक्य-व्याकरण में कर्ता, कर्म और क्रिया पहचानने के लिए पदों की भूमिका आवश्यक है।
साहित्य विश्लेषण में विशेषण, पदबंध और समस्त शब्दों से भाषा की संक्षिप्तता समझ आती है।
संस्कृत में संधि और समास का अध्ययन मूल रूप तथा अर्थ-संबंध की यही सजगता बढ़ाता है।
सामान्य त्रुटियाँ
शब्द को हर वाक्य में एक ही शब्दभेद देना; उसका वर्तमान कार्य देखें।
पदबंध की रेखांकित सीमा बदल देना; केवल दिए गए समूह का विश्लेषण करें।
संधि और समास को समान प्रक्रिया मानना; एक में वर्ण-परिवर्तन, दूसरे में पदों का अर्थ-संक्षेप प्रधान है।
संख्या देखकर तुरंत द्विगु कहना; समाहार और बाहरी संकेत का अंतर जाँचें।
पुनरावृत्ति सूची
मैं शब्द और पद में अंतर स्पष्ट कर सकता/सकती हूँ।
मैं वाक्य में शब्दभेद और पद-परिचय बता सकता/सकती हूँ।
मैं रेखांकित सीमा के अनुसार पदबंध पहचान सकता/सकती हूँ।
मैं उपसर्ग-प्रत्यय से शब्द-निर्माण समझा सकता/सकती हूँ।
मैं संधि और समास का अंतर उदाहरण सहित बता सकता/सकती हूँ।
मैं विग्रह और प्रसंग के आधार पर समास का भेद तय कर सकता/सकती हूँ।